पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >दिवाकर मुक्तिबोध Print | Share This  

विनायक सेन और सरकार

बहस
 

विनायक सेन और सरकार

दिवाकर मुक्तिबोध


छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम के तहत गिरफ्तार एवं जिला सत्र न्यायालय से उम्रकैद की सजा पा चुके विनायक सेन की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. उनकी जमानत याचिका पर बिलासपुर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है. उनकी ओर से प्रख्यात वकील राम जेठमलानी ने पैरवी की. आगामी 9 फरवरी को हाईकोर्ट की डिवीजनल बैंच शासन के पक्ष को सुनेगी. सुनवाई के पूर्ण होने के बाद विनायक सेन को जमानत मिल पाएगी या नहीं, इस पर देश का ही नहीं, विश्व के अनेक देशों का ध्यान लगा हुआ है.

यह मामला अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कितना गरमाया हुआ है, इसकी झलक यूरोपीय संघ के 8 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की बिलासपुर हाईकोर्ट में मौजूदगी से मिलती है. इस प्रतिनिधिमंडल में इंग्लैंड, हंगरी, बेल्जियम, फ्रांस, डेनमार्क तथा स्वीडन के सदस्य शामिल है. इस सवाल पर भी बहस छिड़ी हुई है कि यूरोपीय प्रतिनिधिमंडल के इस मामले में रूचि लेने के क्या मायने हैं? क्या इसके पीछे अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाने के नीयत है या भारत की न्यायिक व्यवस्था पर अविश्वास?

बहरहाल इसमे दो राय नहीं कि विनायक सेन मामले में अब राज्य सरकार के लिए जरूरी होगा कि वह अपना चेहरा बचाए. यह चेहरा तभी बचेगा जब पहले हाईकोर्ट से जमानत नामंजूर हो जाए और इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की स्थिति में वहां से भी वह खारिज हो जाए. यानी राज्य सरकार को हर हालत में यह सिद्ध करना होगा कि विनायक सेन की जनसुरक्षा अधिनियम में गिरफ्तारी वाजिब है तथा नक्सली गतिविधियों में उनकी संलिप्तता प्रामाणिक है.

सुनवाई के अगले दौर में सरकार इस बात की पूरी कोशिश करेगी कि विनायक सेन को जमानत न मिले. हाल ही में घटित दो घटनाएं इसी तैयारी के परिप्रेक्ष्य में देखी जा सकती है. पहली घटना है श्रीमती रंजना चौबे की हस्तक्षेप याचिका की पेशकश. 25 जनवरी को बिलासपुर हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान श्रीमती रंजना चौबे ने हस्तक्षेप याचिका प्रस्तुत की जिसमें विनायक सेन एवं पीयूष गुहा को जमानत न देने की अपील की गयी है. जनसुरक्षा अधिनियम में पीयूष गुहा एवं नारायण सान्याल को भी विनायक सेन के साथ ही उम्र कैद की सजा मिली हुई है.

नक्सली हिंसा से जूझ रहे आदिवासियों के मामले में स्वयं सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि उनके हितों का संरक्षण करने में वह असफल रही है.


रंजना चौबे छत्तीसगढ़ के मदनबाड़ा नक्सली हमले में शहीद एसपी वी.के.चौबे की विधवा है. उनकी हस्तक्षेप याचिका सरकार की सहायता के लिए है तथा इसे प्रायोजित कहा जा सकता है. इस याचिका से सरकार शायद यह बताना चाहती है कि राज्य में नक्सली समस्या कानून-व्यवस्था के लिए बहुत बडी चुनौती है. लिहाजा नक्सली गतिविधियों में लिप्त लोगों के प्रति सख्त रवैया अपनाया जाना चाहिए. दूसरी घटना विनायक सेन की पत्नी इलिना सेन से संबंधित है. इलिना सेन वर्तमान में वर्धा स्थित महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं. उनके खिलाफ वर्धा (महाराष्ट्र) पुलिस थाने में मामला दर्ज किया गया है.

उन पर आरोप है कि उन्होंने अपनी अगुवाई वाली संस्था इंडियन एसोसिएशन ऑफ वूमेन स्टडीज के सालाना जलसे में अपने पति के साथ-साथ नक्सलियों के प्रति सहानुभूति रखनेवाले लोगों के लिए समर्थन मांगा. उनकी अपील को भडक़ाऊ मानते हुए पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया.

ये दोनों घटनाएं अपने मूल मंतव्य को स्पष्ट करती हैं. इससे यह आभास होता है कि राज्य सरकार हर तरफ से विनायक सेन पर अपना घेरा पक्का करना चाहती है. इलिना सेन पर दर्ज मामले को सेन परिवार के लिए एक और परेशानी के रूप में देखा जा सकता है. सेन पहले ही यह कह चुकी हैं कि देश में उनकी जान को खतरा है अत: वह विदेश में बसने पर विचार कर रही हैं. दो वर्ष पूर्व विनायक सेन की जनसुरक्षा कानून के अन्तर्गत गिरफ्तारी के विरोध में विश्व का ध्यान आकर्षित करने एवं जेल से उनकी रिहाई के लिए राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय दबाव बनाने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही हैं. विनायक सेन को उम्रकैद की सजा के खिलाफ लड़ाई उन्ही के नेतृत्व में लड़ी जा रही है.

छत्तीसगढ़ विकास की मंजिलें तय कर रहा है. सरकार की ओर से बड़े-बड़े दावे भी किए जा रहे हैं. उपलब्धियों का बखान हो रहा है. प्रत्येक अवसर पर राज्य की विकास दर 11.4 प्रतिशत जो देश में सर्वाधिक है एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली की चुस्त-दुरूस्त व्यवस्था की दुहाई दी जाती है लेकिन यह सम्पूर्ण सच नहीं है. नक्सली हिंसा से जूझ रहे आदिवासियों के मामले में स्वयं सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार किया है कि उनके हितों का संरक्षण करने में वह असफल रही है. इसी परिप्रेक्ष्य में यह भी सवाल है कि क्या इस राज्य में जनसुरक्षा जैसे सख्त कानून की जरूरत है? और यदि जरूरत है तो क्या वाकई इसका उचित उपयोग किया जा रहा है?

विनायक सेन मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, वर्षों से उनका कर्मक्षेत्र छत्तीसगढ़ है. पेशे से चिकित्सक विनायक सेन ग्रामीण स्वास्थ्य एवं चिकित्सा पर नि:स्वार्थ भाव से काम करते रहे हैं. वे माओवाद के समर्थक हो सकते हैं, नक्सलियों से भी उनकी सहानुभूति हो सकती हैं. उनकी सजा के खिलाफ हो-हल्ला इसलिए नहीं मचाया जा रहा है कि वे नक्सली समर्थक हैं बल्कि इसलिए क्योंकि वे सही अर्थों में मानवतावादी हैं. माओवाद समर्थक जो नक्सली हिंसा के खिलाफ हैं, इस प्रदेश में हजारों-लाखों होंगे, क्या उन सभी को जनसुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया जा सकता है?

सवाल और भी हैं. बहरहाल नक्सली हिंसा, आदिवासियों पर अत्याचार एवं छत्तीसगढ़ सरकार की भूमिका पर प्रख्यात लेखक एवं इतिहासकार रामचन्द्र गुहा की टिप्पणी गौर करने लायक है.

26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर उन्होंने अपने आलेख में छत्तीसगढ़ का जिक्र किया है. वे लिखते हैं - ‘‘मैं उन लोगों में से हूं, जो दंतेवाड़ा जिले की हाल ही की त्रासद घटनाओं पर लगातार नज़र बनाए हुए हैं. यहां के आदिवासी इतने डरे हुए हैं कि वे पुलिस में शिकायतें भी दर्ज नहीं कराते. यदि इन लोगों को जरूरी कानूनी समर्थन मिल भी जाता है तो भी स्थानीय पुलिस थानों में उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती या अदालतें उनके मामलों की सुनवाई नहीं करती. करतम जोगा नामक एक आदिवासी नेता ने सर्वोच्च न्यायालय तक जाने का साहस दिखाया लेकिन नतीजा यह निकला कि राज्य सरकार ने उसके खिलाफ ढेरों फर्जी मामले दर्ज कर दिए और उन्हें जेल में डाल दिया’’. वे आगे लिखते है - ‘‘आदिवासियों की पीड़ा के लिए माओवादी तथा सरकार द्वारा समर्थित निगरानी समूह दोनों ही के द्वारा अपनाए गए बर्बर तौर-तरीके जिम्मेदार हैं. माओवादी तो खैर किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ सरकार की गतिविधियां संवैधानिक उत्तरदायित्वों को ताक पर रख देने वाली हैं.’’ रामचन्द्र गुहा के इन विचारों से समझा जा सकता है कि राज्य में मानवाधिकार की स्थिति क्या है?

28.01.2011, 00.11 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Anita Kasar [anita.kasar@rediffmail.com] New Delhi

 
  Offences under the Foreigners Act, 1946, were registered against Elina sen, manager of a dharamshala, Virendra Mohnani.However, no action was initiated against the vice-chancellor Vibhuti Narayan Rai or others who too had allowed foreign nationals to stay at their respective premises. ATS sources said they had learnt about Rai’s involvement in allowing three foreign nationals at his bungalow in the university premises. The fact that Rai, a former IPS officer of Haryana cadre, had played the host to three foreigners featured in the statement of the security officer Rajendra Ghormade. 
   
 

Sujit Kumar [sujitkumar_2001@gmail.com] Wardha

 
  Dear mr muktibodh, this is not true that police lodged fir against Elina Sen, because she was defending Maoism. here is the news, published in The Hindu, 26 January 2011

Foreigners Act wrongly invoked against Ilina Sen?

by S. Arun Mohan and Siddharth Varadarajan

The Indian Association for Women’s Studies (IAWS) has strongly contested the Maharashtra police decision to file an FIR against Ilina Sen, wife of Binayak Sen, for her alleged failure to inform the police about the participation of foreign delegates at an academic conference organised by the IAWS and the Mahatma Gandhi Antarrashtriya Vishwavidyalaya (MGAV) in Wardha last week.

Prof. Ilina Sen, who is an Executive Committee member of the IAWS and head of the MGAV’s Women’s Studies Department, was booked under Sections 7 and 14 of the Foreigners Act on Monday. The police also arrested the owner of a local hotel where some foreigners were staying on account of the management’s failure to inform them of their arrival.

The Foreigners Act requires hotel keepers and other persons who own, occupy or control the premises where foreigners are accommodated to submit such information to the authorities in a prescribed format known as ’Form C’. It is unclear how Prof. Sen, who is a coordinator of the IAWS, has been booked under the Act given that the relevant provisions apply only to persons who furnish lodging to foreigners for payment.

Umesh Chandra Sarangi, Additional Chief Secretary (Home), told The Hindu that the conference organisers had not informed the police about their stay. “These people came and stayed in a guest house which was booked. They were organising a conference. There is a rule that whenever a conference is organised, the police should be informed about it. The Director-General of Police is looking into the case,” he said.

In fact, the Foreigners Act itself places no such obligation on Indians who invite foreigners for conferences or social events. The four Pakistani and Bangladeshi participants named in the FIR were residing on the university campus. The IAWS sources told The Hindu that three of these women scholars were in fact staying in the Vice-Chancellor’s residence as personal guests while the fourth was put up at the university guesthouse. Ironically, full political and security clearance from the Ministries of Home Affairs and the External Affairs had been obtained in advance for the participation of Pakistani, Bangladeshi and Sri Lankan scholars as government rules currently prescribe in order for visas to be granted.

The FIR filed by the ATS Nagpur Unit notes that Form ‘C’ as prescribed under the Foreigners Act has not been filed by the University. However, Form C pertains only to ‘Hotel Arrival Information’ and does not contemplate the present situation in any manner. The distinction is relevant as Section 7 of the Act, under which Prof. Ilina Sen has been booked, will be applicable only to instances where the accommodation is paid for by foreigners. In fact, the Home Ministry in 2001 scrapped a controversial 1971 order that required persons to report the presence of foreigners in their households.

Even if one were to hold the University responsible for failing to provide the required information, the responsibility for filing a C form belongs only to those running a hotel, inn or hostel and not to the organisers of an event in which foreigners participate.

On the concluding day of the Conference, the police entered the Yatri Niwas premises in Wardha, where a large number of women participants, mostly students and teachers, were staying to attend the event. Action condemned

The organisers have condemned the actions of the police and expressed their anguish over unwarranted interference from the authorities. Mr. Sarangi denied that the police had taken action against the organisers because Prof. Sen was Dr. Binayak Sen’s wife.

(With inputs from Rahi Gaikwad in Mumbai)
 
   
 

bhagat singh [] raipur c.g.

 
  बाकि तो सब ठीक हैं,लगभग सब अखबारो में यही छपा है कि इलिना सेन के खिलाफ केस दर्ज इसलिये किया गया है कि वे सेमिनार में अपने पति और नक्सलियो की रिहाई के बारे में भाषण दे रही थी.जबकि ये बिलकुल निराधार रिपोर्टिंग हैं जिसका उस रिपोर्ट से कोई लेना-देना नहीं हैं. वास्तव में हुआ ये था कि वर्धा में आयोजित कांफ्रेंस में कुछ पाकिस्तान, बांगलादेश और श्रीलंका से प्रतिनिधि महिलायें भाग लेने आयोजकों के आमंत्रण पर आई थी, उनमें कुछ प्रतिनिधि हॉस्टल और कुछ कुलपति के निवास में भी ठहरी थी. उनमें से तीन विदेशी महिलायें बाहर के किसी होटल में ठहरी थीं. आयोजकों और होटल के खिलाफ ये मामला दर्ज कराया गया कि इनमें से किसी महिला ने कुछ जरुरी कागजात पूरे भरे हुये नहीं थे. आयोजको की भीड़ में एक नाम इलिना सेन का भी था. ये अलग बात है कि वो उस दिन बिलासपुर के कोर्ट में थी. पता नहीं, कहां से ये खबर उड़ी और अखबारों ने बिना जांच-पड़ताल के ये खबर चला दी. 
   
 

jerome gerald kujur [jeromgkujur@gmail.com] ranchi jharkhand

 
  छत्तीसगढ़ सरकार की भूमिका ने स्पष्ट कर दिया. अब भारत देश मे आम जनता की आवाज उठाने का मतलब माओवादी समर्थक होना है. झारखण्ड मे अभी तो शुरुवात है परन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता आने वाले दिन में कई बिनायक सेन झारखण्ड मे भी सरकार की इसी मंशा के तहत गिरफ्तार होंगे. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in