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अपहरण की पॉलिटिक्स

बहस

 

अपहरण की पॉलिटिक्स

दिवाकर मुक्तिबोध


ओडिशा के मलकानगिरी जिले के युवा कलेक्टर आर.वीनेल कृष्णा को चित्राकोंड़ा से अपहृत किए जाने की घटना केवल इस मायने में चौंकाने वाली है कि नक्सलियों ने पहली बार किसी आईएएस को अपने कब्जे में किया है. इस घटना के बाद नक्सल प्रभावित राज्यों विशेषकर छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक अधिकारियों को सतर्क रहने की जरूरत है. यह माना जा सकता है कि अपनी मांगें कबूल करवाने के लिए नक्सली अब बडे अधिकारियों पर हाथ डाल सकते हैं. मलकानगिरी के जिला दंडाधिकारी के अपहरण की घटना नक्सलियों की बदली हुई रणनीति का भी संकेत है.

जंगलों में तैनात पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बलों के जवानों को अपने जाल में फांसकर हमला करने के बजाए माओवादी फिलहाल अपहरण की 'युद्धनीति' पर अमल कर रहे हैं जिसमें उनकी जान की भी सुरक्षा है और वे शर्तें मनवाने में भी कामयाब रहते हैं. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्होंने हिंसा से तौबा कर ली है या गुरिल्ला युद्ध को तिलांजलि दे दी है. हिंसा और आतंक तो उनके वजूद के साथ चस्पा है लिहाजा अपहरण के साथ-साथ हिंसा का छुटपुट दौर भी जारी है. हिंसा के साथ-साथ अपहरण की बढ़ती घटनाएं इस बात का प्रमाण है कि माओवादी हर हाल में केन्द्र एवं राज्य सरकारों को झुकाना चाहते हैं और अपनी शर्तों पर बातचीत के लिए बाध्य करना चाहते हैं. कुछ हद तक वे इसमें कामयाब भी हैं.

25 जनवरी को उन्होंने बस्तर के नारायणपुर जिले के मोहराबेड़ा से 5 पुलिस जवानों का अपहरण किया. उन्हे छुड़ाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार ने सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश की मध्यस्थता कबूल की और 72 घंटे सर्च आपरेशन बंद रखा. अब मलकानगिरी के कलेक्टर का अपहरण करके माओवादियों ने 7 शर्तें ओडिशा सरकार के सामने रखी हैं. ये वे ही शर्तें हैं जो छत्तीसगढ़ सरकार के सामने रखी गयीं थीं. इन शर्तों में एक शर्त तत्काल स्वीकार करते हुए ओडिशा की पुलिस ने सर्चिंग आपरेशन बंद कर दिया है. माओवादियों एवं सरकार के बीच संवाददूत के रूप में स्वामी अग्निवेश ने भी अपनी सेवाएं पेश कर दी हैं. हालांकि नक्सलियों ने वार्ता के लिए अपनी ओर से 3 नाम दिए हैं. खबरों के मुताबिक इन नामों में सम्बलपुर विश्वविद्यालय के व्याख्याता हरगोपाल, आर.राव तथा सीपीआई नेता दंडपाणि महंती शामिल हैं. स्वामी अग्निवेश का भी नाम मध्यस्थ के रूप में लिया जा रहा है.

नक्सलियों की एक और मांग है ओडिशा की जेलों में बंद अपने नक्सली साथियों की रिहाई की. 11 फरवरी को नारायणपुर के करियामेटा जनअदालत के दौरान भी स्वामी अग्निवेश के सामने नक्सली कमांडरों ने यही मांग रखी थी. अब उड़ीसा सरकार के सामने इस शर्त को रखने का सीधा अर्थ है माओवादी देश की जेलों में बंद अपने तमाम साथियों की रिहाई चाहते हैं और अपहरण के जरिए दबाव बना रहे हैं. हालांकि यह मांग नयी नहीं है. वार्ता की संभावनाओं पर जब-जब बात चली नक्सलियों ने यह शर्त दुहरायी है हालांकि उनका जोर कोबाड गांधी सहित प्रमुख नेताओं की रिहाई पर था जिन्हें वे वार्ता की टेबल पर अपने प्रतिनिधि के रूप में देखना चाहते हैं.

नक्सल प्रभावित राज्यों में अपहरण की घटनाएं आगे भी होती रहेंगी और नक्सली दबाव बनाकर पुलिस का अभियान रोकते रहेंगे.


मलकानगिरी के कलेक्टर एवं उनके साथ ही अपहृत किए गए इंजीनियर पवित्र मोहन मांझी के अपहरण से चिंतित ओडिशा सरकार ने नक्सलियों से जिला अथवा राज्य स्तर पर वार्ता की पेशकश की है. राज्य के गृह सचिव बेहुरा ने कहा कि सरकार ने सभी विकल्प खुले रखे हैं. सरकार के अनुरोध पर स्वामी अग्निवेश वार्ता के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं. चूंकि स्वामी अग्निवेश का माओवादियों के साथ सीधा सम्पर्क है इसलिए उनकी मध्यस्थता में वार्ता किसी भी समय हो सकती है. लेकिन सवाल है वार्ता किन शर्तों पर होगी? क्या सर्चिंग ऑपरेशन बंद करने के साथ ही जेलों में बंद नक्सलियों को छोड़ देने की गारंटी सरकार देगी?

12 फरवरी को रायपुर में छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया डॉ.रमन सिंह से मुलाकात के दौरान स्वामी अग्निवेश ने उनके सामने नक्सली कमांडरों की यही बात रखी थी. मुख्यमंत्री ने आश्वासन दिया था कि बंदी नक्सलियों के प्रकरणों की पुन: समीक्षा की जाएगी. क्या ऐसा ही आश्वासन ओडिशा सरकार भी देगी?

केन्द्रीय गृह सचिव जी.के.पिल्लई मानते हैं कि राज्य सरकारें सीमित इलाकों में अस्थायी तौर पर नक्सली विरोधी अभियान रोकने सक्षम हैं. यानी सरकार चाहे तो इन ग्रामीणों के खिलाफ मुकदमें वापस ले सकती हैं जो नक्सली गतिविधियों के आरोप में जेलों में बंद है. निश्चितत: ऐसे सैंकड़ों प्रकरण हैं जिसमें शक के आधार पर ग्रामीणों को जेल में बंद रखा गया हैं. क्या एक समय सीमा के भीतर ऐसे मामलों की समीक्षा करके उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता? ओडिशा सरकार को भी वार्ता के पूर्व ऐसा कोई आश्वासन देना होगा. चूंकि कलेक्टर की जान ज्यादा कीमती है इसलिए ओडिशा सरकार इसके लिए बाध्य प्रतीत होती है.

मुख्यमंत्री रमन सिंह एवं स्वामी अग्निवेश तथा करियामेटा जनअदालत में नक्सली कमांडरों एवं स्वामी अग्निवेश के बीच क्या बातचीत हुई, उसका रहस्योद्घाटन नहीं हुआ है. केवल यही बात कही जा रही है कि सरकार बातचीत के लिए राजी है और इसके लिए केन्द्र सरकार को पहल करनी चाहिए.

इस बात का भी कोई संकेत नहीं मिला है कि स्वामी अग्निवेश एवं रायपुर जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे डॉ.विनायक सेन के बीच क्या बातचीत हुई. यह सवाल भी अपनी जगह है कि क्या पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन एवं उनके अधिकारियों ने स्वामी अग्निवेश से जवानों की रिहाई के पूरे प्रकरण पर बातचीत की? और क्या स्वामी अग्निवेश ने भी अपनी ओर से इसकी जरूरत समझी? उन्होंने दोनों राज्य छत्तीसगढ़ और ओडिशा में स्वयं को वार्ताकार के रूप में स्थापित कर दिया है किंतु क्या एक-एक करके अन्य नक्सल प्रभावित राज्यों में भी वे ऐसी ही भूमिका निभाते रहेंगे? यानी अपहरण की घटनाएं आगे भी होती रहेंगी और नक्सली दबाव बनाकर पुलिस का अभियान रोकते रहेंगे. इसका मकसद क्या है? जाहिर है पुलिस के मनोबल को तोड़ना और अपनी तैयारियों के लिए समय हासिल करना.

अपहरण और रिहाई के इस खेल में वैसे भी पुलिस की कोई भूमिका नहीं रह गयी है क्योंकि यह राज्य सरकार, नक्सली और स्वामी अग्निवेश के बीच की बात हो गयी है. ऐसी स्थिति में नक्सल विरोधी ऑपरेशन पर तैनात पुलिस जवानों के मनोबल को बनाए रखना राज्य पुलिस के लिए कठिन है.

19.02.2011, 17.31 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bhagatsingh [] raipur

 
  इसमें गलत क्या है. जब यु्द्ध हो तो सब जायज है. कम से कम उन्होंने हमेशा बंदियों को रिहा तो किया है. लेकिन निर्वाचित सरकार ने आजाद के साथ क्या किया. छत्तीसगढ़ की जेलों में कम से कम 2000 आदिवासी जेलों में हैं, जिनकी चार्जशीट सालों से कोर्ट में पेश ही नहीं की गई है. भाई, कहना बहुत आसान है कि अबकी बार कलेक्टर को पकड़ा है, यदि पहले भी कुछ बड़े लोगों पर हाथ डाली होती तो इतनी खराब स्थिति नहीं होती. आपको याद होगा, तहलका में छपा सैनिकों का साक्षात्कार, जिसमें कहा गया था कि छोटे लोगों को मारने-प्रताड़ित करने से सरकार पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ता. थोड़ा मुआवजा, तिरंगा और सलामी.... सवाल अपहरण का नहीं, बल्की जब तक गरीब आदिवासी और सैनिक मारे जाते रहेंगे, तब तक मुआवजा ही बंटेगा. पहली बार कुछ होता दिख रहा है, जो इससे पहले कभी नहीं हुआ. 
   
 

देवेश तिवारी [deveshrisk@gmail.com] बिलासपुर

 
  नक्सलियों की अपहरण नीति सरकार के लिए वो उबलती खिचड़ी बन गयी है, जिसे मुंह में डालकर ना तो निगला जाता है न ही उगला जाता है. सरकार को अपने अधिकारियो की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है और जिनकी रिहाई के लिए ये अपहरण हो रहे हैं, उन्हें क्या सजा दी जानी चाहिये कि उनकी रिहाई के लिए ये कोशिशे ना हो उस विकल्प के बारे में सोचना चाहिये. 
   
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