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अदालतों की मानहानि

बात बोलेगी

 

अदालतों की मानहानि

कृष्ण राघव


डा. कैलाशनाथ काटजू की स्मृति में हर वर्ष एक व्याख्यानमाला का आयोजन होता है, यह पहली बार पता चला और यह भी पता चला कि काटजू जी जैसे स्वाधीनता संग्राम सेनानी आज भी याद किए जाते हैं और उनकी स्मृति में कुछ कारगर विचार-विमर्श भी हो जाता है, किंतु इस विचार-विमर्श से पूर्व चंद जानकारी इस महान देशभक्त डा. काटजू के बारे में.

contempt of court

डा. कैलाशनाथ काटजू काश्मीरी ब्राह्मण थे, जो मध्यप्रदेश की जावड़ा रियासत में बस गए थे. जावड़ा स्कूल से लेकर लाहौर होते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय तक में अपनी आपकी शिक्षा-दीक्षा हुई और आपने लॉ में डाक्टरेट हासिल की. देशभक्ति की बानगी कृपया निम्रलिखित तथ्यों से लें कि इन्होंने 1933 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में मेरठ कॉन्सपीरेंसी केस लड़ा था और 1937 में 17 जुलाई को लाल किले में आजाद हिंद फौज वाला मशहूर मुकदमा लड़ा था. 1937 से 1939 के बीच पंडित गोंविद वल्लभ पंत की सरकार में संयुक्त प्रांत (उ.प्र.) के विधि, न्याय एवं संसदीय कार्यों के मंत्री रहे.

फिर 18 महीने की जेल, उसके बाद 1942 में फिर जेल... बाद में देश की आजादी के बाद नेहरू मंत्रिमंडल में देश के तीसरे गृहमंत्री बने, रक्षामंत्री रहे, 31जनवरी 1956 से 1963 तक मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री पद निभाया, फिर राजनीति त्याग दी और 1968 की 17 फरवरी को देह त्याग दिया. इस तरह 1887 से 1968 तक अस्सी वर्षों तक यह देश सेवा में समर्पित रहे. आपके बारे में कहा जाता है कि आपने कभी अपने आदर्शों से समझौता नहीं किया और अनुशासन और न्याय के मुद्दों को लेकर जिद्दीपन की हद तक कठोर रहे.

ऐसे व्यक्ति की स्मृति में जो आयोजन होगा, वह गंभीर तो होगा ही! गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस व्याख्यानमाला के वक्तागण अपने-अपने क्षेत्र के जाने-माने विशेषज्ञ थे यथा गृहमंत्री और जाने-माने अधिवक्ता पी. चिदंबरम, हिंद समाचार पत्र के संपादक श्री एन.राम, जाने-माने विधिशास्त्री श्री केके वेणुगोपाल, सर्वोच्च न्यायालय के भूतपूर्व जज श्री कुलदीप सिंह, वर्तमान जज श्री मार्कण्डेय काटजू (डा. काटजू के पौत्र) तथा सभाध्यक्ष के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के निवर्तमान न्यायाधीश जे.एस. वर्मा.

सम्मेलन स्थल का चुनाव भी नई दिल्ली में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का एक सम्मेलन भवन था और दिनांक 23 अप्रैल 2011 ! उन्हीं दिनों के बीच जब अण्णा की आंधी ने दिल्ली में काफी उखाड़-पछाड़ की थी. मानों इस व्याख्यानमाला का विषय अण्णा की आंधी से उड़ा कोई बगूला था- What Ails The Indian Judiciary ‘भारतीय न्यायपालिका को क्या बीमारी लग गई है ’! विषय और वक्ताओं के विचार दोनों ही शुद्ध अंग्रेजी में थे, काश! हिंदी को भी यह सौभाग्य प्राप्त होता ! अस्तु !

चिदंबरम जी की एक बात बहुत जंची. कार्यक्रम शाम छह बजे से थे, सो वह छह बजे ही आ गए जबकि संयोजक उनसे आधा घंटे बाद आए. चिदंबरम जी को मानो उनका राजनीतिक दायित्व खुलकर बोलने से रोक रहा था, फिर भी उन्होंने एक पक्ष तो उजागर किया ही जो काफी सटीक था. उनका कहना था कि जजों की संख्या बहुत कम है और मुकदमें कहीं ज्यादा. जिससे न्याय की प्रक्रिया में तेजी नहीं आ पाती. इसी के साथ उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि न्यायालयों में कर्मचारियों का भी अभाव है.

कर्मचारियों की संख्या आवश्यकता से कम होने के कारण अदालतें मुकदमों का समय से निपटारा नहीं कर पातीं. इसके बाद चिदंबरम जी अंत तक बैठे रहे. सभी वक्ताओं के विचार उन्होंने बहुत ध्यान से सुने किंतु उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया. कोई नहीं पहचान सका कि वह क्या सोच रहे हैं. एन.राम जी अवश्य इस बात पर गौर करने के लिए जोर देते रहे कि न्यायपालिका का अधिकार-क्षेत्र न्याय देने तक ही सीमिति रहना चाहिए. न्याय अपने हाथ में लेने का अधिकार उन्हें विधायिका के लिए छोड़ देना चाहिए. जाहिर है उनका इशारा ‘ ज्यूडीशियल एक्टिविज्म’ अर्थात जज के सामाजिक कार्यकर्ता न बनने की ओर था. न्यायपालिका जो आजकल छोटी से छोटीबात के लिए सीमा लांघ कर स्वयं को नियम बनाने वाला भी समझ लेती है, उन्हें इससे बचने की सलाह दी गई थी, यानी नियमन करें, नियम बनाएं नहीं. वह काम उन्हीं पर छोड़ दें, जो संविधान में संशोधन कर सकते हैं.

जस्टिस कुलदीप सिंह और जस्टिस जे.एस.वर्मा का जोर इस बात पर था और वो भी बड़ी बेबाकी के साथ कि हमारी न्यायपालिका में दो चीजों की कमी है, एक तो पारदर्शिता और दूसरा जिम्मेवारी. इन दोनों तत्वों को जब न्यायिक प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा तो अपने आप न्यायपालिका का स्वस्थ हो जाएगी. जस्टिस कुलदीप जी का कहना तो यह भी था और दूसरे जिससे सहमत भी थे कि जजों की बैंच में अलग-अलग जजों के अलग विचार होने से भी काफी अंतर पड़ता है. एक उदाहरण भी दिया गया कि न्यायिक प्रक्रिया की अलग-अलग तरीके से व्याख्या करने के कारण एक ही तरह के मामले में दो अपराधियों को तो फांसी की सजा से छूट मिल गई जबकि एक को फांसी हो गई. जब जिम्मेवारी की बारी आई तो सारा दोष विधि की व्याख्या दोष पर मढ़ दिया गया.

कानून की व्याख्या भी एक जज से दूसरे जज तक जाते-जाते बदल जाती है जिसके साथ ही उठता है ‘अहं ‘ का प्रश्न. जिसके बारे में न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू ने एक उदाहरण भी दिया और अपने ही पेशे के बारे में खरी-खरी सुनाने से नहीं चूके.

उन्होंने बताया कि किसी प्राध्यापक ने अमुक न्यायाधीश की, अपने भाषण में आलोचना कर दी थी तो माननीय न्यायाधीश ने तुरंत पत्र लिखकर उन्हें माफी मांगने को कहा. उत्तर में उस प्राध्यापक ने अपने पत्र में उन जज महोदय की और तीखी आलोचना कर दी. जज ने अपना ब्रह्मास्त्र अपनाया और contempt of court यानी अदालत की मानहानि के तहत उस प्राध्यापक को तीन महीने की सजा दे दी.

इस ब्रह्मास्त्र का हवाला देते हुए हमारे एक मित्र जो स्वयं एक वरिष्ठ आईपीएस अफसर है, ने इस समारंभ के होने से पहले ही चाय के एक प्याले के ऊपर यह कह दिया था कि हमारी न्यायपालिका को एक ही वाक्यांश अवनत कर रहा है और वह है contempt of court, इसे अदालतों से छीन लीजिए तो अदालतें तुरंत दुरूस्त हो जाएंगी.

01.05.2011, 00.01 (GMT+05:30) पर प्रकाशित