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बेशर्म बयान

बात पते की

 

बेशर्म बयान

नंद कश्यप


प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गायक राहत फतेह अली ख़ान में क्या समानता है, इस सवाल का सीधा जवाब हो सकता है कि दोनों मुस्कुराते हुये बेशर्मी के साथ अपनी बात पेश करने में माहिर हैं. राहत फतेह अली खान जिस दिन पांच लाख डालर की अवैध रकम लेकर जाते पकड़े गये, उन्होंने बहुत भोलेपन के साथ तर्क दिया कि पांचवीं पास होने के कारण उन्हें उस कानून का पता नहीं था, जिसमें इतनी रकम ले जाना अवैध है.

अब तक के सर्वाधिक पढ़े-लिखे समझे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी राहत फतेह अली के अंदाज में ही जवाब दे रहे हैं. पिछले दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों-पत्रकारों के साथ बातचीत में मजबूरी के परदे के पीछे अपनी सामूहिक जिम्मेवारी को प्रधानमंत्री ने किसी कव्वाल की मुद्रा में ही झटक दिया. प्रधानमंत्री के अधिकांश जवाब बिल्कुल उसी अंदाज में थे कि भाई, मैं तो परदेसी आदमी हूं, मुझे क्या पता कि ये चांद है या सूरज.

संभव है कि राहत फतेह अली ख़ान को भारतीय कानून की जानकारी नहीं हो या कम हो लेकिन अपने भ्रष्ट मंत्रिमंडल को नहीं जानने की बात करने वाले प्रधानमंत्री को यह तो पता ही होगा कि भारतीय कानून किसी अज्ञानी को अपराध की छूट नहीं देता, न ही उसके अज्ञानी होने से उसका अपराध या सजा कम होती है. अगर इसके बाद भी प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्हें इसका पता नहीं था कि उनके पीछे क्या कुछ चल रहा है तो इसके कारणों को समझना मुश्किल नहीं है.

अल्प स्मृति वाले भारतीय मानस में से कुछ लोगों को याद होगा कि यूटीआई का यूस 64 घोटाला उसी ज़माने में हुआ था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री थे. इस घोटाले में लाखों मध्यमवर्गीय भारतीयों का पैसा डूब गया था. देश में जब शेयर बाज़ार घोटाले के साथ हर्षद मेहता भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा खलनायक बन कर उभरा, उस समय देश की आर्थिक बागडोर मनमोहन सिंह के ही पास थी. इस घोटाले पर मनमोहन सिंह ने संसद में बयान दिया था- “अगर शेयर बाजार में एक दिन उछाल आ जाए और दूसरे दिन गिरावट हो तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपनी नींद हराम कर लूँ.”

मनमोहन सिंह की सफलता का सच राजा जैसे मंत्री हैं, बेतहाशा महंगाई है, कारपोरेट की लूट है और सरवाईवल फॉर द फिटेस्ट जैसे जुमले हैं.


लेकिन पूरे देश के करोड़ों लोगों की नींद हराम करने वाले मनमोहन सिंह संपादकों के साथ बातचीत में कहते हैं कि भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्रियों के लिये वो इसलिये जिम्मेवार नहीं हैं क्योंकि वे मंत्री गठबंधन के दल द्वारा मनोनीत मंत्री हैं. इस बयान से लगता है कि मनमोहन सिंह अभी भी नींद में हैं या नींद में होने का नाटक कर रहे हैं.

यह बात बहुत साफ है कि प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में कौन मंत्री होगा, यह तय करना प्रधानमंत्री की जिम्मेवारी होती है, यह उसका विशेषाधिकार होता है. ऐसे में किसी भी मंत्री को उसकी पार्टी द्वारा मनोनीत मंत्री बतलाना हास्यास्पद तो है ही, यह गैरजिम्मेदाराना भी है. इसका अर्थ तो यह हुआ कि गठबंधन सरकार के सारे मंत्री अपनी-अपनी पार्टियों से मनोनीत है और प्रधानमंत्री खुद मुख्तार और मजबूर हैं. भारतीय लोकतंत्र की इससे दुर्भाग्यजनक स्थिति नहीं हो सकती.

प्रधानमंत्री से पूछने का मन करता है कि क्या प्रधानमंत्री कारपोरेट हितों को भी इतने ही गैरजिम्मेदाराना ढंग से नकार सकते हैं? ज़ाहिर है, इसका जवाब ‘नहीं’ में ही होगा क्योंकि अंततः मंत्रिमंडल को लेकर उनका बेशर्म बयान उन कारपोरेट आकाओं को बचाने की ही तो कोशिश है, जो अरबों रुपये लूट कर इस देश के कानून को धता बता रहे हैं.

दिलचस्प यह भी है कि मंत्रियों की जिम्मेवारी नहीं लेने वाले प्रधानमंत्री दूसरी ओर दावा करते हैं कि उनका गठबंधन बहुत समन्वय से काम कर रहा है और गठबंधन में किसी तरह का मतभेद नहीं है. गोया वो यह बताने की कोशिश कर रहे हों कि भ्रष्टाचार भी इसी समन्वयपूर्वक काम करने का नतीजा है.

प्रधानमंत्री ने अपनी सफलता और गौरव के विषयों में दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सुरक्षा परिषद के पांच देशों के सदस्यों के भारत आगमन को भी गिनाया. लेकिन प्रधानमंत्री यह सब कहते हुये, यह बताना भूल गये कि इन राष्ट्राध्यक्षों ने अपने देश के लोगों के लिये लगभग ढ़ाई लाख रोजगार के अवसर सृजित किये. क्या मनमोहन सिंह भारत के लिये भी ऐसा कोई अवसर कहीं तलाश पाये ? अगर नहीं तो फिर इन राष्ट्राध्यक्षों की यात्रा किसके लिये सफलता का विषय है?

मनमोहन सिंह की सफलता का सच राजा जैसे मंत्री हैं, बेतहाशा महंगाई है, कारपोरेट की लूट है और सरवाईवल फॉर द फिटेस्ट जैसे जुमले हैं. मनमोहन सिंह की सफलता में बराक ओबामा जैसे राष्ट्रपति भी शामिल हैं, जो कहते हैं कि मनमोहन सिंह को पूरी दुनिया गंभीरता से सुनती है. ओबामा अपने साम्राज्यवादी विस्तार के लिये इस तरह के चुटकुले सुनाते हैं और दुर्भाग्य से उसे सच मान लिया जाता है. कौन जाने, चरमराती अर्थव्यवस्था और इतिहास के वृहत्तर घोटालों के बीच मनमोहन सिंह को शायद ओबामा के चुटकुले पर ही हंसी आ रही हो !

18.02.2011, 23.31 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bhagat singh panthi [] bhopal - 2011-04-30 11:51:35

 
  आपने बहुत ही क्रन्तिकारी लेख लिखा है. अब हमें अपने इस तरह के प्रधान मंत्री को हटाने के लिए कोई बड़ा जन आन्दोलन चलाना चाहिए. 
   
 

BALESHWAR [anita.kindo@yahoo.co.uk] Delhi -

 
  सोनिया गांधी के द्वारा चुना व्यक्ति सोनिया भक्त हो सकता है ईमानदार या देशभक्त नहीं. सारी स्थिति और परिस्थिति उसको मालूम थी.असल में मनमोहन सिंह विश्व बैंक और अमरीका के दलाल हैं. इस दलाल से और कोई उम्मीद पालना बेकार है.फिर इनके खिलाफ भ्रष्टाचार अभियान चलाया जाये. आज भारत को आजाद हुये 64 साल हो गये, जिसमें कांग्रेस 55 साल तक सत्ता में थी. 400 लाख करोड़ रुपये के काले धन में क्रांगेस भी भागेदार है, ऐसा सौ फीसदी लगता है. बाबा रामदेव की बात सौ फीसदी सही है. ताजा बजट बताता है कि रोजमर्रा की बस्तुओं पर कर और रोजमर्रा से अळग जीवन की वस्तुओं पर कोई कर नहीं, means how to find more text to people to scame next as BLUNDER. 
   
 

NK Thakur [] RAJNANDGAON C.G. -

 
  सोनिया गांधी के द्वारा चुना व्यक्ति सोनिया भक्त हो सकता है ईमानदार या देशभक्त नहीं. सारी स्थिति और परिस्थिति उसको मालूम थी. उसकी खामोशी का राज भी यही है कि वो सच बोल नहीं सकता क्योकि घोटालों में उसका नहीं, सोनिया गांधी की सहमति थी. एक न एक दिन यह भी मालूम हो ही जायेगा. आपके लेख से मैं सहमत हूँ. इसमें शंका नहीं कि ... बात पते की है. 
   
 

bhagatsingh [] raipur -

 
  मनमोहन सिंह खुद कितने नैतिक हैं, ये तो उनका असम से स्थायी निवास बता कर राज्यसभा का सदस्य चुने जाने से ही पता चल जाता है. पता नहीं क्यों उन्हें ईमानदार माना जाता है. वे तो वैसे भी हमेशा से अमरीका के अजेंडे पर ही चलते हैं. 
   
 

pradeep [] bilaspur -

 
  नन्द जी अच्छे विश्लेषण के लिए बधाई. मजे की बात यह है की खुद श्री मनमोहन जी को भी मालूम है की उनके इस तरह के बयां की क्या प्रतिक्रिया होगी. पर ऐसा करना काफी सोची हुई रणनीति का हिस्सा है. वे चाहते है कि कुछ दिन लोग उन मूल सवालो को भूल कर उन्हें गरियाते हुए अपनी निराशा को mild कर ले. या फिर UPA2 किसी नए पपलू को ला कर किंग बना दे. और राडियास्खलन के संकट से जूझ रहे तमाम पत्रकार गर्व करने का कम से कम एक मौका हासिल कर लें. मूल प्रश्न इस निराशा को अगले चुनाव तक किसी भी तरह divert करने का है. मनमोहन सिंह interview में सिर्फ एक चीज के लिए मओवादियो से भी ज्यादा काफी कांफिडेंट है इस देश में Egypt नहीं दुहराया जा सकता. यानी बिना किसी हिंसा के राजनीति को बदलने की प्रक्रिया नहीं संभव है. हो सकता है वे सच बोल रहे हो. 
   
 

अजय सिंह [ajay.singh.2000@hotmail.com] पटना -

 
  आज के दिन, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस देश के सर्वाधिक कलंकित राजनेता हैं. ऊपर से जब वो कैमरे के सामने मुस्कुराते हैं तो लगता है कि वो देश के उन 70 करोड़ लोगों का खून चूस कर ड्रैकुला की तरह मुस्कुरा रहे हैं. इस बेईमान प्रधानमंत्री को जितनी जल्दी हो सके, हटाना चाहिये, वरना ये प्रधानमंत्री देश का प्राईवेटाइजेशन कर देगा. 
   
 

Anita Kindo [anita.kindo@yahoo.co.uk] Manila -

 
  मनमोहन सिंह भी मनोनीत प्रधानमंत्री हैं. पत्रकारों से बातचीत में तो मनमोहन सिंह उल्टा मीडिया को ही पाठ पढ़ाने पर तुले हुये थे. मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत की ऐसी छवि जा रही है कि भारत में भ्रष्टाचार वाली सरकार है. बातचीत में सबसे पहले मनमोहन सिंह ने 2-जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, देवास, आदर्श सोसाइटी मामले का ज़िक्र किया और कहा कि मीडिया में इन सब मामलों पर ख़बरें छाई हुई हैं. तो भैय्या मनमोहन, ये बताओ की मीडिया आखिर किसकी खबर छापे ? ये कि सोनिया गांधी ने कौन से रंग की साड़ी पहनी है और आपकी पगड़ी का रंग कैसा है या ये कि चिदंबरम ने कहां से अपनी नई धोती खरीदी या ये कि प्रणव बाबू ने आज कितने समोसे खाये? 
   
 

devesh [deveshrisk@gmail.com] bilaspur -

 
  मनमोहन और राहत में एक समानता ये भी है कि राहत ज्यादातर दूसरों की रचनाओं को गाते हैं तो मनमोहन सिंह भी सोनिया के कहे शब्दों को ही बांचते हैं. 
   
 

Sanjay Kumar Tiwari [sanjaytiwari_2002@gmail.com] Kolkata -

 
  आपने प्याज की परत की तरह मनमोहन सिंह की गंदगी को उधाड़ने का काम किया है. असल में मनमोहन सिंह विश्व बैंक और अमरीका के दलाल हैं. इस दलाल से और कोई उम्मीद पालना बेकार है. 
   
 

nitin jain [] jaipur -

 
  ये लोग नंगे हैं. नंगे से तो खुदा भी डरता है. लेकिन आवाम खुदा न बने.जनता एक टीम चुने 11 भ्रष्ट नेताओं की, फिर इनके खिलाफ भ्रष्टाचार अभियान चलाया जाये. 
   
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