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अभागी औरतों की एक तस्वीर

बहस

 

अभागी औरतों की एक तस्वीर

कृष्ण राघव


महिलाओं ने सोचा कि महिलाओं की दशा पर एक महिला द्वारा ही एक सर्वेक्षण कराया जाए कि भारत के गांवों में आज की महिला की क्या दशा है. हम उस संस्था का नाम तो नहीं बताना चाहेंगे जिन्होंने डा. विभा गुप्ता को यह काम सौंपा(डाक्टर विभा गुप्ता आई आई टी दिल्ली से,ग्रामीण महिलाओं से संबंधित विज्ञान एवं तकनीकी विषय में पी.एच.डी. हैं एवं ग्रामापयोगी विज्ञान केंद्र, वर्धा (महाराष्ट्र) में ग्रामीण महिलाओं के सर्वांगीण विकास के लिए ही कार्यरत हैं) अलबत्ता,इसी लेख के अंत में हम इतना अवश्य बताएंगे कि उनकी सर्वेक्षण रपट का क्या हुआ? फिलहाल तो हम उनके सर्वेक्षण के कुछ अंश आपको बताते है. इसकी प्रामाणिकता के बारे में हम केवल यहीं कहेंगे कि हम भी इस सर्वेक्षण का हिस्सा रहे हैं.

women

इलाका- जोधपुर से जैसलमेर के बीच(राजस्थान)यहां की औरतों ने बताया कि हमारा आदमी बीमार हो जाए तो हम उसे जेवर, जमीन बेचकर भी बचाएं, किंतु हम बीमार हों तो आदमी की नीयत सिर्फ यहीं रहती है, बल्कि कुछ तो साफ-साफ कहते भी हैं कि ‘ तू मरे तो दूसरी लाऊं.’

उनका कहना है कि “कितनी तो जीते जी, अंदर ही अंदर मर गईं, उनकी कौन पूछता है?”

इलाका- कच्छ(गुजरात) गोंद और मावे के लड्डू बनाने के एक छोटे से कारखाने में अपनी निजी पूंजी (चाहे जितनी ही सही) जुटाने के लिए कई परिवारों की महिलाएं(जिनमें खाते-पीते परिवारों की भी हैं) लड्डू बनाने के लिए आती हैं. एक महिला के हाथ,शाम तक जितने लड्डू बना देते हैं, उसके हिसाब से कुछ पैसे मिल जाते हैं. यहां पाया गया कि महिलाएं निरंतर कोई न कोई लोकगीत, समवेत स्वरों में गाती जाती हैं और लड्डू बनाती जाती हैं. लगा कि यहां वातावरण कितना सहज है. महिलाओं का मनोरंजन भी हो रहा है और मालिक का काम भी. किंतु बात कुछ और ही थी. गीत वे अपने मन से नही गातीं. जबरदस्ती उन्हें गाने को कहा जाता है जिससे कि चुपचाप बैठे-बैठे वे कहीं लड्डू न खाती रहें. जब मुंह गाता रहेगा तो खाएगा कैसे? किसी ने ठीक कहा है ‘ भूख लगे तो गाना गा.’

जैसलमेर में एक महिला मिली. घर-घर जाकर शिक्षा का अलख जगाना, बच्चों और महिलाओं में जागृति का शंख फूंकना उसका धर्म, किंतु कमी एक ही कि वह ठाकुर नहीं थी, छोटी जाति की थी. घरवालों ने नाम अवश्य ओमवती रखा था, किंतु ठाकुरों के मोहल्ले में उसको यह नाम लेकर कोई पुकारता तक नहीं. ओछी जाति के नाम तो कुछ केला, इमरती,अनारो,फूला जैसे होने चाहिए न.कौनी सी जाति और कैसा नाम. नाम की तो छोडि़ए, ओमवती का कहना था कि “कितनी भी चिलचिलाती धूप क्यों न हो,(राजस्थान की रेत के बारे में भी सोच लीजिए) हम ठाकुर के घर के सामने से चप्पल पहन कर नहीं आ सकते. पैर जलते हों तो जलते रहें. उनके यहां हम खाट, पीढ़े या कुर्सी पर भी नहीं बैठ सकते. जमीन पर बैठकर काम करना हो तो करें, नहीं तो अपने घर जाएं. सरकारी कानून का जिक्र करने पर ओमवती ने बताया कि वे होते होंगे शहरों में,गांव में तो ठाकुर का ही राज चलता है.”

किसानों के घर की औरतें तो चाहे किसी भी जाति की क्यों न हों, उनके दुख लगभग एक से ही हैं. दिन-रात काम में खटो और ताना सुनो कि लुगाइयां करती ही क्या है? जो कुछ करती है, पहले तनिक उसका जायजा लीजिए. घर की झाड़-बुहार, लिपाई-पुताई,खाना-पीना(राजस्थान हो चाहे कच्छ यहां पीने का पानी जुटाना मजाक नहीं है) जानवरों की पूरी देखभाल, बुवाई,निराई,गुड़ाई,कटाई सब में साथ-साथ फिर ‘तू करती क्या है?’ इतना काम करके भी जो थककर गिरती हैं तो खाने का मन ही नहीं करता. खाने की ताकत ही नहीं रहती.हारी-बीमारी में कभी किसी ने कुछ अच्छा खाने की बात कह भी दी तो आदमी तुरंत कहेगा- ‘काहे का घी-दूध? इसे कोई हल जोतना है क्या?’

एक महिला ने दुखी होकर, एक ही टिप्पणी की कि “कोई मेरे आदमी से पूछे कि मैं उसके बैलों से भी कम काम करती हूं क्या? उल्टे रात को जब मेरा मरद सो जाता है, तब भी मुझे जागना पड़ता है, कभी बच्चा रोने लगता है, कभी गाय की बछिया डकराने लगती है...बार-बार उठना पड़ता है. सोने से पहले आदमी का हाथ-पांव दबाओ, तक तक,जब तक कि वह सो न जाए.इस काम की क्या कोई उजरत मिलती है मुझे? आदमी ने खाली हल चलाकर हुक्का गुडग़ुड़ा लिया तो बहुत काम कर दिया ?”

सूखा पड़ गया हो तो कोई काम न हो तो मर्द लोग देशी शराब बेचना और बनाना सिखा देते हैं. यही एक कुटीर उद्योग रह जाता है वहां. घर के बाहर एक केतली टांग दी जाती है. यही निशानी है कि इस घर में शराब मिलती है. और न माने तो मर्द उन्हें जबरदस्ती शराब पिलाते हैं ताकि उन्हें शराब पीन की आदत पड़ जाए और आगे चलकर वे शराब का विरोध न करें.

मर्द की मर्दांनगी की अनूठी मिसालें यहां देखने को मिली. ये मिसालें राजस्थान की है. घर में कोई चीज समाप्त हो जाए तो मर्द के आने का इंतजार करना होगा.चाहे फिर वह माचिस ही क्यों न हो. पूरे दिन चाहे चूल्हा न जले, लेकिन माचिस तो बाजार से मर्द ही लाएगा. औरत को किसी काम से यदि बाहर जाना भी है तो अनुमति लेकर कई और औरतों के साथ ही. बीमारी में डाक्टर के पास जाना हो तो भी यहीं शर्त है.

जैसलमेर की एक और पुरानी परंपरा जो आज भी कायम है जिस पर आचार्य चतुरसेन शास्त्री ने उपन्यास लिखा, ‘ गोली’. इस प्रथा के अनुसार ठाकुर की शादी में दुल्हन अपने साथ आज भी दासियां दहेज में लाती है. ये दासियां ठाकुर की ही मिल्कियत बनकर रहती है. बंधुआ मजदूर भी और ठाकुर की रखैल भी.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pramod Kumar Bag [pramod.guruji@gmail.com] Ensenada,Mexico - 2011-08-13 21:37:11

 
  इतनी सारी रोचक जानकारी के लिये बहुत धन्यवाद. लगता है, महिलाओं को और एक स्वतंत्रता की लड़ाई लड़नी पड़ेगी. 
   
 

murlidhar [nkmurlidhar@gmail.com] ranchi jharkhand - 2011-04-29 17:49:29

 
  मामला गंभीर है. वैश्वीकऱण के दौर में यह समस्या और बढ़ी है. 
   
 

Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida - 2011-04-26 04:54:20

 
  दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों को छोड़ दें तो औरतें आज भी दोयम दर्जे की मानी जाती हैं.और सच कहा जाये तो इन बड़े महानगरों में भी औरत मुक्त कहां हुई है. उसके सारे कर्ता-धर्ता तो पुरुष ही हैं. 
   
 

arvindpant [arvindpant000@gmail.com] joshimath uttrakhand - 2011-04-25 12:11:16

 
  सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के सर्वेक्षण प्रतिवेदनों पर यदि ईमानदारी से थोडा भी सोचने की जरुरत यदि सरकारें करती तो हमारा सामाजिक और राजनीतिक ढांचा बदला होता. संपूर्ण भारत में महिलाओ की स्थिति आपके लेख से प्रतिध्वनित होती है, पर जमीन पर समस्याओ का समाधान कौन करेगा? सवाल और भी हैं, उन्हें तलाशने के लिए किसी बड़े संघठन के सर्वेक्षणों की जरुरत भी नहीं, वे इधर-उधर लटके-पटके स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, आवश्यकता उत्तर की है. संवैधानिक शासकों से आपकी क्या अपेक्षा है, कम से कम मेरे जैसे ज्यादा लोगो की नहीं,पीड़ित समाज को आगे आने से ही इन सुलगते प्रश्नों के जबाब मिलेंगे. 
   
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