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नक्सल पर विकास राग

बात पते की

 

नक्सल पर विकास राग

दिवाकर मुक्तिबोध


नक्सली समस्या पर अब बात करने के लिए विशेष कुछ नहीं रह गया है. पिछले दो-तीन वर्षों में जब से यह समस्या भयानक रूप से हिंसक हुई है, इस पर काफी बातें हो चुकी हैं. भूमि सुधार, शोषण, अत्याचार, सामाजिक न्याय, विकास कार्य, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, अपहरण, फिरौती, हत्या, मारपीट, जन अदालत, समानांतर सरकार, शांति वार्ता, शर्तें, निशस्त्रीकरण, ऑपरेशन ग्रीनहंट, सलवा जुडूम, जंगलवार, गुरिल्ला युद्ध, फौज की तैयारी, वायुसेना का उपयोग, मीडिया की भूमिका आदि-आदि पहलुओं को समेटते हुए विद्वतजनों, राजनीतिकों, केंद्र सरकार के नुमाइंदों, मुख्यमंत्रियों, माओवादी विचारकों एवं मानवाधिकार के पक्षधरों ने जमकर विचार व्यक्त किए, एक-दूसरे को आरोपों के कटघरे में खड़ा किया एवं देश की इस भीषणतम समस्या को सुलझाने के रास्ते सुझाए लेकिन इन बौद्धिक जुगालियों के अलावा विशेष कुछ नहीं हुआ. समस्या यथावत है बल्कि शह देने, बचने एवं मोहरे पिटने-पिटवाने का खेल जारी है. मात किसी की नहीं हुई है.

naxal


कभी ऑपरेशन ग्रीनहंट की वजह नक्सली पीछे हटते दिखाई देते हैं तो कभी अपहरण के जरिए राज्य सरकारों को ब्लैकमेल करते नजर आते हैं. अब केवल युद्धरत पक्ष ही बता सकते हैं कि ऐसा कौन सा फार्मूला शेष है जिस पर एकमतेन हुआ जा सकता है? लेकिन सवाल है, क्या ऐसा कोई फार्मूला संभव है, जो न तेरी जीत न मेरी हार की तर्ज पर हो.

गौतम नवलखा सरीखे सामाजिक कार्यकर्ता लगातार कहते आ रहे हैं कि कुछ शर्तें मान ली जाएं और उन्हें मुख्य धारा में शामिल होने का अवसर दिया जाए. क्या केंद्र सरकार इसके लिए तैयार है? उत्तर ‘नहीं’ में है, लिहाजा जंग जारी है.

आजादी के 62 साल बीतने के बावजूद नौकरशाहों के दिमाग में यह ख्याल बना हुआ है कि जंगलों में रहने वाले आदिवासी विकास की परिभाषा नहीं समझते. इसलिए शासन तंत्र उनके साथ जैसा चाहे, वैसा सलूक कर सकता है. पर तंत्र मुगालते में है. आदिवासी व्यवस्था के खिलाफ उग्र नहीं हैं तो उसका यह अर्थ नहीं कि वे अपने अंधेरे एवं दूसरों के उजाले से बेखबर हैं. उनकी शांतिप्रियता का अर्थ उनकी कमजोरी नहीं है. अगरचे ऐसा होता तो वे नक्सलियों के खिलाफ सलवा जुडूम आंदोलन खड़ा नहीं करते. मलकानगिरी उड़ीसा के कलेक्टर की रिहाई के लिए नक्सलियों पर दबाव नहीं बनाते. जुलूस एवं धरना प्रदर्शन नहीं करते. नक्सलियों को सबसे ज्यादा भय पुलिस अथवा अर्धसैनिक बलों से नहीं, ग्रामीण आदिवासियों की मानसिकता बदलने से है, जिस पर उन्होंने कब्जा जमाए रखा है.

मलकानगिरी के कलेक्टर विनील कृष्णन को नक्सलियों ने मात्र इसलिए नहीं छोड़ा कि उड़ीसा सरकार ने उनकी तमाम शर्ते मान लीं, उन्हें इसलिए आजाद किया क्योंकि आदिवासी भड़के हुए थे. विनील कृष्णन वह अधिकारी हैं, जिन्होंने जिले के बेहद पिछड़े गांवों की सुध ली, उनके बीच गए, उनकी समस्याएं देखीं. आदिवासियों को महसूस हुआ कि कलेक्टर उनका अपना है, उनके कष्ट दूर करने आया है. उनका यह अहसास इतना पुख्ता था कि कलेक्टर के अपहरण की खबर मिलते ही वे लामबंद हो गए.

माओवादी इस खतरे को समझते थे क्योंकि सरकारी अधिकारियों का आदिवासियों के दिल में जगह बनाने का अर्थ है अपनी जड़ों से उखड़ना. नक्सली इस स्थिति को कबूल नहीं कर सकते, इसलिए विकास कार्यों में रोड़े अटकाते हैं और आतंक का ऐसा माहौल पैदा करते हैं ताकि दूरदराज के गांवों में जाने का दुस्साहस कोई अधिकारी या नेता न करें. विनील कृष्णन नक्सली आतंक की परवाह न करते हुए गांवों में पहुंच गए. एक रणनीति के तहत नक्सलियों ने उन्हें कब्जे में किया और एक तीर से दो शिकार किए. सरकार से शर्तें भी मनवायी तथा आदिवासियों के विश्वास को भी टूटने नहीं दिया.

यद्यपि नक्सली फंदे से मुक्त होने के बाद कृष्णन ने दूरस्थ क्षेत्रों में जनसंपर्क अभियान से पीछे न हटने का ऐलान किया है पर अब संभावना कम ही है कि बिना सुरक्षा इंतजाम के वे नक्सल प्रभावित वनग्रामों का दौरा करेंगे. दरअसल अपहरण का आतंक इतना जबरदस्त है कि मुक्त हुए तमाम अपहृतों, जिनमें पुलिस जवान भी शामिल हैं; के लिए नक्सलियों के खिलाफ खड़े होना या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करना मुश्किल है.

यह तो तय है नक्सली समस्या का समाधान बंदूक की गोली से नहीं हो सकता. सरकारों का ऐसा सोचना है, बुद्धिजीवी तबका भी यह महसूस करता है कि विकास कार्यों के माध्यम से धीरे-धीरे इस समस्या का अंत हो जाएगा बशर्ते नक्सली विकास कार्यों में बाधा न डालें.

लेकिन क्या विकास के जरिए सचमुच ऐसी क्रांति लायी जा सकेगी? क्या किसी वनग्राम में या कस्बेनुमा गांवों में जीवनोपयोगी तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराने मात्र से नक्सली आतंक का सफाया हो जाएगा? क्या सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलने से आदिवासियों का हौसला बढ़ जाएगा और वे नक्सलियों को शरण देना बंद कर देंगे? क्या उन्हें उनके गांवों में भी रोजगार मिलेगा ताकि जंगल में जाना ही न पड़े? क्या जंगलों के बिना वे जी सकेंगे?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

vijay [] kanker

 
  अच्छा आलेख है दिवाकर जी. 
   
 

भास्कर मिश्र 'पारस' [bapubhaskar23@gmail.com] बिलासपुर,वर्तमान में हैदराबाद टीवी पत्रकार

 
  लेख अच्छा है ठीक वैसी ही जैसे एक कहानी हमने बचपन में पढ़ी थी, कहानी का शीर्षक है - उसी से ठंडा उसी से गर्म, दरअसल इस लेख में भी वैसा ही कुछ है, जिसे आप विकास की सीढ़ी कह रहे हैं, बाद में उसी पर प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं. बावजूद इसके लेख अच्छा है, क्योंकि नक्सली समस्या को जड़ से उखाड़ने के लिये सटीक बातों को उल्लेख किया गया है. साथ ही मै इस बात से सहमत हूं कि विकास की गंगा को हर हाल में आदिवासी परिवार तक ले जाना ही होगा, इसके अलावा हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि इस मुहिम में किसी प्रकार की राजनीति न होने पाये. नक्सली समस्या अपने आप सुलझ जायेगी. 
   
 

Sanjay Kumar Tiwari [sanjay.tiwari@gmail.com ] Raipur

 
  मुकेश शिल्पी जी, आप लगता है बेहत कुंठित हैं. एक संतुलित आलेख को भड़ास बताना आपकी मानसिक स्थिति को दर्शाता है. आप क्या कहना चाहते हैं, यही स्पष्ट नहीं है. आपकी टिप्पणी एक भड़ास जैसी जरुर है. दिवाकर जी ने बहुत शानदार तरीके से विश्लेषण किया है.हां, आप में पढ़ने का धैर्य हो तब न ! 
   
 

मुकेश शिल्पी [] राजनाँदगाँव

 
  यह तो आराम कुर्सी पर बैठकर भड़ास निकालने जैसा लेख है. ’विकास’ के नाम पर कब तक सुविधा संपन्न तबके मलाई खाते रहेंगे. यह विकास नहीं, अकूत लूट है जिसके लिए सरकार ’नक्सली’ के नाम पर युद्ध करने पर आमादा है. इतनी सीधी सच्ची बात नहीं लिख सकते तो काहे के मुक्तिबोध...?  
   
 

sudhir jain [sudjdp@gmail.com] jagdalpur

 
  सही और सार्थक विश्लेषण !! 
   
 

BHAGATSINGH [] RAIPUR

 
  मुक्तिबोध जी, सारा मामला ही विकास की अवधारणा का हैं.यदि आज तक मानवाधारित विकास हो तो तो न तो नक्सली आते और न ही इस तरह की हिंसक घटनायें होतीं.कलेक्टर के अपहरण के पहले किया कभी किसी सरकार ने इतनी मांगे मानी हैं,पहले भी जवानों को अगवा किया गया था लेकिन सरकार के सामने जवान और कलेक्टर में फर्क साफ दिखाई देता हैं. ताड़मेटला और तीन गांवों में इतनी नृशंस घटाना के बाद भी आप सरकार को नक्सलियों से ज्यादा मानवीय मानते हैं. हत्या, बलात्कार, लूट, घर जलने को यदि आप जनतांत्रिक और शांति की कार्यवाही मानते हैं तो कोई क्या कह सकता हैं. सरकार के नुमाइंदे यदि अपने ही निरीह आदिवासियों पर यह जुल्म करेंगे और आप जैसे बुद्धिजीवी इस पर कुछ नहीं कहेंगे तो कैसे चलेगा. और जहा तक गौतम नवलखा, अग्निवेश, हिमांशु जी और बहुत से कार्यकर्ताओ की बात हैं तो वे हमेशा उनके साथ खड़े हैं जहां सत्ता का हिंसक चेहरा सामने आता है और टूट पड़ता हो उन गरीब आदिवासियों पर जो दुर्भाग्य से उन खनिजो के ऊपर रहते हैं जिन्हें सरकार कारपोरेट को सौंपना चाहती हैं. हिंसा कभी एकपक्षीय नहीं होती,आपको सिर्फ नक्सलियों की हिंसा दिखाई देती हैं, सरकार की नहीं, यह दुखद है. हम आपसे और निरपेक्ष लेखन की उम्मीद रखते हैं. 
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi

 
  सही और सार्थक विश्लेषण !! 
   
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