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वामपंथ का बही-खाता

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किसकी सदी, किसकी सहस्त्राब्दि ?

 

वामपंथ का बही-खाता

एजाज अहमद

 

 

हंगरी के एक  इतिहासकार ने कहा था : 'छोटी-सी 20वीं सदी, 1914-1989'. इस कथन को ब्रिटेन के इतिहासकार एरिक हॉब्सवाम ने यह कह कर मशहूर कर दिया कि 20वीं सदी की असल गत्यात्मकता वह है, जो प्रथम विश्व युध्द और बोल्शेविक क्रांति ने दिखाया. इसी गत्यात्मकता को समझाने के लिए हमें वामपंथ के बही-खाते जैसी चीज चाहिए. ऐसा कोई वर्णनात्मक लेखा-जोखा इस सदी में समाजवाद की स्थायी उपलब्धियों के साथ-साथ कुछेक समस्याओं व विफलताओं के बारे में भी बतायेगा ही, लेकिन सबसे पहले तो वह उन भौतिक व ऐतिहासिक परिस्थितियों का खुलासा करेगा, जिनमें उपरोक्त समूची गत्यात्मकता संभव हुई थी.

चीन में भी यही ऐतिहासिक परिस्थिति थी, जहां 1949 की क्रांति के वक्त एक औसत चीनी नागरिक पूरे दिन में आधा किलोग्राम चावल, पांच वर्षों में एक जोड़ी जूते पर जिंदा रहा और उसकी औसत उम्र 35 वर्ष रही.

 

सबसे पहले ऐतिहासिक परिस्थितियां! बोल्शेविक क्रांति की महान सफलता ने आगे चलकर हमारी स्मृति से इस तथ्य को ओझल कर दिया कि 1917-21 के बीच जर्मनी, हंगरी, इटली और कई अन्य देशों में भी विद्रोह उठ खड़े हुए थे. लेनिन का अनुमान था कि मास्को एक तात्कालिक मुख्यालय बन सकता है, जो बाद में बर्लिन स्थानांतरित हो जाएगा. उधर जर्मन को बतौर मुख्य भाषा अपनाया गया और जारी रखा गया. इस परिप्रक्ष्य में सारे यूरोप के आर्थिक व सामाजिक तौर पर उन्नत देशों में क्रांति के पिछड़ने का तथ्य सामने आया था, तो ऐसे रूस में क्रांति की सफलता का तथ्य भी सामने था, जो अभी दो पीढ़ी पहले ही कृषि दासों का समाज था. वहां तो लोकतांत्रिक शासन का कोई ढ़ांचा भी न था. महज एक-दो शहरों में औद्योगिक संस्कृति या बुर्जुआ संस्कृति की बिल्कुल शुरूआती समझ भर थी. आप रूस के संदर्भ में अयातोल्लाह खुमैनी के कब्जे वाले उस इरान को याद कर सकते हैं, जो रूस की तुलना में सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, औद्योगिक और अपनी तरह के शहरीकरण के स्तर पर अधिक उन्नत था. इरान में आधुनिक सर्वहारा की जनसंख्या भी 1917 के रूस के मुकाबले काफी ज्यादा थी. 1926 तक सिर्फ 7.6 फीसदी जनता को खेती के बाहर रोजगार मिला था. चीन में भी यही ऐतिहासिक परिस्थिति थी, जहां 1949 की क्रांति के वक्त एक औसत चीनी नागरिक पूरे दिन में आधा किलोग्राम चावल, पांच वर्षों में एक जोड़ी जूते पर जिंदा रहा और उसकी औसत उम्र 35 वर्ष रही.     

 

प्रथम विश्व युध्द में पहले से ही बरबाद हो चुका देश गृह युध्द (1918-1920) और सोवियत धरती पर ब्रिटेन, फ्रांस, अमरीका, जापान, पोलैंड, सर्ब, ग्रीक और रोमानिया की सेनाओं द्वारा नष्ट हुआ था. युध्द में अधिकांश बोल्शेविक मारे गये. फ्रांसीसी अर्थशास्त्री चार्ल्स बैटलहेम का अनुमान है कि सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण में लगे तीन चौथाई राज्य कर्मचारी जार की नौकरशाही के सदस्य थे. एक क्रांतिकारी समाज बनाने के लिए जरूरी मानव रूपी कच्चा माल न के बराबर था. तब तक सोवियत अर्थव्यवस्था युध्द पूर्व के मुकाबले 10 फीसदी गिर चुकी थी. अपनी जीविका अन्यत्र भी कमा सकने में सक्षम 20 लाख लोग रूस से बाहर निकल गये, जिसमें रूस के अधिकांश शिक्षित लोग भी शामिल थे.

 

सोवियत संघ को भीषण अलगाव भी झेलना पड़ा, जिसका संकेत इस तथ्य से मिलता है कि 1933 तक अमरीका ने सोवियत संघ को मान्यता तक नहीं दी. ठीक वसे ही जैसे उसने क्यूबा को 40 साल से अधिक समय से आर्थिक प्रतिबंध झेलने के लिए मजबूर कर दिया है. इस तरह जब तक द्वितीय युध्द खत्म नहीं हो गया, अन्य कोई समाजवादी क्रांति नहीं हुई. 1917-1919 के दौरान स्वीडन, फिनलैंड, जर्मनी, बेल्जियम में और इसके कुछ बाद में ब्रिटेन, डेनमार्क और नार्वे में सामाजिक जनवादी सरकारें या गठबंधन सरकारें बोल्शेविक क्रांति के गहरे विरोध में खड़ी हो गयीं और उनमें से कुछ के पास जो भी मार्क्सवादी विरासत थी और जिसका वे दावा किया करती थीं, उससे भी पल्ला झाड़ने में देरी नहीं की. गृह युध्द के बाद जब लेनिन ने नयी आर्थिक नीति घोषित किया तो सामाजिक जनवादियों सहित किसी भी पूंजीवादी देश ने उस पर अपनी राय नहीं जतायी और रूस को तकनीक, निवेश और सामग्री-संसाधन उपलब्ध कराने से इंकार किया गया. 1933 तक चर्चिल मुसोलिनी को बोल्शेविकवाद के खिलाफ खड़ा रक्षक बता कर उसकी प्रशंसा में लगे रहे. 1934 के बाद यद्यपि स्टालिन ने फासीवाद के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा संधि का भी प्रस्ताव रखा, लेकिन 1938-39 के दौरान पश्चिमी देशों ने सोवियत संघ के खिलाफ और फासीवाद से गठबंधन के पक्ष में अपने विकल्प खुले रखे. द्वितीय विश्व युध्द के बाद सोवियत संघ ने युरोप सहित पश्चिम व पूरब में ऐसे राज्यों के गठन की वकालत की, जो सोवियत संघ के मॉडल पर नहीं, बल्कि बहुदलीय संसदीय लोकतंत्र के मॉडल पर बनें. पूर्वी यूरोप में नीति परिवर्तन 1947 में वामपंथ से पीछे हटने की ट्रूमैन सिध्दांत की घोषणा के बाद ही संभव हुआ.

 

1970 के पहले इतिहास के किसी भी मोड़ पर सोवियत संघ आसन्न सैन्य तबाही के भय से मुक्त नहीं रहा.द्वितीय विश्व युध्द खतम होने के 10 हफ्ते बाद अमरीकी सेना के प्रमुख अधिकारियों ने सेवियत संघ के 20 प्रमुख शहरों पर बमबारी के लिए एक गुप्त योजना बनायी, जबकि इसके ठीक विपरीत सोवियत संघ ने अपनी लाल सेना में सैनिकों की संख्या 1945 के 1 करोड़ 20 लाख से घटा कर 1948 में 30 लाख कर दिया था. सोवियत संघ का पुन: सैन्यीकरण तथा परमाणु व नाभिकीय बम प्रौद्योगिकी की दौड़ अमरीका की उन घोषित नीतियों की प्रतिक्रिया थी, जो 1947 में नाटो के गठन के रुप में सामने आयीं. इटली में 1948 के चुनाव पूर्व अमरीका धमकी दी थी, जिसमें अमरीका ने कहा था कि यदि कम्यूनिस्ट (20 लाख सदस्य) चुनाव जीतते हैं तो वह सैन्य हस्तक्षेप करेगा. सोवियत संघ द्वारा अपना परमाणु निवारक और प्रक्षेपण तंत्र विकसित करने के बाद भी थोड़ा भय बना रहा, क्योंकि रक्षा सचिव कैस्पर वेनबर्गर सहित उच्चस्तरीय अमरीकी नीति के स्तर पर परमाणु हमले की संभावना बनी हुयी थी, जिसमें अमरीका का कम, लेकिन रूस का काफी अधिक नुकसान होता.

 

फिर युध्द का अपना सच मौजूद था. 1930 के दशक के दौरान सोवियत अर्थव्यवस्था ने जापान को छोड़कर किसी भी अन्य देशों की तुलना में काफी तेज प्रगति की. लेकिन सोवियत संघ के औद्योगिक संपत्ति का चौथाई हिस्सा द्वितीय विश्व युध्द के समय ही नष्ट हो चुका था, जबकि इसी दौरान अमरीकी अर्थव्यवस्था ने 10 फीसदी सालाना की दर से प्रगति किया, जो पहले से काफी तेज थी. जर्मनी में 50 लाख 70 हजार युद्धबंदियों से 30 लाख 30 हजार युद्धबंदी मर गये.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

raj singh(rajsinh@hotmail.com)

 
 samata,samanata,samvibhajan,samshram-sahyog ye aise buniyadee sawal hain jo kabhee khatm naheen honge aur inke liye aam insan ke man me lalak rahegee.saath hee saath waqt ke hisab se sirf paimane hee badlenge jarooraten nahin.samyavad me bhi punarikshan ki jaroorat hai aur samikcha hotee rahe jarooree hai.mera apna khyal hai ki arajak poonjeewad kee kabra bhee america me banegee jaise tathakathit samyavad ka khatma soviet me huva. 
   
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