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मिस्र का मुकद्दर

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मिस्र का मुकद्दर

एम जे अकबर


सलाहुद्दीन अय्यूबी, जिन्हें सलादिन के नाम से ज्यादा जाना जाता है, बड़े अच्छे तरीके से समझ गए होते कि वर्ष 2011 में काहिरा में क्या हो रहा है. आठ शताब्दियों पहले, जब वे जेरुशलम पर फिर से कब्जा करने निकले थे तो उन्होंने अपना रुख अरब एशिया के किसी भी अन्य मुजाहिद देश की तरफ नहीं किया, बल्कि काहिरा के तरफ मोड़ा, जिससे कि वे उस सड़ते हुये शासन का खात्मा कर सकें, जिसने अपने आत्मसंतुष्टि से परिपूर्ण नपुंसकता से मिस्त्र को जकड़ लिया था. सलादिन जानते थे और उन्होंने कहा भी कि अरब दुनिया के दिलों को जीते बिना अरब की जीत संभव नहीं है.

खलिफा अबासिद की सत्ता के विघटन होते ही अधिकेंद्र बगदाद से हट कर दूसरी ओर मुड़ गया और अभी भी वो वहीं स्थिर है. जब यूरोप ने अपना उपनिवेशीकरण शुरु किया तब नेपोलियन एलेक्सेंड्रिया की ओर मुड़ा, क्योंकि वो जानता था कि ब्रिटिश भारत और कोंस्टेंटनिपोल का कूटनितिक रास्ता मिस्त्र के जरिये ही जाता है. जब ब्रितानियों ने तय किया कि अब हस्तक्षेप करने का समय है, उन्होंने लार्ड क्रोमर को काहिरा भेजा.

जब काहिरा में एक तानाशाह धराशायी होता है, दूसरे सभी ढुलमुल सत्तासीनों को सन्निपात हो जाता है. राजा के तमाम साधन और तानाशाह के सभी प्यादे मिलकर भी उन्हें दुबारा नहीं जोड़ सकते. अब यह वक्त का मामला होता है और वक्त ने अपनी वफादारी तानाशाहों से हटाकर जनतंत्र समर्थकों के साथ जोड़ ली है.

अपनी ही किसी किताब से उद्धरण देना बड़ा ओछा और अजीब-सा लगता है, पर 2002 में प्रकाशित ‘द शेड ऑफ सोर्डस’ की एक थीम यह भी थी कि अधिकांश अरब संसार अपनी फ्रांसीसी क्रांति से 10-15 बरस ही दूर था. सौभाग्य से, यहां सिर काटने के उपकरण नहीं हैं, लेकिन 21वीं सदी ने राज्य के सर्वेसर्वा के खिलाफ आम जनता की लामबंदी के हथियार के तौर पर गांधी की अहिंसा की शक्ति को पुन: खोज लिया है. नील नदी में कोई खून नहीं बहा है, स्फिंक्स की मूर्ति पर कोई दाग नहीं है और काहिरा में जनता के पास ताकत है.

यह सच है कि शक्ति का हस्तांतरण अभी भी प्रक्रिया में है. समय से पहले ही जीत की घोषणा कर देना भ्रमित करने जैसा होगा. ट्यूनीशिया में धूल अभी भी उठ रही है, जहां पुरातन शासन कई दशकों में जनता से झपटी गई परिसंपत्तियों को बचा लेने की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है. बिलाशक ऐसे प्रलोभन मिस्र में दिखाई देंगे. लेकिन अगर अभिजात मिस्र को उसकी मुक्ति देने से इंकार करते हैं, तो आज का गुस्सा कल के प्रचंड रोष में बदल जाएगा.

छह दशकों तक पश्चिमी संवाद में इजराइल के लोकतंत्र की प्रशंसा और मरणासन्न अरब तानाशाहियों को फटकार दी जाती रही है, जो सरासर गलत नहीं थी. अगर समुचित न हो, तो भी यह अरबों के सीमित आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए एक वैध मान्य स्पष्टीकरण था. तब क्यों इस लोकतांत्रिक क्रांति की संभावनाओं को लेकर तेल अवीव आशंकित है और पश्चिम घबराया हुआ? क्योंकि लोकतंत्र अकेले सफर नहीं करता. यह हमेशा राष्ट्रवाद के साथ चलता है. आप लोकतंत्र के बगैर राष्ट्रवाद रख सकते हैं, लेकिन बिना राष्ट्रवाद के लोकतंत्र नहीं रख सकते.

ज्वालामुखी के अंदर उबलते लावे को आखिर आप कितने लंबे समय तक रोके रख सकते हैं?

पश्चिम की दुनिया वास्तव में तानाशाहों के विकल्प के तौर पर मुस्लिम ब्रदरहुड के उदय से भयभीत नहीं है, क्योंकि यह एक सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन है, जो चूर-चूर किया जा सकता है. यह तो ऐसी सरकारों के उदय को लेकर चिंतित है, जो घरेलू अलगाववादियों और विदेशी आकाओं की बजाय जनता के हितों को ऊपर रखती हैं. इसी चिंता ने पश्चिम को हस्तक्षेप से तब भी रोका, जब तानाशाह अपने ही देश को लूट-खसोट रहे थे.

हम अभी भी यह नहीं जानते कि हुस्नी मुबारक ने स्विस व अन्य बैंकों में कितना कुछ जमा कर रखा है, पर अफवाहें इस आंकड़े को चौंका देने वाली ऊंचाई पर ले जाती हैं. ट्यूनीशिया के जाइन अल-अबिदीन बेन अली के परिवार द्वारा चलाई गईं ढेरों कंपनियां प्रश्रय की शक्ति का सबूत हैं. सबसे दिलचस्प यह है कि उनका परिवार बैंकिंग व्यवस्था को नियंत्रित करता था. उनके ब्रदर-इन-लॉ बेलहसन त्रबेल्सी बैंक ऑफ ट्यूनीशिया के मालिक थे, बेटी नसरीन के पास जिटोउना बैंक और अल तिजारी बैंक था, तो दूसरी बेटी सिरीन अरब इंटरनेशनल बैंक ऑफ ट्यूनीशिया चलाती थी और तीसरी बेटी गजोउआ मेडियोबांका. जब आपके पास अपना बैंक हो, तो स्विट्जरलैंड क्यों जाया जाए?

तानाशाह स्थायी प्रतीत होते हैं, लेकिन उनके राज में देश सतह के नीचे उबलता रहता है. ज्वालामुखी के अंदर उबलते लावे को आखिर आप कितने लंबे समय तक रोके रख सकते हैं? इस बिंदु पर यह विस्तार हो सकता है, लेकिन यह मायने रखता है: समकालीन काहिरा और कोलकाता के बीच क्या कुछ समान है?

एक शहर नील नदी के किनारे है और दूसरा गंगा के, इन दोनों शहरों में नागरिक तीन दशक के शासन के बाद सरकार को सत्ता से बाहर कर देना चाहते हैं. इसके बाद अंतर शुरू होता है. बंगाल के कम्युनिस्टों ने लोकतंत्र में शासन किया है, जबकि काहिरा में सैन्य पोषित शासन भय, चालबाजी और निर्दयता के घालमेल में फला-फूला है. काहिरा के नौजवान उन पर भरोसा नहीं कर सकते, जिन्होंने उन्हें लंबे समय से धोखा दिया है और अब वे बदलाव चाहते हैं.

कोलकाता के युवाओं को निर्वाचन आयोग द्वारा तय घड़ी के लिए कितना भी इंतजार करने में कोई दिक्कत नहीं है. लोकतंत्र सतत चलने वाली शांतिपूर्ण राजनीतिक क्रांति होती है. मिस्र ने अपनी नियति पा ली है और इसकी नियति चारों ओर की दुनिया को बदल देगी.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

13.02.2011, 20.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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