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धर्मराज या धृतराष्ट्र

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धर्मराज या धृतराष्ट्र

एम जे अकबर

मनमोहन सिंह पार्टी द्वारा शासित प्रधानमंत्री नहीं रहे. यह बदलाव उनके पहले कार्यकाल में ही आया, जब उन्होंने हिचकती पार्टी पर भारत-अमेरिका परमाणु करार के मामले में अपना अनुसरण करने के लिए दबाव डाला. पाकिस्तान संबंधी नीति के मामले में भी वे कांग्रेस से आगे थे. यह बात आम चुनावों में भी पक्की हो गई, जब होर्डिग्स में उन्होंने बराबर की जगह हासिल की. स्पष्ट है कि वे अहम व निर्णायक मुद्दों पर अपनी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से सलाह-मशविरा करते हैं, लेकिन उनके रिश्ते उस समय से कहीं ज्यादा बराबरी के हैं, जब श्रीमती गांधी ने प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम दिया था.

लेकिन एक राजनीतिक रंगभूमि है, जहां उन्हें पार्टी के फैसलों के सामने झुकना पड़ता है : सरकार का अस्तित्व. पार्टी तय करती है कि किस तरह के उपाय करने हैं, जो अलग-अलग सहयोगियों को जोड़कर रखें. पार्टी महज डॉ. सिंह की आर्थिक समग्रता की छवि को बचाए रखने के लिए मध्यावधि चुनाव का बोझ नहीं सह सकती.

डॉ. सिंह राजनीति को समझते तो हैं, पर खुल्लमखुल्ला भ्रष्टाचार और उसके संभवत: अभूतपूर्व स्तर से उपजे संकटों से दो-चार होने के लिए खुद को राजनीतिक दांव-पेंचों में लिप्त नहीं कर सकते. उनकी प्रकृति उन्हें संकटपूर्ण ढंग से अधिकेंद्र में खींच ले जाती है और तथ्य प्रधानमंत्री की सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं, क्योंकि बेशक, समझौते के लिए उन पर दबाव डाला जाता रहा है. उन्होंने ‘गठबंधन की विवशता’ की बात कही, पर ये विवशताएं उस व्यक्ति को लेकर नहीं हैं, जो टेलीकॉम घोटाले के कारण जेल भेजा जा रहा है, यानी ए. राजा.

क्या इस विरोधाभास का जवाब एक अन्य विरोधाभास है? कांग्रेस तमिलनाडु में अपने गठबंधन की जीत दोहराना चाहेगी, पर क्या मुक्ति का रास्ता पराजय में है?

राजा तो फ्रंट ऑफिस बॉय हैं. समस्या तो डीएमके है. कारपोरेट मुखियाओं की मदद से राजा के कैबिनेट मंत्री बनने से बहुत पहले ही डीएमके टेलीकॉम को अपनी निजी संपत्ति बना चुकी थी. राजा ने लूट का एक हिस्सा रखा, अधिकांश धन पार्टी और करुणानिधि के कुनबे द्वारा ले लिया गया. राजा तो जनता के सामने चढ़ाई गई बलि हैं. उनकी तयशुदा नियति है कि पतन के बावजूद उन्हें मुंह बंद रखना है, माफिया शैली में, वरना इसके अपने नतीजे होंगे. समस्या राजा नामक व्यक्ति नहीं, डीएमके नामक संगठन है. यही है तनाव, जो मनमोहन सिंह की परीक्षा लेगा.

कांग्रेस राजा को हिरासत में भेज चुकी है, करुणानिधि कुनबे के स्वामित्व वाले कलक्ष्नार टीवी पर सीबीआई छापे का आदेश दिया गया है और इस बात के संकेत दे चुकी है कि करुणानिधि की बेटी कणिमोझी को पूछताछ के लिए बुलाया जा सकता है. वह यह भी घोषणा कर चुकी है कि तमिलनाडु विधानसभा का चुनाव डीएमके के साथ मिलकर लड़ेगी. यह भ्रष्टाचार की प्रबल भर्त्सना जैसा तो नहीं लगता. लेकिन राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने की आड़ में इसकी सफाई दी जा सकती है. अगर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ती है, तो बिहार की तरह उसका सूपड़ा साफ हो जाएगा. भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान में लचीलापन लेन-देन का तरीका है, लेकिन प्रधानमंत्री अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस का इस्तेमाल यह संदेश देने में कर चुके हैं कि वे इतने कठोर होंगे, जितना की कानून इजाजत देता है. सीबीआई उनके निर्देशों पर चलती है.

मुद्दे की बात है : बड़ी गाड़ी को उलटे बगैर सीबीआई खाली हाथ-पैर मारकर क्या कुछ कर सकती है? उस गाड़ी में भरे सेबों की ऊंची कीमत है. सीबीआई जिनसे पूछताछ कर रही है, उनसे नाम सुनेगी. वह ज्यादा दिखावे के साथ प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ कार्रवाई करेगी, लेकिन उन नेताओं का क्या, जो इसकी जड़ों में हैं?

क्या इस विरोधाभास का जवाब एक अन्य विरोधाभास है? कांग्रेस तमिलनाडु में अपने गठबंधन की जीत दोहराना चाहेगी, पर क्या मुक्ति का रास्ता पराजय में है? दुबारा जीतने वाली डीएमके केंद्र में गठबंधन को ब्लैकमेल करेगी. हारी हुई डीएमके चेन्नई में ज्यादा विनयशील और दिल्ली में ज्यादा आज्ञाकारी होगी.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
20.02.2010, 02.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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