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दूसरा आकाश

बाईलाइन

 

दूसरा आकाश

एम जे अकबर


यदि मुझे दुनिया भर में अंग्रेजी के बेहतरीन जर्नल्स की संक्षिप्त सूची बनानी होती, तो ‘इकॉनामिस्ट’ निश्चित तौर पर शीर्ष पर होती. परख, विवेचना, सूचना और लेखन की गुणवत्ता इसे परिपूर्ण संगी बनाते हैं. इस पत्रिका ने अपने 19 फरवरी के अंक में अरब जागरण पर कवर स्टोरी प्रकाशित की है. इसके पेज 71 पर 2010 के लिए इसकी इकॉनामिस्ट इंटेलीजेंस यूनिट द्वारा तैयार डेमोक्रेसी इंडेक्स का विज्ञापन है. इसका निष्कर्ष है कि लोकतंत्र दुनिया भर से अपनी वापसी में है. यहां तक कि सबसे अनुभवी नजर रखने वाले भी सुनामी को ताड़ने से चूक सकते हैं. आखिरकार, महातरंगें सतह के नीचे चलती हैं.

यह कहना पूरी तरह से मूर्खतापूर्ण नहीं होगा कि 2010, 2011 से एक दशक या उससे ज्यादा से भी अलग है. समय हमेशा एक-सी गति से नहीं चलता. जिस गुस्से ने अरब की गलियों को जला दिया है, वह एक दशक और ज्यादातर मामलों में इससे भी अधिक समय से त्वचा के नीचे और दिमाग के भीतर दहक रहा था. असल में यह इतना समय था, जिसमें तानाशाह सुधार के कदम उठा सकते थे, पर उन्होंने कुछ नहीं किया, क्योंकि वे तो अपने ही लालच, अहंकार और खुद के अपरिहार्य होने के चरम विक्षिप्त भाव से भरे थे. मुअम्मर गद्दाफी का दर्पण कह रहा है कि वे शहीदी की अपनी राह पर हैं. वे उस नर्क को नहीं पहचान सके हैं, जो उन्होंने अपनी ही जनता के लिए बनाया. उन्होंने हमेशा वास्तविकता से बाहर ही जीवन जिया है. अब वे उन्मत्तता के सहूलियत वाले इलाके में प्रवेश कर चुके हैं. न तो उनका क्षेत्र और न ही दुनिया उनके पद पर बने रहने के नतीजे झेल सकती है.

अरब में मची खलबली के मामले में एक दिलचस्प पैटर्न उभरा है. तानाशाहों की तुलना में राजशाही के लोग ज्यादा टिकाऊ साबित हुए हैं. यह महज व्यक्तित्व का करिश्मा नहीं हो सकता, न ही इस बात के कारण कि बिकने का लालच कुलीन रक्त को प्रभावित नहीं कर पाता. राजा परंपरा की शक्ति को पुन: खोज रहे हैं. हुस्नी मुबारक या किसी बेन अली या किसी गद्दाफी के उलट वे उस चीज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो उनसे कहीं ज्यादा पुरानी है. किसी राजा के लिए यह संभव है कि वह लोकतांत्रिक विचारधारा के साथ सामंजस्य स्थापित कर ले. और यदि अरब राजवंश समझ जाते हैं कि उनके पास शांतिपूर्ण तरीके से लोकप्रिय शासन में बदलने का विकल्प है, तो वे ऐतिहासिक बदलाव की मांग के बावजूद अब भी अपने जीवनकाल में प्रतीकात्मक राज बनाए रख सकते हैं.
 

अरब दुनिया बदल चुकी है. अतीत मर चुका है. इसकी यादें भविष्य को सजाने वाली पच्चीकारी में जड़ी जा रही हैं.

पिछले दशक में केवल मुबारक ही नहीं, उनके बेटे जमाल भी देश पर छाए रहे, जिनकी एकमात्र योग्यता मुबारक का पुत्र होना ही है. यह मुबारक के अनुकूल था कि एकमात्र विपक्ष के तौर पर मुस्लिम भ्रातृत्व को बर्दाश्त कर लें (बेशक, पैमानों के भीतर). वे उन्हें अपने विकल्प के रूप में दिखाकर पश्चिम से चयन के लिए कह सकते थे.

यूरोप डिजाइनर कपड़ों में दमकने वाले शाही सदस्यों से भरा पड़ा है, क्योंकि राजकुमार और उनके लोग, दोनों ही संवैधानिक राजतंत्र को सराहना सीख चुके हैं. एक संवेदनशील राजा कोमल हाथों के स्पर्श की ताकत समझता है. कुछ अपवादों को छोड़कर ये शाही लोग नागरिक तानाशाहों की तुलना में जन-संवदेनाओं की ज्यादा परवाह करते हैं. वे इतने लंबे समय तक सत्ता में रह चुके होते हैं कि जानते हैं, इसे गंवाने का सबसे आसान तरीका अपने सिर से ताज उतर जाने देना है. इसकी अज्ञानता की कीमत राजा को सिर देकर चुकानी पड़ती है.

सड़कों पर रोष से अरब राजाओं को अपने संकट और सुनहरे मौके, दोनों को समझना चाहिए. हालांकि इस राह में एक गंभीर बाधा है. डेढ़ होशियार दरबारी सुझाव देंगे कि महल, जनता को झुनझुने पकड़ाकर कुछ मोहलत हासिल कर सकता है. यह विकल्प खत्म हो चुका है. लोग बदल चुके हैं. सेनाएं और नौकरशाही बदल चुकी है. अरब दुनिया बदल चुकी है. अतीत मर चुका है. इसकी यादें भविष्य को सजाने वाली पच्चीकारी में जड़ी जा रही हैं. लेकिन ये पुनर्जीवित नहीं हो सकतीं. महल, संसद के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है, लेकिन इसकी श्रेष्ठता चूर-चूर हो चुकी है. यह राष्ट्र निर्माण में सहयोग तो कर सकता है, पर उसे नियंत्रित नहीं कर सकता. इसके शब्द सुझाव हो सकते हैं, कानून नहीं बन सकते. हर उस प्रणाली में, जो जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए हो, कानून का जिम्मा विधायिका को ही सौंपना होगा.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

27.02.2011, 01.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Gyan Pratap Singh [Singh.gyanpratap@gmail.com] Allahabad

 
  संवैधानिक राजतंत्रो वाले देशों में जनता राजाओं के प्रति नही बल्कि वहां की चुनी हुयी सरकार के प्रति विद्रोह करती है। संवैधानिक राजतंत्रों वाले देश में राजा यदि वास्तविक राजा की तरह व्यवहार करता है तो वहाँ भी विद्रोह होता है, नेपाल उदाहरण है। 
   
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