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मर्दाने चरित्र प्रमाण-पत्र

स्त्री विमर्श

 

मर्दाने चरित्र प्रमाण-पत्र

मनीषा


चरित्र चरमराने से परेशान औरतों में लेखक, साहित्यकार, पत्रकार, बैंकर, अदाकार, कवि, कलाकार, डॉक्टर, इंजीनियर, से लेकर भाजी वाली, घरेलु काम वाली, बीपीओ में रात्रि-पाली करने वाली, नर्स, घरवाली, मास्टरनी या बाबूगिरी करने वाली सभी शामिल हैं. अपने समाज में औरत होने का मतलब ही है, दुविधाओं में ग्रस्त रहना. दूसरों यानी पुरूषों के लिए शोक में लिपटी रहना. आचार-व्यवहार पर चरित्र की चाशनी का मुलम्मा चढ़ाये फिरना. पुरूषों ने बेहद चतुराई से स्त्री के चरित्र को हमेशा अपनी दया का मोहताज प्रचारित किया है. औरतों पर त्वरित टिप्पणी कर उनकी छवि बनाने-बिगाडऩे का ठेका वे हमेशा से अपने अंगूठे के नीचे रखने को स्वतंत्र रहे हैं. आज भी उनके लिए यह निर्णय सुनाना कि अमुक लडक़ी बहुत ‘घटिया’ है, काफी पौरुषेय दंभ देने वाला होता है.

women-by-ratnakar

लड़कियों को लेकर पुरुषों में काफी अलग किस्म की शब्दावली प्रयोग होती है, जिसका जिक्र भी करना अभद्रता माना जा सकता है. बुरी, चरित्रहीन, छिनाल, बाजारू, रंडी जैसी शब्दावली इनके लिए आम है. दरअसल, ये आज भी औरत को प्रोडक्ट से ज्यादा नहीं समझते. अपनी बीवी और बच्ची के अलावा इनको बाजार में टहलती, दफ्तर में काम निपटाती, बस में सफर करती, बैंक में नोट गिनती, सडक़ पार करती, भाजी-सौदा-सुलभ खरीदती हर औरत का चरित्र गंदा लगता है. जबकि, असलियत यह है कि समाज की सारी औरतों को चरित्र-प्रमाण पत्र बांटने में जुटे ये लोलुप किसी औरत को साफगोई से देखना जानते ही नहीं! मनोविज्ञान चीख-चीख कर अब कहता है कि पुरुषों के दिमाग में हर छठे मिनट पर सेक्स घूमता है. अपनी इस कामुकता पर उन्हें लगाम लगाने की जरूरत महसूस नहीं होती.

मेरी एक पत्रकार मित्र बड़ी आहत हैं, ऐसे ही कुछ उद्दंडी पुरुषों की टिप्पणियों से. हिंदी की एक बड़ी उपन्यासकार भी आहत हो जाती हैं, ऐसी ही छींटाकशी से. ये प्रबुद्ध औरतें हैं. इनकी समाज-परिवार में अपनी पहचान है. अपनी बात भी उचित ढंग से रखने में सक्षम हैं ये. बावजूद इसके, ये उन्हीं दकियानूस जंजालों में उलझ जाती हैं.

कोई (पुरुष) हमारे चरित्र का निर्माता कैसे हो सकता है? ऐसी कौन-सी परिस्थितियां हैं, जो उन्हें निर्णायक मानने पर मजबूर करती हैं? जो पुरुष किसी भी औरत को कपड़ों की तमाम परतों में लिपटी होने के बावजूद अपनी नजरों से नग्न ही निहारता है, उसके बारे में क्या कहा जाए?

हम सब औरतों को यह अहसास नहीं है कि पुरुष जब औरतों को देखते हैं तो सबसे पहले उनकी नजरें छाती पर अटकती हैं. वे जुबान से कुछ भी बोलें, पर उनके चेहरे के हाव-भाव पढ़ कर हम समझ ही लेते हैं कि पुरुष मन में क्या चल रहा है.

औरत का पर-पति की तरफ देखना भी पुरुषावली के अनुसार घृणित है परंतु पर-स्त्री को प्रणय-निमंत्रण देने को वे विजेता के तौर पर देखते हैं. पुरुषों को भ्रम है कि उनके जीवन में जितनी औरतें (अंतरंग) आती हैं, उनका पौरुष उतना ही स्ट्रांग होता जाता है. इसकी महिमा बखानते समय उनको ना तो अपने चरित्र के तार-तार होने का भय होता है, ना ही अपने यौन उच्छृंखलताओं पर किसी तरह की कोई ग्लानि ही.

पुरुषों को हमेशा से भ्रम रहा है कि औरतों का वजूद उनकी दया के भरोसे ही धरती पर शेष है. वे औरतों को अपना शिकार मानते हैं और अपने पौरुष को परखने के लिए उसकी देह का इस्तेमाल शौक से करते फिरते हैं. चरित्र को केवल यौन शुचिता से जोडऩे की नासमझी रखने वालों की माफ करके हम महानता के खांचे में नहीं बने रह सकते. हमको जबरन उनके भ्रम को चकनाचूर करना होगा. उनकी दया को दुत्कारना होगा. साथ ही, उनके झूठे पौरुषेय दंभ को कुचलने में कोई संकोच नहीं करना होगा.

सुविधाजनक स्थिति में जीने की इसी आदत के चलते निन्दा-रस के साथ-साथ चरित्र उधेडऩे की रसीली बातों से वे खुद को बचा नहीं पाते. अपने पास यह अधिकार सुरक्षित रखने को लालायित पुरुष ‘बुरी’ औरतों की श्रेणी में उन्हीं औरतों को रखते हैं, जो उनकी पहुंच से बाहर नजर आती हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rupesh [rupeshdevray@rediffmail.com] khandwa - 2011-04-24 12:36:39

 
  महिलायें आज बराबरी से अपना हक़ ले रही है. आज वो कही ज्यादा शक्तिशाली और आधुनिक बनती जा रही है,पुरातन दौर की तुलना में. सिर्फ ग्रामीण, दूरस्थ क्षेत्रों में जहां महिलायें आज भी शिक्षा और आत्मनिर्भरता से दूर है, वहीं वाकई उनका शोषण हो रहा है. यदि भारत की महिलाओं को शत प्रतिशत शिक्षित कर दिया जाये तो फिर महिला किसी भी तरह से शोषित नही होगी क्योंकि तब उसके पास ज्ञान और धन की ताकत होगी और वो अपने हक़ की लड़ाई लड़ने में खुद समर्थ होगी.आज शहरी महिलायें चालाक, स्मार्ट, पैसे वाले लडको को फांसने में ही अपनी महानता समझ रही हैं, और लड़के भी उनके मोहपाश में दुगनी वेग से खिचे जा रहे है. औरत पैसो और कामयाबी के सम्मोहन में टीवी, फिल्मो में अपनी देह का प्रदर्शन कर रही है. इसके लिए भी पुरुष ही जिम्मेदार है क्या? क्या हुस्न ही औरत के पास कामयाबी का आसान रास्ता है,क्या वो बुद्धि के जरिये कामयाबी के झंडे नही गाड़ सकती है. 
   
 

Neeraj Kumar Sharma [neerajsharma277@rediffmail.com] Batala(Punjab) - 2011-04-24 12:02:07

 
  यथार्थ को उजागर करता आलेख.सामाजिक मान्यताओं को बदलने की जरुरत को सुझाता आलेख. बधाई मनीषा जी.  
   
 

Biswaranjan [bbanerjee2000@gmail.com] Ahmedabad - 2011-04-23 17:17:47

 
  यह तो ह्यूमन साईकोलॉजी है. इस सब के लिये औरत ही जिम्मेवार है. वैसे भी देखा जाये तो आजकल औरत भी मर्द से कम नहीं है. 
   
 

ramesh paras nath [rk140676@gmail.com] azamgarh - 2011-04-22 14:35:45

 
  मनीषा जी मैं आपको अक्सर पढता रहा हूँ. आपके तर्कों और कुतर्को से काफी हद तक प्रभावित भी रहा हूँ. द सेकेंड सेक्स में सिमोने लिखती हैं कि- स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है... आपसे गुजारिश है कि मर्दों और मर्द समाज को गरियाने की अपेक्षा कुछ बातों पर वो भी ध्यान दें. आखिर सभी समस्याओं की जिम्मेदारी केवल पुरुष ही नहीं है. 
   
 

rajendra singh jadon [specil.repoter@gmail.com] bhopal - 2011-04-22 06:28:19

 
  बहुत अच्छा. इसमें मेले लिखने लायक कुछ छोड़ा ही नहीं गया है.  
   
 

dr.niranjan singh [dr.niranjanparmar2007@rediffmail.com] allahabad uttar pradesh - 2011-04-21 09:11:04

 
  apki soch apni jagah sahi hai par kya apko nahin lagta ki samaj men aurton ki badttar halat ke liye kafi had tak vah svayam jimmedar hai.kya ap tv ke parde par aurton ki nangai ko uski tarakki manti hain. 
   
 

puspendra singh [mailme_puspendra@rediff.com] umaria mp - 2011-04-21 07:33:51

 
  yah its may b true but not universal truth coz thinking is not separated as man or women nor Hindu or Muslim etc. its depend on person to person and there culture also sanskar .  
   
 

veerendra jain [j_virendra@yahoo.com] bhopal - 2011-04-21 07:06:44

 
  यह लेख पठनीय है और सभी को पढ कर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहिए। सबसे पहले औरत को ह्यूमन बीइंग समझना जरूरी है व उसके बाद उनको उनके अनुरूप किये जाने वाले श्रम का उचित मूल्य मिलना सुनिश्चित हो। तब ही नई नैतिकता स्थापित की जा सकेगी।  
   
 

ashutosh kumar [ashuvandana@gmail.com] delhi - 2011-04-21 01:01:09

 
  Shaabaas Smita. So new woman has finally arrived. 
   
 

krishnabiahari [krishnatbihari@yahoo.com] abudhabi - 2011-04-20 18:15:18

 
  यह लेख कहीं से भी नया नहीं है.सड़क पर, बाज़ार में, औरत ने अपने आपको बेचने की वास्तु खुद बना डाला है. उसे समझ में आ गया है कि वह किस तरह पुरुष को ठग सकती है. इस कोशिश में उसका अपना पतन होता जा रहा है. उसे सोचना पड़ेगा कि उसके बेटे, भाई और पति किसके द्वारा पतित बनाये जा रहे हैं? इन पुरुषों को सही मार्ग पर चलने का जिम्मा किसका है? घर में दरोगा बनी औरत अपनी संतानों पर दरोगाई क्यों नहीं कर रही कि दुनिया सुधरे? मगर क्यों करे? उसे एक पतित समाज चाहिए जिसके लिए वह उड़ान भर के दिल्ली से कोलकाता, कोलकाता से गोवा, गोवा से बंगलूरू किसी होटल में पहुंचती रहे और गौरवान्वित होकर खुद को बेचे. चलती रहे तो ठीक, चली जाये तो घडियाली आंसू बहाए और महिला अधिकारों की बात करे, ह्यूमन राइट्स की मांग करे. मैं घर देखता हूँ और घर में औरत का रूप देखता हूँ. सभी लोग देखते होंगे. स्थिति इतनी बुरी है कि औरत के दुर्व्यवहार को बर्दाश्त किया जा रहा है. 
   
 

smita [smitavaisnav@yahoo.com] junjhanoo - 2011-04-20 14:20:18

 
  काफी प्राचीन राग है . हमारे ज़माने से पहले किसी और ज़माने का या फिर किसी दुसरे उपग्रह के कहानी की तरह..पहले मुझे लगा क़ि कोई पुराने article को reprint किया है... लड़की होने का मतलब हम कुछ दावों को लम्बे समय तक नही चला सकते ...कभी यह भी लिख लिया जाए क़ि हम लड़कियां लड़को के बारे मैं क्या ख्याल रखती है और वो कितना बदला है. इस तरह के पुराने ख्याल पुराने एल्बम में रखे तस्वीरों की तरह है. 
   
 

yogesh jadon [chingi0802@gmail.com] agra - 2011-04-20 12:06:21

 
  हो सकता है कि कुछ लोगों का अवसाद स्त्री के बारे में उस तरह सोचता हो जिसकी बात आप कर रही हैं मेरी समझ में तो पुरुष के अधिकांश मामलों में स्त्री की ही दखलंदाजी होती है वह शादी होने से पहले अपने किसी भी निर्णय के लिए मां पर निर्भर होता है और शादी के बाद पत्नी से विमर्श करके ही कोई निर्णय करता है। अधेड़ावस्था में उसके सबसे निकट उसकी बेटी होती है फिर आप कैसे कह सकती हैं कि इस समाज में स्त्री को उतना सम्मान नहीं है, कि उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। अब अगर स्त्री खुद ही अपने को हेय समझेगी तम मुश्किल होगा। मेरी नजर में न तो वह महान है और न ही गिरी हुई। वह समान है। कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हुई। 
   
 

Shubh [shub_laabh@yahoo.com] Mumbai - 2011-04-20 10:55:55

 
  ये लेख बहुत अच्छा है लेकिन औरतो के साथ इसलिए ऐसा होता है क्योंकि औरतों के बीच एकता नहीं है, वो खुद औरत होकर औरत से जलती है. एक औरत होकर दुसरी औरत को दुःख देना, उसका घर बर्बाद करना ये सब औरत ही करती है. आजकल खुद औरत और लड़कियां अपना शिकार लडकों को बना रही हैं सेक्स के लिए, पैसे के लिए. अच्छे लड़कों को, इज्जत देने वाले लड़कों को,सच्चा प्यार करने वाले लड़कों को आजकल कोई औरत पसंद नहीं करती है. लड़की उन्हें पसंद करती है, जो चालक लड़के होते हैं, ये है आज का कडवा सच. आप अच्छा लिखती हैं, इसलिए मैं आपके लेख की तारीफ करता हूँ. आपको सलाम करता हूँ. आपने ये लिख कर कुछ लोगो को सोचने पर मजबूर कर दिया है. 
   
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