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नक्सल संवाद के मायने

बहस

 

नक्सल संवाद के मायने

दिवाकर मुक्तिबोध


25 जनवरी को नारायणपुर, बस्तर के जंगल से अपहृत किए गए पुलिस के 5 जवानों की रिहाई के आसार बढ़ गए हैं. लगभग दो सप्ताह से राज्य की पुलिस नक्सलियों के कब्जे से उन्हें आजाद कराने के लिए कथित रूप से घनघोर प्रयत्न करती रही. जंगलों में तेज सर्चिंग आपरेशन चलाया गया किंतु उनके ठिकानों का पता नहीं चला.

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इस बीच अपहृत जवानों के परिजनों ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. सरकार से अपील के साथ-साथ नक्सलियों को भी अपनी गरीबी एवं फटेहाली का हवाला देते हुए वे जंगल में मारे-मारे फिरते रहे. यह संभवत: उन्हीं की मार्मिक अपीलों का नतीजा था कि नक्सलियों ने रहम करते हुए 2 फरवरी को अपनी 11 सूत्री मांगें राज्य शासन के समक्ष रखीं.

एक तरह से यह सरकार के साथ अप्रत्यक्ष रूप से संवाद की शुरूआत थी, जो अपहरण की प्राय: प्रत्येक घटना में होती रही है. जाहिर है, उनकी मांगों में कोई नयापन भी नहीं था. वही आपरेशन ग्रीन हंट बंद किया जाए, पुलिस अपनी बैरकों में लौटे, पुलिस नक्सलियों के नाम पर आम ग्रामीणों को सताना बंद करे, फर्जी मुठभेड़ों से बाज आए, अबूझमाड़ में सैन्य प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना का प्रस्ताव रद्द किया जाए तथा छत्तीसगढ़ की जेलों में बंद प्रमुख नक्सली नेताओं को नि:शर्त रिहा किया जाए. चूंकि सरकार के लिए इनमे से किसी भी मांग को स्वीकार करना संभव नहीं है लिहाजा उन्हें इस बार भी गंभीरता से नहीं लिया गया तथा राज्य की पुलिस अपने अभियान में जुटी रही.

अभी चंद माह पूर्व ही 7 जवानों को नक्सलियों ने बीच बस्ती से उठा लिया था. तीन को जान से मारने के बाद शेष को मीडिया की कोशिशों के मद्देनजर, रिहा कर दिया गया. इससे यह साफ है कि नक्सली पुलिस या अर्द्धसैनिक बलों के जवानों का अपहरण सरकार पर दबाव बनाने के लिए करते हैं, अमूमन हत्या की मंशा से नहीं. अलबत्ता अपहृत किए गए एसपीओ यानी विशेष पुलिस अधिकारी पर वे ऐसी दया कभी-कभार ही दिखाते हैं. इन दिनों पुलिस के बाद नक्सलियों के निशाने पर एसपीओ तथा वे लोग हैं जिन पर उन्हें मुखबिरी का शक होता है. अदालतें लगाकर मुखबिरों की हत्या वे इतने नृशंस तरीके से करते हैं कि उसका खौफ लंबे अरसे तक गांव-गांव में कायम रहे. बीते एक वर्ष में बस्तर में हिंसा एवं अपहरण की ऐसी अनेक घटनाएं हो चुकी हैं.

25 जनवरी को अपहृत 5 जवानों की रिहाई आज कल में तय है. इसमें मध्यस्थता सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश कर रहे हैं. नक्सलियों की शर्त है कि वे जवानों को नारायणपुर के जंगल में ही किसी स्थान पर स्वामी अग्निवेश को सौंपेंगे किंतु इस प्रक्रिया के दौरान, 24 घंटे पुलिस का सर्चिंग आपरेशन बंद रहना चाहिए. स्वामी अग्निवेश कैसे माध्यम बने, यह अलग प्रश्न है किंतु उन्होंने अपने तई मुख्यमंत्री को इस शर्त से अवगत कराया. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इस पर हामी भरी है.

अब स्वामी अग्निवेश, मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा, कविता श्रीवास्तव, हरीश धवन एवं न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राजेन्द्र सच्चर नारायणपुर के जंगल में जवानों की रिहाई के गवाह बनेंगे. इन लोगों के साथ ही मीडिया की उपस्थिति नक्सलियों ने मंजूर की है, जो उनकी रणनीति का हिस्सा है.

नक्सली अपहरण एवं रिहाई अभियान के जरिए आम लोगों को यह संदेश देते रहे हैं कि वे शोषण के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं जिसमे कभी-कभी हिंसा भी जरूरी है लेकिन उनमे मानवता भी शेष है जिसकी झलक वे पेश करते रहे हैं.

जाहिर है, प्रचार युद्ध का उनका यह तरीका नया नहीं है. 5 जवानों को अपने कब्जे से आजाद करके वे यह बताएंगे कि पुलिस फेल है तथा अपहृतों की रिहाई उसके बस में नहीं थी. कल्पना की जा सकती है कि नक्सलियों की कैद से मुक्त होने एवं जिंदा बचने के बाद जवानों की मानसिकता क्या रहती होगी. इसके पूर्व अपहरण की सभी घटनाओं में नक्सलियों की मर्जी से रिहा हुए जवानों ने या तो पुलिस की नौकरी से तौबा की या जो हैं, वे अपनी जान की सलामती के लिए नक्सलियों के अहसानमंद हैं. यानी उनके हृदय का एक कोना नक्सलियों के लिए भी धड़कता है. नक्सलियों के इस मानसिक युद्ध का पुलिस के पास निश्चित ही कोई जवाब नहीं है.

जवानों को मुक्त करने में प्रमुख भूमिका निभाने जा रहे स्वामी अग्निवेश की व्यक्तिगत तौर पर यह बड़ी सफलता मानी जाएगी. नक्सली कमांडर चेरीकुरी राजकुमार उर्फ आज़ाद के मारे जाने के बाद कुछ वामपंथी संगठनों ने केन्द्र सरकार के साथ नक्सलियों को वार्ता की टेबल पर लाने उनकी कोशिशों पर संशय प्रकट किया था. आजाद के जरिए यह प्रक्रिया शुरू होनी थी किंतु उसे आदिलाबाद के जंगलों में पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया. इस घटना के बाद केन्द्र सरकार के 'दूत' के रूप में अग्निवेश की भूमिका संशय के दायरे में आ गयी.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट में आजाद हत्याकांड की न्यायिक जांच की उनकी याचिका स्वीकृत होने एवं इसके लिए केन्द्र सरकार को निर्देशित करने के बाद संदेह का कुहासा कुछ छंटा है तथा अब छत्तीसगढ़ के 5 जवानों की रिहाई उनकी मध्यस्थता में संभव होने से 'वार्ताकार' के रूप में उनकी विश्वसनीयता फिर से बहाल हुई है.

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने जवानों की सकुशल वापसी को तरजीह देते हुए जिस संवेदनशीलता का परिचय दिया है, वह अद्भुत है. नारायणपुर क्षेत्र में 24 घंटे के युद्ध विराम की शर्त को स्वीकार करके उन्होंने अनायास अपने उस रूख में लचीलेपन का संकेत दिया है, जो नक्सलियों के साथ सशर्त वार्ता के लिए कभी राजी नहीं होता.

केन्द्र सरकार में गृहमंत्री का ओहदा संभालने के बाद नक्सली हिंसा एवं वार्ता के सन्दर्भ में पी.चिदम्बरम के भी अनेक बयान आए थे जिसमे उन्होंने वार्ता की इच्छा जतायी तथा अपनी ओर से कुछ शर्तें भी पेश की. जवाब में नक्सलियों ने पहले तीन महीने और बाद में सिर्फ 72 घंटे आपरेशन ग्रीन हंट बंद रखने की प्रमुख शर्त रखी थी किंतु इन्हे स्वीकार नहीं किया गया. वार्ता के लिए दरवाजे खुलते और बंद होते रहे. इस दौरान नक्सली भी हिंसा करते रहे तथा पुलिस भी उनका खात्मा करती रही. दोनों ओर से जारी हिंसा का ग्राफ ऊपर-नीचे होता रहा है.

सरकार के स्तर पर यह कहा जाता है कि नक्सली वार्ता की पेशकश आंखों में धूल झोंकने के लिए करते हैं ताकि वे शक्ति संचयन कर सके. यह बात ठीक हो सकती है पर इसे एक बार आजमाने में क्या हर्ज है? आखिरकार नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने 'युद्ध विराम' तो मंजूर किया, भले ही वह 24 घंटे का ही क्यों न हो. नारायणपुर क्षेत्र में 24 घंटे सर्चिंग आपरेशन के बंद रहने का बड़ा फायदा नक्सलियों को जान की हिफाजत के रूप में मिलेगा. नक्सली उन्मूलन अभियान के लिए निश्चय ही यह झटका होगा किंतु 5 जवानों की जान बख्शी के एवज में यह नुकसान कुछ भी नहीं. इसलिए नक्सल समस्या के सन्दर्भ में जवानों की रिहाई को एक नयी कोशिश के रूप में देखा जा सकता है.

यदि किसी एक क्षेत्र में 24 घंटे सर्चिंग आपरेशन, जो ग्रीनहंट का ही हिस्सा है, बंद रखा जा सकता है तो यह छत्तीसगढ़ के सभी 11 नक्सल प्रभावित जिलों में 48 या 72 घंटे भी बंद रखा जा सकता है बशर्ते नक्सली हथियार डालकर वार्ता की टेबिल पर आए.

कुछ वर्ष पूर्व आंध्र प्रदेश सरकार ने अपने नक्सली अभियान में एक भावनात्मक हथियार का प्रयोग किया था. उसने नक्सलियों के माता-पिता एवं परिजनों से घर लौटने की मार्मिक अपील करवाई थी जिसका परिणाम सुखद रहा तथा अनेक नक्सलियों की घर वापसी हुई. ऐसी कोई पहल छत्तीसगढ़ सरकार ने नहीं की है लेकिन कुछ घंटे के 'युद्ध विराम' का प्रस्ताव स्वीकार करके उसने नक्सली समस्या के समाधान की दिशा में एक राह जरूर खोली है. पी.चिदम्बरम की तरह रमन सिंह भी निरंतर कहते रहे हैं कि सरकार वार्ता के लिए राजी है लेकिन इसमे कितनी गंभीरता है, इसका पता इसी बात से चलता है कि इसके लिए सायास प्रयास कभी नहीं हुए. स्वामी अग्निवेश एवं अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ता मध्यस्थता निभाने तैयार हैं तो इंतजार किस बात का है? अब तो इसकी शुरूआत होनी चाहिए. यह छत्तीसगढ़ से हो तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है?

10.02.2011, 01.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

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दीपक [deepakrajim@gmail.com] आबूधाबी

 
  सहमत...संवाद स्थापित करने की पहल अवश्य की जानी चाहीये. 
   
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