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जूते के ही बहाने

बहस

 

जूते के ही बहाने

मनीष शांडिल्य


पिछले कुछ समय से राजनीतिज्ञ जूतों का 'शिकार' होते रहे हैं. कभी जूते चलाकर उनका 'शिकार' करने की कोशिश होती है तो कभी वो जूते साफ करवाते हुए आलोचना के शिकार होते हैं. शुरुआत अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश 'जुनियर' से हुई थी और ताजा मामला उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से जुड़ा है.

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मायावती से जुड़े विवाद पर टिप्पणी करने के पहले जरा इतिहास पर एक नजर डालना समीचीन होगा. आजादी के पहले हजारों वर्षों तक देश की बहुसंखयक जातियां सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक रूप से हाशिये पर थीं और शोषण-उत्पीड़न का शिकार थीं. ऐसा सोपान आधारित जाति व्यवस्था के कारण था, जिसमें सिर्फ जन्म के आधार पर किसी का श्रेष्ठ या निकृष्ट-घृणित होना तय कर दिया जाता था, जिसे कभी राम मनोहर लोहिया ने 'ब्राह्मणवाद की आत्मा' कहा था. इसी व्यवस्था में श्रम के प्रति हिकारत भी निहित था.

वीडियो फुटेज में निजी सुरक्षा अधिकारी (पीएसओ) से अपनी जूती साफ करवाती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, जो खुद दलितों का रहनुमा होने का दावा करती हैं, उसी ब्राह्मणवादी सोच को साकार करती हुई दिखाई देती हैं. साथ ही यह उनका सामंती चरित्र भी दिखाता है.

मायावती के मामले में तो ब्राह्मणवाद का विस्तार इस रूप में भी दिखाई देता है कि अब सिर्फ जन्म के आधार पर ही नहीं बल्कि एक तबका 'पावर' के दम पर भी खुद को बड़ा मानने लगा है. यह 'पावर' चाहे पद से आ रहा हो या पैसों से. लेकिन पहली नजर में नव-ब्राह्मणवाद, सामंतवाद, मानवीय गरिमा और चाटुकारिता (कई तरह का व्यक्तिगत लाभ पाने के लिए आज के नौकरशाह अपनी गरिमा को नेताओं के पास गिरवी भी रखते हैं) से जुड़ा दिखाई देने वाला यह मामला मूल रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों से जुड़ा है क्योंकि लोकतंत्र में इन प्रतिगामी मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं हो सकती है. हालांकि मायावती को याद करते हुये इंदिरा गांधी और संजय गांधी के ऐसे कई प्रसंग भी याद आ जाते हैं, जब उनके कृपापात्र बनने के लिये राज्यों के मुख्यमंत्री और बुजुर्ग कांग्रेसी नेता इनके जूतों को साफ करने में परमानंद का अनुभव करते थे.

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था बीते 63 वर्षों के दौरान अपनी तमाम सीमाओं और आलोचनाओं के बावजूद हाशिये पर पड़ी जातियों को सत्ता में भागीदार बनने या इसके शीर्ष पर पहुंचने का मौका देती रही है और आगे भी देती रहेगी. लेकिन मायावती इसका जीवंत उदाहरण हैं कि कोई किस तरह ब्राह्मणवाद की तीखी आलोचना कर एक समतामूलक समाज की दिशा में बढ़ने के बजाए, इस आलोचना को सीढ़ी बनाकर खुद सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना भर चाहता है. इसके बाद ब्राह्मणवादी व सामंती मूल्यों को तोड़ने के बजाए उन्हीं को पुष्ट करने में, उनका औचित्य सिद्ध करने में लग जाता है.

मायावती की शैली व इस 'दुर्घटना' के समर्थन में दिया जाना वाला तर्क-कुतर्क यह दर्शाता है कि इन जैसों का उदेश्य समाज की वर्तमान विभेदकारी व्यवस्था के खिलाफ नारे देकर, राजनीतिक गोलबंदी कर सत्ता पाना भर है. ये व्यवस्था परिवर्तन और इसके लिए जाति व्यवस्था को तोड़ने, जातियों के बीच हीनता व उच्चता बोध को समाप्त करने की जगह ऐसा करने के आवरण में सिर्फ सत्ता तक पहुंचना भर चाहते हैं. मनुवाद का विरोध कर अपने लिए राजनीतिक जमीन तैयार करते हुए खुद मनुवादियों की श्रेणी में आ गये हैं. यह अलग बात है कि इस प्रक्रिया के दौरान वंचित-पीड़ित जातियों का स्वाभाविक रूप से थोड़ा सशक्तिकरण हो जाता है. लेकिन समतामूलक समाज निर्माण के एजेंडे को कोई खास गति नहीं मिल पाती है.

लेकिन मायावती की आलोचना करने के साथ-साथ अपने आस-पास एक नजर डालना भी जरूरी है. ऐसा करने पर हम पायेंगे कि राजभवन से लेकर आम घरों तक में कोई अरदली, काम करने वाली बाई, बाल-श्रमिक किसी-न-किसी का जूता साफ करने को मजबूर किया जा रहा है. इस स्थिति को भी बदलने की जरूरत है.

चाहरदीवारी के अंदर 'पद्म सिंह' बनने को मजबूर करने वाली प्रक्रिया को रोके बिना मायावती की आलोचना शीशों के घरों में रहते हुए दूसरे पर पत्थर फेंकने के जैसा ही होगा. साथ ही जूते के बहाने ही सही नेताओं-अफसरों के पीछे छाता लेकर चलने, उनके लिए वाहनों का दरवाजा खोलने जैसे कार्यों, जिसे निचले स्तर के कर्मचारियों-कार्यकर्ताओं के लिए आधिकारिक कार्य या नैतिक जिम्मेवारी बना दिया गया है, को भी आलोचना के केंद्र में लाया जाना चाहिए.

एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में इस राजसी या सामंती ठसक की कोई जगह नहीं हो सकती. इसके अलावा जिस ब्राह्मणवादी मानसिकता का ऊपर जिक्र है, उसे सूक्ष्म रूप में हम कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान मजदूरों पर हुए शोषण, भाजपा विधायक की हत्या की आरोपी रूपम पाठक के प्रतिशोध, हर घंटे बलात्कार का शिकार होने वाले मासूमों की पीड़ा और हर तरह का अत्याचार की घटनाओं में देख सकते हैं. हम अगर ऐसा कर पायें तब यह भी देख पायेंगे कि कौन सा वर्ग आज भी ब्राह्मणवाद का पोषक बना हुआ है. मायावती की शैली और उनकी राजनीतिक मजबूरियों के चलते उनके द्वारा इस दुर्घटना पर किसी सार्वजनिक आत्म-आलोचना की आशा नहीं की जा सकती है. लेकिन यह जरूरी है कि लोकतंत्र के लिए नारा बुलंद करने वाले बाकी सभी इन 'जूतों के आइने' के सामने खुद को एक बार खड़ा करें.

11.02.2011, 18.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Farzana Versey [kaaghaz.kalam@gmail.com] Mumbai, India

 
  Today, Mayawati is stomping on this very terrain. Her feet and shoes become a subject that is more manifestly potent of power-reversal. When she was sworn in as chief minister, the Brahmin MLAs refused to touch her feet, a practice that has become fairly common. Surprisingly, some of them went ahead and touched her Brahmin minister Satish Chandra Misra’s feet. Therefore, she may have striven to take the Dalit agenda ahead but due to the nature of our society her own attitude had to change. Her brashness could well be part of her personality and nothing to do with her caste, but there is no denying that some of it is a response. Her exaggerated projection of herself and her ideology is clearly an indication. The statues of herself, a ridiculous granite park, the portrayal of herself as the inheritor of Ambedkar via Kanshi Ram are at odds with the commonly-held view of the backward classes. It is this that shakes the citadel.

The problem here is humanitarianism is a class issue. Have you heard about Dalit humanitarianism? You are not supposed to. This ‘act of grace’ has been taken over by the higher castes and classes, sometimes garbed as philanthropy, tax exempted of course.

Mayawati may be aggressive, greedy and feudal. She may do nothing for the Dalit cause at the micro level, but the large picture sends out a clear message and reveals the true face of the high-born opponents. Even if inadvertently, she ends up thinking on her feet.
 
   
 

अजय कुमार सेन [] गोरखपुर, उत्तर-प्रदेश

 
  मायावती ने जब मूर्तियां बनवाई थीं, तभी यह समझ में आ गया था कि मायावती का दलित प्रेम अंत में ब्राह्मणवादी व्यवस्था के ही चरणों में लोटेगा. जय ब्राह्मणवाद, जय सामंतवाद, जय मायावती. 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida

 
  कर्पूरी ठाकुर के बाद असली दलित नेता कोई नहीं हुआ. सब के सब दलित हो कर भी जब सत्ता तक पहुंचे तो उनके लक्षण सवर्ण सामंतों जैसे हो गये, एकदम कट्टर ब्राह्मणवादी. रामविलास पासवान से लेकर कांशीराम और बहन मायावती तक. यह सत्ता का चरित्र है और हमारे समाज की चरित्रहीनता कि हम सब उसी ब्राह्मणवादी व्यवस्था में चाहे-अनचाहे जिंदा रहना चाहते हैं. 
   
 

shweta [] New Delhi

 
  First I apologize for my language but after reading the article I could not stop myself from applauding his views on present scenario of social uplift in our country.His clarity of expression and views are commendable.Too good. 
   
 

Sujit Kumar [sujitkumar_2001@gmail.com] Wardha

 
  मायावती के पैर में किचड़ लगा था तो उस कर्मचारी ने साफ कर दिया. यह बहुत सामान्य घटना है. इसे तूल देने वाले लोग स्वयं सामंती हैं. उन्हें लगने लगा है कि मायावती के साथ ऐसा कैसे हो गया. यह तो ब्राह्मणों का, ठाकुरों का हक है. मनीष जी, इस घटना को एक महिला के प्रति सम्मान के भाव से देखें तो बात स्पष्ट हो जायेगी. 
   
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