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एक घरेलू खुशी

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एक घरेलू खुशी

एम जे अकबर


गुरुवार 24 मार्च को जब भारत ने क्रिकेट विश्व कप के क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराया, उस दिन एक अनुमान के अनुसार, देश के 50 फीसदी क्रिकेट प्रशंसकों ने आधी छुट्टी मारी. यह अनुमान मेरा है, जिसका आधार दिल्ली के सुबह के ट्रैफिक में अनुभव के आधार पर जुटाए गए प्रमाण थे. सड़कों पर कोई चिड़चिड़ाहट, गुर्राहट, झगड़ा, जाम वगैरह नहीं था, बस एक स्वाभाविक मुस्कान खिली थी.

बुधवार 30 मार्च को, जब भारत सेमीफाइनल में पाकिस्तान के साथ खेलेगा, सड़कें उल्लास से जगमगा रही होंगी, क्योंकि 90 फीसदी क्रिकेट प्रेमी घर पर रुकेंगे. उनमें से ज्यादातर अपनी आधी छुट्टी की शुरुआत सुबह 10 बजे से करेंगे, इस तर्क के साथ, जो थोड़ा सही भी है कि ऑफिस में महज कुछ मिनट चेहरा दिखाने के लिए पेट्रोल जैसे राष्ट्रीय संसाधन को बर्बाद करना राष्ट्र-विरोधी काम होगा.

मैं बड़े गर्व से दावा पेश कर सकता हूं कि आधी छुट्टी एक हिंदुस्तानी आविष्कार है, खासतौर पर वह छुट्टी, जो सुबह 10 बजे से शुरू होती है. टीवी पर क्रिकेट देखने के लिए पूरे दिन की छुट्टी लेना डरपोकों का काम है. मजबूत आदमी तो आधी छुट्टी ही लेते हैं.

प्रार्थनाएं की जाएंगी और जीत में भावनाओं का निवेश किया जाएगा, क्योंकि हम भारतीय अपने क्रिकेटीय राष्ट्रवाद को सचमुच बड़ी गंभीरता से लेते हैं, लेकिन बुधवार को प्रशंसकों के बीच यही अकेली भावना नहीं होगी. आखिरी गेंद फेंके जाने के साथ ही उन्मादी चर्चाओं का दौर शुरू हो जाएगा, क्योंकि भारत विश्लेषकों का देश है. भावुक पाकिस्तान तो प्रफुल्लित होगा या अवसाद से भर उठेगा, लेकिन भारत तो नतीजा चाहे जो हो, उसकी चीर-फाड़ करेगा. यह विश्लेषण चाय के साथ या उससे भी ज्यादा सनसनी वाली चीज के साथ होगा.

बहरहाल, अच्छी खबर यह है कि अब भारत और पाकिस्तान, दोनों ही क्रिकेट को अस्तित्व से जुड़े मुकाबले के रूप में नहीं देखते. मेरी जिंदगी के कुछ सबसे ज्यादा हृदयस्पर्शी क्षणों में से एक, 2004 में लाहौर में आया था, जब एक दिवसीय में भारत की जीत पर मित्रता के भाव को अभिव्यक्त करते हुए भारतीय झंडे लहराते पाकिस्तानी फैन दिखाई पड़े.

क्रिकेट कैमिस्ट्री उपमहाद्वीप पर ऐसी कीमियागरी करती है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के पास प्रतिभा के बराबर भंडार हैं.

भगवान करे कि बुधवार को पाकिस्तान 100 से भी कम पर ढेर हो जाए और सचिन तेंडुलकर अकेले ही ज्यादातर रन बनाकर भारत को जिता दें और अपना सौवां सैकड़ा भी जमा लें. लेकिन अगर...अगर भगवान का विचार अलग हुआ, तो मैं उम्मीद करता हूं कि मोहाली और चंडीगढ़ उसी खेलभावना का प्रदर्शन करेंगे, जिसने 2004 में लाहौर को जादुई शहर में बदल दिया था. लेकिन यदि हमारे उपमहाद्वीप की संस्कृति राजनीतिक विवाद की बंधक बनकर रह गई, तो यह बहुत हताशाजनक होगा.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, आसिफ जरदारी और तकनीकी तौर पर उनके साथी यूसुफ रजा गिलानी को मोहाली में आमंत्रित कर लम्हे को अपना कर चुके हैं. ‘क्रिकेट कूटनीति’ थोड़ा अनुपयुक्त शब्द है, क्योंकि इसके नतीजे में कूटनीतिक मोर्चे पर पत्ता भी नहीं खड़कता. राजीव गांधी ने 1987 में जनरल जिया उल हक को जयपुर बुलाया था और डॉ. सिंह 2005 में जनरल परवेज मुशर्रफ के मेजबान थे.

पहला प्रयास किसी अहम नतीजे की तरफ नहीं ले गया और दूसरा भरभराकर गिर गया, लेकिन भारत-पाक समीकरण में सरकारें सिर्फ एक हिस्सा ही हैं. अवाम के बीच दोस्ताना दो सरकारों के मध्य मित्रता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है. क्रिकेट व्यापक और लोकप्रिय बुनियाद पर रिश्ते निर्मित करता है, पिरामिड का शिखर भुरभुरा हो, तब भी.

क्रिकेट कैमिस्ट्री उपमहाद्वीप पर ऐसी कीमियागरी करती है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के पास प्रतिभा के बराबर भंडार हैं. हालांकि उनका व्यक्तिगत और सामूहिक व्यवहार साफ तौर पर जुदा दिखता है. भारत व्यावसायिक तौर पर गुंथी हुई इकाई है, जबकि पाकिस्तान तुनकमिजाज विद्रोहियों का जमावड़ा होने जैसा असर डालता है. लेकिन माहौल और मौका पाकिस्तान की कमजोरी लगने वाली चीज को संपदा में बदल सकता है, जब इस तरह की प्रतिभा को जोश का जल मिलता है, तो वह बहार बन सकती है. आप यह कभी नहीं बता सकते कि किस दिन, पाकिस्तान रूपी बोतल में कौन जिन्न बन जाएगा.

दूसरी तरफ, भारत चार बल्लेबाजों और एक गेंदबाज के इर्द-गिर्द घूमता है. ये हैं : सचिन तेंडुलकर, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, युवराज सिंह और जहीर खान. युवराज अपनी रौ में हैं, लेकिन हमें औरों से अलग करने वाले तो सचिन ही हैं. सचिन, जो क्रीज पर दो दशक बिताने के बाद क्रिकेट के इतिहास के शांतचित्त, सबसे अनुशासित जीनियस बन चुके हैं. हम उनके जैसा कोई और दुबारा नहीं देख पाएंगे. सचिन तेंदुलकर के लिए कुछ भी साबित करना बाकी नहीं रहा है, लेकिन उन्होंने कहने के लिए कुछ छोड़ दिया है: वह यह कि जब खेल के इतिहास ने 30 मार्च 2011 को मोहाली में विजयगाथा लिखी है, वह उनके सीने पर जड़े तमगों में से एक होगी. यह हमारी संतोषी घरेलू संतुष्टि के लिए चरम स्थिति होगी.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ के संपादक और इंडिया टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

27.03.2011, 09.23 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

अनिल चमड़िया [] पीपलवाला मुहल्ला, बादली एक्सटेंशन ,दिल्ली

 
  एम जे अकबर लिखते हैं- \"गुरुवार 24 मार्च को जब भारत ने क्रिकेट विश्व कप के क्वार्टर फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराया, देश के 50 फीसदी क्रिकेट प्रशंसकों ने आधी छुट्टी मारी. यह अनुमान मेरा है, जिसका आधार दिल्ली के सुबह के ट्रैफिक में अनुभव के आधार पर जुटाए गए प्रमाण थे. सड़कों पर कोई चिड़चिड़ाहट, गुर्राहट, झगड़ा, जाम वगैरह नहीं था, बस एक स्वाभाविक मुस्कान खिली थी.
..........बुधवार 30 मार्च को, जब भारत सेमीफाइनल में पाकिस्तान के साथ खेलेगा, सड़कें उल्लास से जगमगा रही होंगी, क्योंकि 90 फीसदी क्रिकेट प्रेमी घर पर रुकेंगे.\"
मैं 30 मार्च को दिल्ली की सड़को पर घूमूंगा। इतने वर्षों में कभी खुलकर दिल्ली में नहीं घूम पाया। इतने वर्षों में क्रिकेट देखने वाले जो इतने बढते चले गए। काश रोज ब रोज मैच होते। दिल्ली मुस्कुराती रहती। स्वभाविक मुस्कान। क्रिकेट के प्रशंसक और चिड़चिड़ाहट, गुर्राहट, झगड़ा, जाम?
 
   
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