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जन लोकपाल या जन चौपाल?

बात पते की

 

जन लोकपाल या जन चौपाल?

कनक तिवारी


प्रस्तावित जन लोकपाल विधेयक को लेकर देश में खासी सुगबुगाहट है. यह पहली बार हुआ है कि किसी जन आंदोलन के कारण जनता या सिविल समाज के कुछ चुने हुए प्रतिनिधियों को मसविदा समिति में बराबर संख्या के आधार पर महत्वपूर्ण मंत्रियों के साथ सहभागिता मिली हो. नागरिक समाज के संसदीय विधायन में प्रवेश करने की पहली पायदान तक पहुंचने का यह एक प्रारंभ है. इससे संसद की संप्रभुता, गरिमा या भूमिका धूमिल नहीं होती, जैसा कुछ मंत्री बार बार बयान दे रहे थे.

anna-hazare

अन्ना हजारे ने जन लोकपाल अधिनियम बनाने के लिए किसी सुविचारित, सुसंगठित और दीर्घजीवी आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया है. हुआ यह है कि देश की जनता भ्रष्टाचार सहते सहते इतनी आजिज हो चुकी है कि अन्ना हजारे उसे एक प्रतीक पुरुष के रूप में भाये. इसमें भी कोई शक नहीं है कि कथित सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों ने आंदोलन और अनशन करने के लिए सही वक्त चुना था.

विश्व क्रिकेट में भारत के जीतने के बाद (चाहे कैसी भी स्थिति हो) एक तरह की एकजुटता और उससे उत्पन्न उत्साह तो भर गया था. कुछ ही दिनों बाद पेशेवर, बदनाम लेकिन लोकप्रिय आइपीएल की क्रिकेट प्रतियोगिताएं होने वाली थीं. इसी बीच तीन दक्षिणी और दो पूर्वी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव होने वाले थे. इन सभी प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी अपने वर्चस्व की लड़ाई से जूझ रही थी.

राष्ट्रीय जीवन की ऐसी परिस्थिति का अन्ना हजारे और उनके साथियों ने भरपूर मनोवैज्ञानिक फायदा उठाया. हुआ वही जिसकी आशंका थी. झुक जाने वाली सम्प्रग सरकार के इंतजामकुनिन्दा पहले से ही इस स्थिति को टाल सकते थे. कांग्रेस पार्टी का बड़ा नेतृत्व इन दिनों उनके हाथों में है, जिनकी देह से इत्र और सेंट की खुशबू आती है, पसीने की दुर्गंध नहीं. अन्ना हजारे की अगुआई वाली समिति की शर्तें मानते हुए भी केन्द्र सरकार ने आखिर अपनी कूटनीति छोड़ देने का वायदा तो नहीं किया था. लिहाजा परदे के पीछे खेल शुरू हो गया.


स्वामी रामदेव और स्वामी अग्निवेश दो ऐसे भगवाधारी हैं जो अपने वस्त्रों का उपयोग अपनी छवि और अपना ब्रांड नाम चमकाने के लिए बेहतर करते हैं. इन दोनों भगवाधारियों की उपस्थिति से आंदोलन की गम्भीरता जनधर्मिता के अर्थ में क्षीण हो जाती है. एक गंभीर मुद्दे पर देश के आमजन की चिंताओं को संतुलित ढंग से रेखांकित करने के बदले बाबा रामदेव मंच पर उन्माद उत्पन्न करने का अभिनय ज्यादा करते रहे.

वे क्षण उत्साह और संघर्ष के थे. उनमें श्रोताओं का मनोरंजन करने की स्थितियां नहीं ढूंढ़नी चाहिए थीं. भ्रष्टाचारियों को फांसी देने की मांग पर तालियां बजवाने के बावजूद वह एक फासीवादी प्रवृत्ति है, जो लोकतंत्र में पूरी न्याय व्यवस्था के औचित्य पर सवाल लगाती है. अफजल गुरु को तो कई कारणों से फांसी पर चढ़ाया नहीं जा सका है. नवागंतुक भ्रष्टाचारी आनन फानन में फांसी पर कैसे चढ़ जायेंगे?

दिग्विजय सिंह इन दिनों राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस द्वारा नियुक्त विवादास्पद बयानों, चुटकुलों, चुनौतियों और धर्म निरपेक्षता की झंडाबरदारी के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय हैं. जब तक अन्ना का अनशन परवान चढ़ता रहा, कांग्रेस के महासचिव मौन रहे. जब चिड़ियां खेत चुग गईं तो उन्होंने सभी ऐसे लोगों को चुनाव लड़ने की चुनौती दे दी जो निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के कथित भ्रष्टाचार पर सजाएं ढूंढ़ रहे हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Deepak [deepakrajim@gmail.com] Abudhabi

 
  बिल्कुल सही कहा आपने ...जनलोकपाल का हाल भी ऐसा ही दिखता है .As far as digvijay and their fellows are concern..let me try to explain by my best ormy worst.

their brain is eitheir empty or full ,if full then full of junk.
 
   
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