पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना > Print | Share This  

संस्कृति विमर्श

बात पते की

 

संस्कृति विमर्श

हितेन्द्र पटेल


संस्कृति का पहले जो भी अर्थ रहा हो लेकिन अभी यह अँग्रेजी के कल्चर के अनुवाद रूप में प्रचलित है. रोचक तथ्य यह है कि अंग्रेज़ी में कल्चर शब्द जर्मन शब्द कुल्टूर का अनुवाद है. इस कुल्टूर या कल्चर का एक विशेष अर्थ है. कल्चर शब्द का रवीद्रनाथ टैगोर द्वारा 'संस्कृति' के रूप अनुवाद के बाद से अधिकाकाधिक प्रचलित हुआ. रवीन्द्रनाथ के सन्दर्भ में यह बताना मुझे जरूरी लगता है कि जब उन्हें बंगला में संस्कृति के लिए कोई शब्द नहीं मिल रहा था और जो दूसरा शब्द मिल रहा था वह था संसृति, इसके साथ उन्होंने शब्द लिया संस्कर्तृ- ये तीन शब्द उनको मिल रहे थे. इन तीन शब्दों के भावों को साथ लेकर चलने के बाद वह संस्कृति के उस अर्थ की तरफ जाते हैं, जहाँ से उन्हें कुल्टूर के उस अनुवाद को सामने रखने में मदद मिलेगी.

रवीन्द्रनाथ टैगोर

रवीद्रनाथ टैगोर तीन शब्दों को आस पास लाने के लिये नये शब्द का प्रयोग कर रहे थे.


मेरी पहली बात है कि यह अनुमान करना अनुचित न होगा कि रवीन्द्रनाथ ने कल्चर के लिए संस्कृति का प्रयोग करते समय संस्कृत, संसृति ओर संस्कर्तृ- तीनों शब्दों को आस-पास लाने के लिए इस नये शब्द का उपयोग कर रहे थे. वे एक साथ कृत्रिम, श्रेष्ठ, अनुशीलन द्वारा मांजने, प्रवाह जैसे भावों को एक शब्द में लाने की कोशिश कर रहे थे. निरन्तरता भी आये, परिष्करण भी आये और जो अन्य अर्थ संस्कर्तृ, संसृति और संस्कृत में है वह सब उसमें आ जायें. इसलिए यह बहुत व्यापक शब्द है और उसमें बहस की बहुत गुंजाइश बनती है. उस ओर न जाकर, मैं उसे वर्तमान के सन्दर्भ में लाने की कोशिश कर रहा हूँ.

संस्कृति की गत्यात्मकता ही उसकी शक्ति है. सांस्कृतिक संक्रमण के समाजशास्त्र के सन्दर्भ में, सम्यक्‌ दृष्टि हेतु यह स्मरण रखना आवश्यक है कि नीतियाँ और आदर्श परिवर्तित होते रहते हैं. नीतियाँ और आदर्श दोनों परिवर्तनशील हैं. आज के भारतीय सन्दर्भ में इस प्रश्न पर तीन स्तरों पर विचार करना उचित होगा. समाज में सांस्कृतिक परिवर्तन के दो कारण हैं - आन्तरिक दबाव एवं बाहरी दबाव. आप देख सकते हैं, भारत में एक संस्कृति के नाम पर कितना गैर सांस्कृतिक आचरण महाराष्ट्र में हो रहा है. यह उस दबाव एक बानगी मात्र समझिए. क्षेत्रीयता बहुत हद तक हमारे लिए नये प्रश्न खड़े करने जा रही है - राजनीति के सन्दर्भ में भी, संस्कृति के सन्दर्भ में भी और हमारे साहित्य के सन्दर्भ में भी ये चीज़ें बहुत महत्त्वपूर्ण होने वाली है. संस्कृति के नाम पर महाराष्ट्र के इस गैर सांस्कृतिक आचरण को इसकी बानगी ही इसे मानकर चलें.

संस्कृति की आन्तरिक लड़ाइयाँ भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती हैं. यहाँ रामचन्द्र शुक्ल की उस बात की ओर लौटने की जरूरत है, जिसे मैं संस्कृति के विचार के सन्दर्भ में दूसरा बिन्दु मान रहा हूँ. शुक्ल जी का कहाना है कि बुद्धि की चाशनी में डुबोये बिना किसी भी भाव का स्वाद नहीं हो सकता. आज लगता है कि बा.जार की चाशनी में डुबोये बिना किसी शब्द की कोई महत्ता नहीं है, किसी बात की कोई गरिमा नहीं है, किसी विचार की कोई महत्ता नहीं है. तो यह एक नया सन्दर्भ है एक नयी बात है, जिस चुनौती के सामने हम लोगों को और तैयार होकर आना पड़ेगा और देखना पड़ेगा कि ये चीज़ें इस रूप में क्यों आ रही हैं.

आप निश्चित रूप से यह मानेंगे कि इस समय एक रस्साकशी चल रही है. भारत में पूरी तरह से पूँजीवादी दौर चल रहा है. हमें समझाया जा रहा है कि पूँजीवाद के अलावा कोई विकल्प नहीं है. एक ही साथ इस देश में अट्ठारवीं, उन्नीसवीं, बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दियां चल रही हैं. कुछ लोगों के लिए आधुनिक समय अभी नहीं आया है. कुछ लोग आधुनिक समय में चल रहे हैं और कुछ उत्तर आधुनिक होने की कोशिश कर रहे हैं जो यह समझते हैं कि उत्तर आधुनिक परिदृश्य हमारे सामने आ चुका है.

किसी-किसी माध्यम में समय खुलकर बोलता है. आज तेजी से बदलते भारतीय समाज में, विभाजित संस्कृतियों को स्पष्टतः देखा जा सकता है. पूरा भारतीय समाज मानो दो भाग में बँट गया है. एक ओर वे लोग हैं, जो वैश्र्वायन के तर्कों के साथ हैं, ग्लोबलाइजेशन के तर्कों के साथ हैं और दूसरी ओर वे हैं जो परिस्थितिवश इसके विरूद्ध हैं.

भारत कभी भी एक संस्कृति का राष्ट्र नहीं रहा है. यह बात थोड़ी विवादास्पद हो सकती है. किन्तु इतिहाससम्मत यही प्रतीत होता है कि भारत की विराट संस्कृति में बहुत सारी संस्कृतियाँ बहुत संतुलित रूप में उपस्थित रही हैं, और उसी तरह उपस्थित रही हैं, जैसे एक पेड़ में बहुत सारे पत्ते एक दूसरे का स्थान न लेते हुए भी उपस्थित रहते हैं बल्कि कहें कि एक दूसरे को स्थान देते हुए उपस्थित रहते हैं. किसी का किसी से इस बात के लिए झगड़ा नहीं है कि हम हैं तो तुम नहीं हो, तुम हो तो हम नहीं हैं. इस तरह का भाव लेकर हमारी संस्कृति का विकास हुआ है. इस अर्थ में ''भारतीय संस्कृति'' का अर्थ हमारे लिए बहुत स्पष्ट है.

जिन लोगों ने इस देश की संस्कृति की आन्तरिक एकता के सूत्रों को सामने रखकर राष्ट्रीय एकता की संकल्पना तैयार की थी, उनके मूल्यों को समाज धीरे-धीरे भूल रहा है और छोड़ने की ओर बढ़ रहा है. संकट बहुत गहरे हैं. जो काम औपनिवेशिक विचारधारा नहीं कर सकी, वह काम उदारवादी वैश्विक विचारधारा ने कर दिया है.
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in