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सवर्ण आयोग का औचित्य

बात पते की

 

सवर्ण आयोग का औचित्य

महेन्द्र सुमन


ऑक्सफोर्ड पोवर्टी ऐंड डेवलेपमेंट इनिशिएटिव, कंट्री ब्रीफिंग, इंडिया, जुलाई 2010 के अनुसार बिहार में गरीबों का अनुपात 81.5 प्रतिशत है, जो देश में सबसे अधिक है. भारत में यह अनुपात 55.4 फीसदी है. राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न जाति समूहों में इस आंकड़े का ब्रेकअप इस प्रकार है- अनुसूचित जनजाति-81.4 अनुसूचित जाति-65.8, अति व अन्य पिछड़ा वर्ग-58.3 तथा सवर्ण जातियां-33.3 प्रतिशत. यानी सवर्ण जातियां भी इससे अछूती नही हैं, भले ही उनमें गरीबी का अनुपात सबसे कम है. सवर्ण जातियों के बीच गरीबी की यह थोड़ी-बहुत व्याप्ति ही बिहार में सवर्ण आयोग के गठन का पहला औचत्य प्रदान करती है. जातिवार निरक्षरता के ब्रेकअप मौजूद नहीं हैं लेकिन इतना तो तय है कि सवर्ण जाति समूह में ही इसकी दर सबसे कम है.

भारत में गरीबी के आकलन एवं गणना में बड़े पैमाने पर ‘एरर ऑफ इंक्लूजन' तथा ‘एरर ऑफ एक्सक्लूजन' की समस्या उजागर हुई है. ‘एरर ऑफ इंक्लूजन' से जहां राज्य पर वित्तीय भार बढ़ता है, वहीं ‘एरर ऑफ एक्सक्लूजन' बहुत बड़ी सामाजिक कीमत वसूल लेता है. इसे और स्पष्ट करें तो ‘एरर ऑफ इंक्लूजन' का मतलब है कि गैर गरीब समूहों की बीपीएल सूची, जो अंततः राज्य द्वारा सृजित एक कृत्रिम श्रेणी ही है, में घुसपैठ करना और तथाकथित छद्म लाभार्थी बनकर गरीबी उन्मूलन एवं विभिन्न सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों का बडा हिस्सा हड़प जाना, जबकि ‘एरर ऑफ एक्सक्लूजन' में सचमुच गरीब समूह ही छूट जाते हैं.

यदि ‘एरर ऑफ इंक्लूजन' के तहत कोई गैर गरीब लाभार्थी बना हुआ है तो कोई आसमान गिरने वाली बात नहीं क्योंकि उसमें भी निम्न मध्यवर्ग के ऐसे लोग ही होते हैं, जिनमें इन कार्यक्रमों के लाभ पाने की सचमुच जरूरत होती है. बिहार में नीचे से ऊपर तक इन कार्यक्रमों की बंदरबांट में कौन सा प्रभुत्वशाली वर्ग शरीक है, यह सबों को मालूम है. पीडीएस को सार्वभौम बनाने के पीछे एक मजबूत तर्क यही है कि यह व्यक्तियों के स्व-निर्णय पर छोड़ देना चाहिए कि उन्हें जन वितरण प्रणाली दूकानों के मोटे अनाजों का फायदा चाहिए या नहीं.

लिहाजा, विशुद्ध सैद्धांतिक नजरिए से देखें तो यह सवर्णों केलिए ‘एरर ऑफ एक्सक्लूजन’ को दुरूस्त करता है, वहीं दूसरे नजरिए से बिहार के ठोस संदर्भ में यह ‘एरर ऑफ इंक्लूजन’ है, और एरर के रूप में सही, उसे दूसरा औचित्य मिलता है. मगर इससे राज्य पर सिर्फ वित्तीय भार ही बढता तो कोई बात नही थी (हालांकि बिहार जैसे गरीब राज्य के लिए यह भार वहन करना भी मुश्किल है), जमीनी स्तर पर निश्चित रूप से यह बहुत सी कीमतें वसूल लेगा.

बुद्ध के जमाने से ही बिहार प्रयोगों की भूमि रहा है. यह भूमि लीक से हटकर प्रयोगों की इजाजत देती है. बहुधा ये प्रयोग आमूलकारी होते हैं तो कई दफा प्रतिगामी. एक बात यह भी कही जाती है कि बिहारी समाज एक अतिवादी समाज है- चरम दमन और चरम प्रतिवाद की घटना यही संभव है, रूपम कांड इसका सबसे ताजा उदाहरण है.

लीक से हटकर किये जाने वाले प्रयोगों की ही अगली कड़ी है बिहार में महादलित आयोग का गठन. मौजूदा सवर्ण आयोग के बीज उस दिन ही डाल दिए गए थे, जब राजनीतिक दबावों में आकर तमाम स्थापित मानकों को धता बताते हुए इस आयोग के दायरे से अलग रखी गई चार अपेक्षाकृत विकसित दलित जातियों में से पासवानों को छोड़कर तीन अन्य को उसमें शामिल कर लिया गया. इसे कहते हैं अपनी ही अवधारणाओं को गडमड कर माखौल बनाना. सवर्ण आयोग का गठन उसी ढीली होती अवधारणाओं की चरम परिणति है.

नीतीश सरकार आयोगों के गठन में माहिर रही है और उससे भी ज्यादा इन आयोगों की सिफारिशों को लागू करने से मुकरने में.

हमारे संविधान में सामाजिक एवं शैक्षिक आधारों पर जातियों के लिए विशेष कदम उठाने की बात कही गई है न कि आर्थिक आधार पर. गरीबी उन्मूलन समेत तमाम सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम बीपीएल सूची के आधार पर चलाए जाते हैं और इस सूची को शुद्ध आर्थिक मानकों पर तैयार किया जाता है न कि जाति के आधार पर. इस पर लगभग सर्वानुमति है. हालांकि इस सूची की गड़बड़ियों को दूर करने के लिए कई विशेषज्ञ पूरे के पूरे कुछेक जाति व पेशागत समूहों को इसमें शामिल करने की सिफारिशें कर रहे हैं.

बिहार जो स्वातंत्र्योत्तर भारत में सामाजिक न्याय की महान व अनूठा प्रयोगशाला रहा है और यहां इस मोर्चे पर अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है और इस पर भी लगभग राजनीतिक सर्वानुमति है, सवर्ण आयोग के गठन को बहुसंख्यक बिहारी समाज और यहां तक कि पूरा का पूरा सताधारी खेमा भी शायद ही पूरी तरह पचा पाएगा. भले ही अभी यह विरोध मद्धिम तथा दबा हुआ हो.

महादलित आयोग का कार्यकाल 25 दिसम्बर 2010 को ही समाप्त हो गया लेकिन नए का अभी तक पुनर्गठन नहीं हुआ है. इस बीच अति पिछड़ा आयोग, विधायिका में उनके आरक्षण की मांग, बिहार भाजपा द्वारा कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देने की मांग, सवर्ण आयोग के गठन संबंधी ताबडतोड़ घोषणाएं हुई हैं. लालू के सामाजिक समीकरण के कोर समूह एमवाई की तरह नीतीश के समीकरण के कोर समूह में अति पिछड़ा एवं सवर्ण समूह आ गए हैं, लिहाजा ऐसी घोषणाएं बिल्कुल अपेक्षित थीं. महादलित समेत दूसरे समूह पृष्ठभूमि में चले गए हैं.

नीतीश अपने पिछले कार्यकाल में ‘पोवर्टी रिविजिटेड’ जैसे आयोजन कराने एवं बिहार में गरीबों की संखया के मुतलिक केन्द्र सरकार के दावों को चुनौती देने के लिए खासे चर्चा में रहें हैं. बिहार में गरीबी के आकलन एवं गणना में बड़े पैमाने पर ‘एरर ऑफ इंक्लूजन' तथा ‘एरर ऑफ एक्सक्लूजन’ की समस्या जगजाहिर है और बिल्कुल अक्षम एवं भ्रष्ट डिलिवरी प्रणाली ने सामाजिक रूप से हाशिए पर पडे़ गरीबों को एकदम निरूपाय बना दिया है.

जो स्थिति है, उसमें बगैर सामाजिक व राजनीतिक रूप से संगठित हुए ये समूह गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों का फायदा नहीं उठा सकते हैं. सामाजिक न्याय के तहत उठाए गए सारे कदमों की कमोवेश यही स्थिति है. इसीलिए यहां सतत्‌ निगरानी व चौकसी बेहद जरूरी है. लेकिन यही बात सामाजिक रूप से उठे गरीबों पर लागू नही होती. इस श्रेणी के गरीब सोपान आधारित वर्ण समाज में ऐतिहासिक रूप से ऊपरी पायदान पर हैं.

ऐसे में सिर्फ आर्थिक व शैक्षिक आधार पर सवर्ण गरीबों के लिए सकारात्मक पक्षपात जो अवधारणात्मक स्तर पर बिल्कुल सामाजिक आधार पर ही शुरू होता है, अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास है. यह इस श्रेणी के गरीबों की सामाजिक रूप से बेहतर स्थिति को तो निश्चय ही मजबूती प्रदान करेगा, महज आर्थिक उन्नयन तक सीमित नहीं रहेगा. बात इतनी तक रहे तब भी उतनी बुरी नही होगी. यह सामाजिक रूप से दबे गरीबों के आरक्षित क्षेत्र में, सामाजिक रूप से उठे गरीबों की अनारक्षित श्रेणियों के लिए औपचारिक रूप से दरवाजों को खोल देगा. एक बार ऐसा होने पर अनगिनत चोर दरवाजों को औपचारिक जामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी.

गरीबी कोई निरपेक्ष श्रेणी नही है. हमारे यहां वर्ग को जाति के खिलाफ तथा इसी प्रकार जाति को वर्ग के विरूद्व खड़ा करने की एक बहुत खराब परिपाटी रही है. सामाजिक रूप से उठे गरीबों और सामाजिक रूप से दबे गरीबों के बीच एक बड़ा फासला होता है, अतः किसी भी सूरत में उनके उत्थान का एक ही रास्ता नही हो सकता.

मगर बिहार की राजनीति में आए ‘नए बदलावों’ के बावजूद सकारात्मक पक्षपात के वही पुराने नुस्खे आजमाए जा रहे हैं, जिससे आज के हालात में ठोस काम कम, द्वंद्व ज्यादा पैदा होंगे. आज सकारात्मक पक्षपात के वजाए सकारात्मक कार्यों के लिए पहले से बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं. सरकार सवर्ण समाज बहुल इलाकों में उद्योग, शिक्षण सस्थानों, रोजगार सृजन कार्यक्रम संबंधी अनेकानेक पहल ले सकती है जो अधिक कारगर हो सकते हैं.

सबसे बड़ी बात है कि वह डिलिवरी मैकेनिज्म को चुस्त-दुरूस्त करें तो अपने आप बहुत सी समस्याओं का निदान हो जाएगा. सवर्ण समाज के लिए यह सुखद बात है कि बिहार में एवं उसके बाहर बिहारी मूल के जो नए कॉरपोरेटर उभर रहे हैं, वे ज्यादातर इसी समाज से जुड़े हैं. वे कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के तहत उन क्षेत्रों के विकास हेतु नई पहल ले सकते हैं.

नीतीश सरकार आयोगों के गठन में माहिर रही है और उससे भी ज्यादा इन आयोगों की सिफारिशों को लागू करने से मुकरने में. लोगों की स्मृति में अभी भूमि सुधार व समान स्कूल प्रणाली आयोगों की अनुशंसाएं ताजा हैं. हालांकि इन आयोगों के मुद्दे बहुत व्यापक थे, किसी खास सामाजिक समूह से सम्बद्व नहीं. लेकिन किसी सामाजिक समूह की आकांक्षाओं को उभारना तथा उससे खिलवाड़ करना खतरे से खाली नहीं है. विशेष कर ऐसे समूह से जो सदियों से सत्ता पर काबिज रहा है तथा विगत कई सालों से सत्ता की मुख्यधारा से अलग-थलग रहने के बाद अब फिर केन्द्रक समूह का एक महत्त्वपूर्ण पार्टनर बन गया है और नई उर्जा से अपने दावों को पेश कर रहा है.

25.02.2011, 08.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Amit Kumar [amit_59@ymai.com] Patna

 
  नज़रिया सबसे बड़ी चीज है. आप लालू या नीतीश कुमार के मुद्दे को किस तरह देखते हैं.
असल में जातिवाद की राजनीति देखते-देखते मीडिया और जनता के दिमाग में ये बात बहुत अंदर तक घर कर गई है कि आज की राजनीति में अगर गांधी जी भी होते तो उनके ऊपर भी ऐसे ही आरोप लगाये जाते. मेरे कहने का मतलब ये कतई नहीं हैं कि नीतीश कुमार जातिवाद की राजनीति नहीं कर रहे हैं लेकिन लालू की तरह केवल जातिवाद की राजनीति नहीं, साथ में कुछ काम भी कर रहे हैं, क्योंकि जनता वही है और मेरे देश का जो पूरा सिस्टम है तो यह तो करना पड़ता है. साधुवाद.
 
   
 

Rajesh kumar mandal [rajeshraj.jnu@gmail.com] JNU, New Delhi

 
  ALL INDIA BACKWARD STUDENTS FORUM (AIBSF) बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सवर्ण आयोग का गठन का कड़ा विरोध करती हैं...AIBSF ने नीतीश के सवर्ण आयोग का सच नामक बुकलेट निकाल कर अपना विरोध दर्ज किया है। छात्रों का एक जत्‍था इस मुद़दे के साथ बिहार के दौरे पर निकला है जो विभिन्न कार्यक्रमों के द्वारा आपना विरोध जाता चुका हैं. 
   
 

Ajay Jain [ajay.jain@ymail.com] Kanpur

 
  मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आखिर नीतीश कुमार के हरेक काम को शक की निगाह से क्यों देखा जा रहा है. लालू-राबड़ी के जमाने में एक तरह की तानाशाही बिहार में थी. उस जमाने में तो किसी ने आवाज़ नहीं उठाई, सब वाहवाही करते रहे, लेकिन अब हरेक आदमी नीतीश कुमार के पीछे लगा हुआ है. 
   
 

Pramod Ranjan [pramodrnjn@gmail.com] New Dehi

 
  @ जीतेंद्र कुमार यादव जी
भाई, बुलेट का नया संस्करण आये तो इस लेख को उसमें शामिल करना चाहिये. महत्वपूर्ण लेख के लिये महेंद्र जी को साधुवाद.
 
   
 

जितेंद्र कुमार यादव [jite.jnu@gmail.com] जेएनयू, नई दिल्‍ली

 
  जेएनयू के छात्रों ने भी \'नीतीश के सवर्ण आयोग का सच\' बुकलेट निकाल कर अपना विरोध दर्ज किया है। छात्रों का एक जत्‍था इस मुद़दे के साथ बिहार के दौरे पर निकला है। आप संपर्क कर सकते हैं- 9716839326 , 9310593815  
   
 

अटल कुमार श्रीवास्तव [] पटना

 
  बिहार के एक पत्रकार सुरेंद्र किशोर से अगर शब्द उधार लूं तो कहना पड़ेगा कि पुराने जातीय वोट बैंक को तोड़ कर नया वोट बैंक बनाने का आरोप नीतीश कुमार पर जरूर लग रहा है। पर, इस समावेशी कदम को अधिकतर जनता ने पसंद किया है। क्योंकि दलित, मुस्लिम और पिछड़ों में जो अंतिम कतार में खड़े हैं, उनके लिए नीतीश सरकार ने काम किया है। महात्मा गांधी ने भी तो समाज के सबसे कमजोर कमजोर व्यक्ति की चिंता की थी।

जातीय वोट बैंक की अपनी एक सीमा है। इसे नीतीश कुमार ने पहचाना।आजादी के बाद कांग्रेस ने भी वर्षों तक समाज के सभी हिस्सों के वोट लिये, पर सत्ता का लाभ कुछ खास सवर्ण जातियों को ही पहुंचाया। नतीजतन मंडल आरक्षण आया। उसने लालू प्रसाद को बिहार में महाबली बना दिया। लालू प्रसाद ने सभी पिछड़ी जातियों के वोट लिये, पर लाभ दिये सिर्फ कुछ खास लोगों को ही। दूसरी ओर, नीतीश कुमार ने समावेशी सामाजिक न्याय की अपनी नीति के तहत अति पिछड़ों के लिए पंचायतों और नगर निगमों में बीस प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था करायी। इस पर लालू प्रसाद ने कहा कि नीतीश पिछड़ों को बांट रहे हैं। इसी तरह का आरोप सवर्णों ने सन् 1990 में वी.पी. सिंह-लालू प्रसाद-रामविलास पासवान पर लगाया था, जो मंडल आरक्षण के झंडावरदार थे। सवर्णों ने आरोप लगाया था कि मंडलवादी लोग समाज को बांट रहे हैं।

नीतीश सरकार ने जब महादलित आयोग बनाया और पसमांदा मुसलमानों के हित में कुछ कदम उठाये, तो दलितों व मुसलमानों के वोट बैंक के मैनेजर बिफर उठे। यानी इतिहास ने खुद को दोहराया।
 
   
 

Biju toppo [biju.toppo@gmail.com] रांची

 
  बिहार में इसी तरह की राजनीति करके सत्ता पर रहा जा सकता है. नीतीश कुमार जी का पिछला कार्यकाल जरुर इस तरह की बचकानी हरकतों से अलग रहा हो, लेकिन ताज़ा चुनाव में तो उन्होंने भले विकास का नारा दिया हो, चुनाव का मूल आधार तो असल में जातिवाद और अपराध ही था. नीतीश कुमार जी ने उन्हीं जातिवादियों, अपराधियों को टिकट दिया, जिनको लेकर जनता में गहरा असंतोष था और आज भी है. ऐसे में नीतीश कुमार से ये उम्मीद करना कि वो दूसरे किसी राजनीतिज्ञ से अलग होंगे, बेमानी है. 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida

 
  लालू की राह पर ही नीतीश जी भी हैं, फर्क केवल इतना भर है कि वे थोड़े सभ्य तरीके से बिहार के जातिवादी स्वरुप को उभारने का काम कर रहे हैं. 
   
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