पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >मनीष शांडिल्य Print | Share This  

पीएम का वोट बहिष्कार

बहस

 

पीएम का वोट बहिष्कार

मनीष शांडिल्य


जब भी चुनाव आते हैं, अपने प्रभाव क्षेत्र में मतदान बहिष्कार की घोषणा कर माओवादी या अलगाववादी संसदीय ढकोसलों और चुनावी तिकड़म का पर्दाफाश करने का फरमान जारी करते हैं. इस फरमान का असर आम मतदाताओं पर कितना पड़ता है, इससे संबंधित खबरें अलग-अलग रूप में आती रहती हैं. फिलहाल बड़ी खबर यह है कि हाल के वर्षों में माओवाद को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बताने वाले भारत के प्रधानमंत्री ने भी इस बार ‘वोट बहिष्कार’ किया.

मनमोहन सिंह


सोमवार को असम विधानसभा के दूसरे व अंतिम चरण का मतदान संपन्न हुआ. मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरशरण कौर का नाम असम की दिसपुर विधानसभा सीट में मतदाता के तौर पर दर्ज है जहां सोमवार को मतदान हुआ. लेकिन सिंह दंपत्ति ने एक बार फिर अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया. प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार कर असम की जनता से अपने दल के उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान देने की गुजारिश तो की मगर खुद इस ‘झंझट’, देश में मतदाताओं का बड़ा तबका मतदान के लिए इसी शब्द का प्रयोग करता है, से दूर रहे.

मनमोहन सिंह ने 2006 के असम विधानसभा चुनावों में भी वोट नहीं डाला था.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र तो है लेकिन इस सबसे बड़े लोकतंत्र में कुछ अनोखी घटनाएं भी होती रहती हैं, विरोधाभास देखने को मिलते रहते हैं. सबसे ताजा घटना है मनमोहन सिंह का खुद मतदान नहीं करना. और विरोधाभास यह है कि मनमोहन सिंह का नाम असम में एक मतदाता के रूप में दर्ज है.

ऐसा नहीं है कि यह पाखंड करने वाले वह कोई पहले प्रधानमंत्री हैं. उनसे पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल भी पटना के सब्जीबाग मोहल्ले के मतदाता रह चुके हैं. राज्यसभा पहुंचने के लिए संसद पहुंचाने वाले राज्य का निवासी बनने की कलाबाजी करने वाले नेताओं, उद्योगपतियों की सूची तो काफी लंबी है लेकिन संसदीय व्यवस्था के सर्वोच्च पद पर बैठा व्यक्ति ही जब झूठ का सहारा ले रहा हो बाकी तो उसी नक्शे-कदम पर चलेंगे ही.

अन्ना हजारे अपने अनशन की सफलता के बाद अपने अभियान में नये एजेंडों को जोड़ते हुए चुनाव सुधार की भी मांग कर रहे हैं. उन्होंने मतदाताओं को राइट टू रिजेक्ट का विकल्प देने की मांग की है. प्रधानमंत्री का मतदान नहीं करना देश में चुनाव सुधार के लिए बन रहे माहौल में एक नया आयाम जोड़ता है. चुनाव सुधार के सवाल को आगे बढ़ाते हुए संसदीय प्रणाली में लगभग नख-दंत विहीन राज्य सभा और विधान परिषदों की जरूरत और यहां पहुंचने वाले लोगों के प्रतिनिधित्व के मानदंड पर भी बहस करनी चाहिए.

दूसरी ओर प्रधानमंत्री को एक नागरिक के तौर पर देखें तो भारत में बड़ी संख्या में नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं. कुछ व्यस्तता, कुछ अपने मतदान केंद्रों से दूर कहीं रोजी-रोटी तलाशने को मजबूर होने के कारण, कुछ वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था से नाराजगी या विलगाव, कुछ मतदाता सूची में नाम नहीं होने और कुछ कई दूसरी वजहों से अलग-अलग अवसरों पर होने वाले चुनावों में मतदान नहीं करते हैं.

मतदान से अलग रहने का एक कारण भारतीयों का बड़े पैमाने पर अराजनीतिक होते चले जाना भी है. जिसके लिए देश में चलायी जा रही सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक प्रक्रियाएं भी बराबर की जिम्मेवार हैं. लेकिन अगर देश का प्रधानमंत्री भी इसी सूची में शामिल हो जाये तो यह देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में एक बहुत गलत उदाहरण पेश करता है. यह लापरपाही, उदासीनता यह भी दर्शाती है कि मनमोहन सिंह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के बारे में क्या नजरिया रखते हैं.

मतदान वर्तमान संसदीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सबसे जरूरी अंग है. भारत का निर्वाचन आयोग मतदाताओं को जागरूक करने के लिए विभिन्न तरह के कार्यक्रम चलाता रहता है. खास कर चुनावों के समय. निर्वाचन आयोग मतदाता जागरूकता दिवस भी मनाता है. लेकिन वह देश के लोकतांत्रिक मुखिया को जागरूक करने में, मतदान का महत्त्व समझाने में असफल रहा है. प्रधानमंत्री को मतदान का महत्त्व समझाने के लिए चुनाव आयोग को एक विशेष अभियान चलाना चाहिए. होना तो यह चाहिए था कि कानूनी बाध्यता नहीं होने के बावजूद प्रधानमंत्री खुद मतदान कर आम जनता को भी मतदान के लिए प्रोत्साहित करते. वैसे गुजरात में नरेंद्र मोदी की तर्ज पर अगर देश के दूसरे हिस्सों में भी मतदान करना कानूनन अनिवार्य करने की कोशिश होती और पीएम ने ऐसा किया होता तो राजनीतिक गलियारे में अभी क्या कुछ चल रहा होता ?

14.04.2011, 11.16 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in