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शीला, मुन्नी की होली

बात बोलेगी

 

शीला, मुन्नी की होली

कृष्ण राघव


बात से पहले की बातः कई वर्ष पूर्व, ‘बात बोलेगी’ के नाम से मेरा एक साप्ताहिक कॉलम मुंबई ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित हुआ करता था, जिसमें मेरी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा गवेषणात्मक टिप्पणियां, विद्रूप हास्य अथवा ललित गद्य की शैली में एक डायरी की तरह छपा करती थीं. आज फिर से प्रिय आलोक पुतुल जी द्वारा रविवार.कॉम के लिये कुछ लिखने का मौका मिला तो वही कॉलम याद आ गया; मानो मुर्दे में जान आ गई.
 

होली के रंग

यह लेख भी मैंने अपना वादा निबाहने की ग़रज़ से होली के दूसरे ही दिन कंप्यूटर पर टाइप कर दिया था मगर कहां ! बूढ़ी घोड़ी, लाल लगाम !! कम्प्यूटर ने एक बूढ़े को अपने शरीर से अठखेलियां करते देखा तो जवान बछेड़ी की तरह बिदक गया और सारा का सारा मसविदा न जाने कौन-सा बटन दबाते ही काफ़ूर हो गया और फिर से पंगा लेने की हिम्मत न पड़ी. लिहाज़ा इस बार का मसविदा तो हाथ से ही लिख कर भेज रहा हूं.

हमारी हाउसिंग सोसाइटी ने घोषणा कर दी कि इस बार सामूहिक होली मनाई जाएगी, जिसके लिये हर घर से चंदा इकट्ठा कर लिया गया. ठीक भी है, गांव-कस्बे के रिश्ते तो रहे नहीं, सो सोसाइटी यदि भूलकर भी एक-दूसरे से न मिलने वाले सदस्यों को, होली के अवसर पर एक दूसरे के पास आने का मौका दे रही है तो ऐसे क़दम का स्वागत होना ही चाहिए.

नीचे बहुत बडे मैदान में होली का हर तकल्लुफ़ मौजूद था; रंगों की फुहार, गुलाल की बहार, छप्पन भोग की ज्यौनार... सब कुछ रस्मी तौर पर चल रहा था कि अचानक मानो उमंगों का पारा थर्मामीटर तोड़कर हर ओर बिखर गया. कारण यह कि डी.जे. साहब ‘शीला की जवानी’ को लेकर प्रस्तुत हो गए. दादा जी से लेकर नाती जी तक सब अपने-अपने गुटों में ऐसे नाचने लगे मानो जलते तवे पर नाच रहे हों, पांव ज़मीन पर टिक ही नहीं रहे थे. ‘शीला की जवानी’ अपनी सम पर आई ही थी कि लोग-बागों ने ‘मुन्नी’ को बदनाम करने की फ़रमाइश कर दी और फिर तो मानों भूचाल आ गया. न जाने कितनी मुन्नियां हो गईं और कितने ‘डार्लिंग...’. मुन्नी बदनाम होती रही और बच्चों से लेकर बूढ़े तक हंसते रहे, नाचते रहे और अपनी ही मुन्नियों को इस गीत पर न सिर्फ़ नाच करते देखते रहे बल्कि जितने भी ‘डार्लिंग’ थे, उन्हें ‘तेरे लिए’ शब्दों पर उनकी ओर इशारे करते भी देखते रहे और मज़े लेते रहे.

पता नहीं, कितने लोग हैं, जो जानते हों कि उत्तर भारत में ‘मुन्नी’ शब्द बड़े प्यार, स्नेह और ममत्व से, बच्चियों और लड़कियों के लिये इस्तेमाल किया जाता है. अनजाने राहगीरों को यदि कुछ जानना हो तो आज भी लड़की को ‘मुन्नी’ कह कर ही संबोधित किया जाता है. फिर ‘मुन्नी’ और ‘शीला’ सबसे अधिक प्रचलित नाम हैं. इन गानो के मुखड़ों ने ऐसे नाम वाली बच्चियों को सरेआम छेड़ने का सर्टिफिकेट दे दिया है.

संस्कृति का ह्रास हम करते हैं और बदनाम त्यौहार होता है. यही हाल होली का भी है. मिलन, प्रेम, क्षमा और हास-उल्लास का त्यौहार होली आज ऐसी ही गुंडागर्दियों के कारण बदनाम हो गया है.

वर्ष के अंत पर, वैर-भार को अग्नि में भस्म कर नए वर्ष के आगमन पर, सब पर उल्लास और मैत्री के रंग बिखेरता यह त्यौहार समान भाव से अमीरी और गरीबी को गले लगाता है. लाल रंग से टेसू यानी पलाश के फूल, जिनके लाल रंग से मध्य-प्रदेश के जंगलों में मानो आग-सी लग जाती है; उन्हीं के रंग डाले जाते थे तो शरीर के न जाने कितने चर्म-रोगों से छुटकारा मिलता था. फिर अबीर, गुलाल, कुंकुम और रोली-चंदन कुछ भी आज बाकी नहीं बचा बल्कि रस की जगह ज़हरीले रसायनों ने ले ली है.

गीतों की तो हमारे यहां वसंत ऋतु के आगमन से ही परंपरा हैः
फूल रही सरसों, सघन बन
अंबुवा मूले (आम बौराए) केसू फूले (टेसू के फूल)
++
आज बिरज में होरी रे रसिया
++
होरी खेलें रघुवीरा अवध में

हमारी फ़िल्मों में भीः
होली आई रे कन्हाई, रंग छलके
सुना दे ज़रा बांसुरी

++
खेलो फाग हमारे संग
आज दिन रंग-रंगीला आया


किंतु आज तो अपने घर की बहू-बेटियों को अपने ही सामने बदनाम होते देखना ही हमारी शान बन गई है. ‘मुन्नी’ वाले गीत का इतिहास तो आप जानते ही हैं- देवर-भाभी के अतिरिक्त पति और सास-ससुर सभी को आपने आनंदित होते देखा ही होगा.

हमें भी इस अवसर पर राग होली क़ाफी की एक पुरानी रचना याद आ रही हैः
अब तक होली सो होली, संभल अब खेलो ये होली

10.04.2011, 15.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

arnab chatterjee [arnabchatterjee06@yahoo.co.in] mumbai

 
  राघव जी का लेख पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. आशा है ये लेख पढ़ कर ऐसे गीतकार संभलने की कोशिश करेंगे. मैंने राघव जी का गीत गाया है- पिया संग नैना लगाये, लाज चले आगे-आगे, पीछे जीयरा लहराये, पंख लिये उड़-उड़ जाये....शुक्रिया राघव जी. 
   
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi

 
  संस्कृति का ह्रास हम करते हैं और बदनाम त्यौहार होता है. यही हाल होली का भी है. मिलन, प्रेम, क्षमा और हास-उल्लास का त्यौहार होली आज ऐसी ही गुंडागर्दियों के कारण बदनाम हो गया है.

आपकी बात तो बोलेगी सर जी ...जरुर बोलेगी ...स्वागत है !!
 
   
 

prathmesh [prathmeshmishra@indiatimes.com] bilaspur, chattisgarh

 
  ये सब देखकर लगता है कि क्या कुछ रोक ज़रुरी है ? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कब तक बेहूदापन चलेगा ? 
   
 

Ajay Tiwari [ ajaytiwari2002@hotmail.com] Kanpur

 
  अपसंस्कृति के फ्यूजन ने ही ये सारा कन्फ्यूजन पैदा किया है. हमारे एक परिचित हैं संजय कुमार द्विवेदी. उनका कहना है कि देश में होड़ नंगेपन की है, बेहूदा प्रस्तुतियों की है और जैसे-तैसे दर्शकों को बांधे रखने की है। टीवी चैनलों पर चल रहे धारावाहिकों में ज्यादातर प्रेम-प्रसंगों, किसी को पाने-छोड़ने की रस्साकसी एवं विवाहेतर संबंधों के ही इर्द-गिर्द नाचते रहते हैं। वे सिर्फ हंसी-मजाक नहीं करते, वे माता-पिता के साथ परिवार व बच्चों के बदलते व्यवहार की बानगी भी पेश करते हैं । अक्सर धारावाहिकों में बच्चे जिसे भाषा में अपने माता-पिता से पेश आते हैं, वह आश्चर्यचकित करता है। इन कार्यों से जुड़े लोग यह कहकर हाथ झाड़ लेते हैं कि यह सारा कुछ तो समाज में घट रहा है, लेकिन क्या भारत जैसे विविध स्तरीय समाज रचना वाले देश में टीवी चैनलों से प्रसारित हो रहा सारा कुछ प्रक्षेपित करने योग्य है ? लेकिन इस सवाल पर सोचने की फुसरत किसे है ?  
   
 

Himanshu [patrakar.hiamnshu@gmail.com] Noida

 
  शीला और मुन्नी हमारी घटिया मानसिकता को दर्शाती हैं राघव जी. इनका कुछ नहीं किया जा सकता. हमारी सोच इस कदर नीचे आ गई है कि हमारे लिये सारे रिश्ते-नाते, उम्मीदें, लिहाज सब खत्म हो गया है. गांधी जी कहा करते थे कि खिड़कियां खोलो, हवा आने दो, लेकिन हमने अपनी घर की दीवारें ही ढ़ाह दी. 
   
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