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अन्ना, गांधी और जेपी

बात पते की

 

अन्ना, गांधी और जेपी

प्रीतीश नंदी


जब अन्ना हजारे अपने लगभग अनजान-से जन लोकपाल अभियान के साथ चुपचाप दिल्ली पहुंचे थे, तब मुख्यधारा की राजनीति में उन्हें बहुत कम जाना-पहचाना जाता था. लेकिन यह लगभग चमत्कार ही था कि वे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में देश के सबसे सशक्त आंदोलन के नेतृत्वकर्ता के रूप में सामने आए. पूरे एक सप्ताह तक हजारों लोग उनके अनशन को अपना समर्थन देने या उसमें सम्मिलित होने के लिए देश भर के विभिन्न हिस्सों से उमड़कर आते रहे. इनमें से बहुतों को, जैसे कि स्कूली बच्चों और ग्रामीणों को जनलोकपाल बिल के बारे में कुछ नहीं पता था, लेकिन इसके बावजूद वे अन्ना के साथ खड़े हुए और अचानक अन्ना भारत की सबसे सशक्त नैतिक ताकत बन गए. जेपी के छात्र आंदोलन के बाद इस तरह का नजारा नहीं देखा गया था.

गांधी-जेपी-अन्ना-हजारे

कई लोग अन्ना की तुलना गांधी से कर रहे हैं. वे उनके आंदोलन को भारत का दूसरा स्वतंत्रता संग्राम बता रहे हैं. उस भ्रष्टाचार से स्वतंत्रता, जिसने देश की भावना को गहरी चोट पहुंचाई है. इस आंदोलन की सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि इसमें देश के युवा जोर-शोर से शामिल हुए और अन्ना के लिए समर्थन व्यक्त करने के लिए फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया का खूब इस्तेमाल किया गया.

सरकार ने हमेशा की तरह पहले तो अनशन की अनदेखी की और यह दिखावा करती रही कि यह एक महत्वहीन घटना है. फिर उसने उसका उपहास करना शुरू कर दिया. उसने मीडिया के एक हिस्से का इस्तेमाल करते हुए इसे अंदरूनी कलह से ग्रस्त अभियान के रूप में भी प्रचारित किया. छीछालेदर करने वालों ने इस आंदोलन का मजाक उड़ाया. यह कहा गया कि आखिर किस तरह 72 साल का एक बूढ़ा, जिसके पास कोई धनराशि नहीं है या जिसे किसी राजनीतिक दल या दिल्ली की किसी ताकतवर लॉबी का समर्थन प्राप्त नहीं है, केंद्र की सर्वशक्तिमान सरकार से लड़ाई लड़ने की उम्मीद कर सकता है? और वह भी एक अनशन के जरिये? क्या यह कोई मजाक है?

लेकिन उन लोगों को जनता की ताकत के बारे में अंदाजा नहीं था. महज तीन दिन में अन्ना का अनशन एक विशाल राजनीतिक आंदोलन बन गया. देश और दुनियाभर से भारतीय इस आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए उमड़ पड़े. ओपिनियन लीडर्स के साथ ही कुछ बिजनेस लीडर भी इस आंदोलन का समर्थन करने लगे. विपक्ष ने मौके का फायदा उठाना चाहा, लेकिन उसे दरवाजे से ही लौटा दिया गया. आंदोलनकारी इसे अपनी लड़ाई मानते थे और वे नहीं चाहते थे कि इसे किसी अन्य के द्वारा अपहृत कर लिया जाए.

ट्विटर पर ट्वीट की कतार लग गई. एक अनधिकृत ट्वीट सोशल मीडिया का सबसे लोकप्रिय नारा बन गया- ‘मेरा नेता चोर है.’ हजारे ने बाद में कहा कि राजनेताओं को लौटाया नहीं जाना चाहिए. सभी को अभियान में सहभागिता करने का अधिकार है. लेकिन आंदोलनकारी इस अभियान को राजनीतिक रंग नहीं देना चाहते थे. उनका कहना था कि यह आम जनता का आंदोलन है.

सरकार पहले तो दुबककर बैठी रही और उसने आंदोलनकारियों को कुछ भी देने से इनकार कर दिया. यदि कानून निर्माण की प्रक्रिया में लोग सीधे शिरकत करने लगेंगे तो फिर लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद और मंत्रियों की क्या भूमिका रह जाएगी? प्रधानमंत्री कार्यालय को भी लोकपाल के दायरे में लाने की मांग कितनी दुस्साहसपूर्ण है? जब निर्वाचित जनप्रतिनिधि संसद में उपस्थित हैं तो ये लोग स्वयं को देशवासियों का प्रतिनिधि क्यों समझने लगे? क्या हुआ अगर सरकार इस विधेयक को 42 साल से दबाकर बैठी है? क्या हुआ अगर एक के बाद एक घोटाले होते जा रहे हैं? क्या ए राजा जेल में नहीं हैं?

यह प्रहसन कुछ समय चलता रहा और फिर आखिरकार शरद पवार सामने आए. मंत्रिसमूह से उनके द्वारा दिए गए इस्तीफे ने ही विधेयक का रास्ता साफ किया. वे जानते थे कि अन्ना पीछे हटने वाले नहीं हैं. यह पहली जीत थी. दूसरी जीत तब हासिल हुई, जब सोनिया गांधी ने अन्ना को पत्र लिखते हुए उनसे अनशन समाप्त करने का अनुरोध किया. साथ ही यह आश्वासन भी दिया कि सरकार उनके प्रस्ताव पर विचार करेगी. अन्ना ने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया. उन्होंने एक आधिकारिक अधिसूचना की मांग की. वे झांसे में आने को तैयार नहीं थे.

आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा. उसने सभी मांगें मान लीं. जनता की जीत हुई. प्रवक्ताओं द्वारा टीवी पर कही जाने वाली चिकनी-चुपड़ी बातें एक झटके में खत्म हो गईं, जब यह घोषणा हुई कि सरकार ने सभी मांगें मान ली हैं और आगामी मानसून सत्र के दौरान विधेयक को संसद में प्रस्तुत कर दिया जाएगा.

जिन लोगों ने 1947 या 1977 की घटनाएं नहीं देखीं, उनके लिए यह एक जनांदोलन के साक्षी होने का पहला मौका था. देश के जिस युवा को एकजुट करने के लिए राहुल गांधी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए थे, उन्हें अन्ना हजारे ने कुछ ही दिनों में एकजुट कर दिया. पिछले सप्ताह मैंने इन युवाओं को हर जगह पाया. जंतर-मंतर पर, आजाद मैदान में, गेटवे ऑफ इंडिया पर. हर शहर की गली और कूचे में, हर टीवी चैनल पर, अपने दिल की बात कहते हुए. हर उस भारतीय की तरह, जिसने इस जनांदोलन में अपनी छोटी-सी भूमिका का निर्वाह किया था, मैंने भी गौरव और सशक्तता का अनुभव किया. देश को बदलने का हमारा विश्वास लौट आया था. हमने यह भी साबित कर दिया कि बुजुर्गो और नौजवानों के स्वप्न भी एक हो सकते हैं.

मैं अपने नायकों की किसी अन्य से तुलना नहीं करता. मेरे लिए गांधी हमेशा गांधी ही रहेंगे- इस महादेश के राष्ट्रपिता. मेरे लिए जेपी हमेशा जेपी ही रहेंगे; एक साहसी व्यक्ति, जिन्होंने एक असंभव लड़ाई लड़ते हुए हमारे लिए फिर से लिखना, बोलना और स्वप्न देखना संभव बनाया. और अब अन्ना हजारे ने एक बार फिर हमें यह सिखाया कि कुछ भी असंभव नहीं है. सरकार चाहे कितनी ही ताकतवर क्यों न हो, उसे लोगों की आकांक्षाओं के सामने झुकना ही पड़ता है. हम प्रयास करें कि कोई भी सनकी व्यक्ति इस सच को झुठला न सके.

14.04.2011, 00.16 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

प्राण चड्डा [pranchadha.bsp@gmail.com] bilaspur - 2013-01-31 03:52:29

 
  भारत में पहली आजादी के बाद बापू उपेक्षित हुए,राजघाट में शपथ बाद जेपी को किसी ने न पूछा..अन्ना यदि सत्ता बदलाव में सफल हुए तो फिर वही होगा..कोई उनकी सुनेगा भी नहीं सुनेगा .. 
   
 

Anupam [anupamneomtwork1@gmail,c] Dhanbad - 2011-09-01 15:51:11

 
  this news is very knowlegable. 
   
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