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अमरीका की लादेन कथा

मुद्दा

 

अमरीका की लादेन कथा

श्याम बिहारी श्यामल


ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की कहानी उसकी ज़िन्दगी की तरह ही उलझी-भटकी, पेंच-ओ-ख़म और रहस्य-विरोधाभासों से भरी हुई है. पिछले साल अगस्त महीने में ही उसके बारे में पता चल जाने, पाकिस्तान के एबटाबाद में लम्बे समय से बीवी-बच्चे व कुछ सहयोगियों संग उसके टिककर रहने, अमरीकी सैनिकों द्वारा घर में चारों ओर से घेर लिये जाने के बावजूद उसे मार डालने के अलावा दूसरा कोई विकल्प बचा न होने और दस साल की बेचैन तलाश महज़ चालीस मिनट में ही समाप्त हो जाने की जो अमरीकी कहानी सामने है, यह किसी के हलक़ के नीचे सीधे-सीधे उतरने वाली नहीं.

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यह तो कत्तई सहज स्वीकार्य नहीं कि लादेन के एबटाबाद-ठिकाने का पता चलने के बाद आठ महीने तक अमरीका चुपचाप बैठा रह जाये. ग़ौरतलब यह भी कि इस दौरान लगातार अमरीकी ड्रोन पाकिस्तान में आतंकियों के संभावित अड्डे रौंदते और रोज़ाना दस-बीस की जान भी लेते रहे. लादेन के एबटाबाद में होने का पता होता तो कब का ड्रोन-ऑपरेशन ही क़ामयाब हो चुका होता. अगर लादेन का मारा जाना असंदिग्ध हो, तब भी सवाल यह कि ऐसी विरोधाभासी बातें क्यों सामने आईं? आईं या लाई गईं?

अब तक के अनुभव तो यही बताते हैं कि अमरीका स्वयं ही ऐसे प्रयास भी चला लेता रहा है, जिससे उसके लोकतंत्र-वत्सल रोंयेदार-कोमल मासूम चेहरे पर बीच-बीच में लंबे-चोंख चमकते दांत भी झलक जाया करें. ऐसा इसलिए ताकि दुनिया भर में उसकी हनक बनी रहे और यदि कोई मुल्क़ प्रतिद्वंद्वी की भूमिका में आगे आने की सोच रहा हो तो ‘लंबे चोंख चमकते दांत’ देख जहां भी हो, वहीं सहम-दुबककर घुस रहे.

इराक़ में तो यह साबित ही हो गया कि सूचना-छल, दुष्प्रचार-छद्म और भ्रम-घात ही दुनिया के इस दारोगा के अचूक हथियार हैं. कितने भी खतरनाक लड़ाकू विमान, किसी भी दैत्य हेलीकॉप्टर या कैसे भी यमदूत ड्रोनों से ज़्यादा कारग़र. कहने की आवश्यकता नहीं कि अमरीका ने दुनिया पर शासन करने की उपनिवेशकाल की सैनिक-संजाल शैली रदकर उसकी जगह यही ग़लत सूचना-शोर व भ्रमज़ाल-प्रणाली लागू कर रखी है. ऐसे में यह सवाल उठना लाज़िमी है कि ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की कहानी में विद्यमान विरोधाभास क्या प्रकारांतर से लंबे-चोंख दांत चमकाने के उसके अपने ख़ास उपक्रम का ही पर्याय तो नहीं?

ओसामा बिन लादेन के मारे जाने की खबर दे रहे न्यूज चैनलों पर सोमवार को जिस तरह दिन भर सूचनाएं लगातार हिचकोले खाती रहीं, तेज-तेज ट्रैक बदलती और उलटती-पलटती हुई, यह समाचार-जिज्ञासुओं के लिए एक अलग त्रासद और झुंझलाहट से भरा अनुभव रहा.

एबटाबाद में भवन के भीतर दबोचे गये लादेन को मारे जाने के घटनाक्रम को लेकर सूचनाओं ने कई हिचकोले खाये. पहले तो यह बात सामने आयी कि लादेन को पकड़कर सिर में सटाकर गोली मारी गयी, इसके कुछ ही देर में इसमें आहिस्ते संशोधन हुआ कि उसे आत्मसमर्पण के लिए कहा गया था. जब उसने आत्मसमर्पण नहीं किया तभी उसे मार गिराया गया.

सवाल यह कि अमरीकी सेना के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने जिस बिल्डिंग को कब्ज़े में ले लिया हो, क्या उसमें मौज़ूद कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से ज़रा-सा हिल-डुल भी सकता है ? यह किसी के लिए भी विश्वास करना कठिन है कि अमरीकी सेना ने यदि चाहा हो कि वह आत्मसमर्पण करे तो इसे नकार पाने की स्थिति में वह रह गया हो.

इसमें भी दो राय नहीं कि अमरीकी शासन की प्राथमिकता दुनिया के इस सबसे खतरनाक आतंकवादी को ज़िदा पकड़ने की ही रही हो. ऐसा इसलिए ताकि ख़ुद उसके मुंह से अलक़ायदा के वास्तविक नेटवर्क, असली मक़सद और आतंकी मंसूबों की अधिकतम सूचनाएं उगलवायी जा सकें. इसके समानान्तर निस्संदेह लादेन अमरीकी सैनिक ऑपरेशन टीम पर किसी भी तरह भारी नहीं पड़ा होगा. यदि वह ज़रा भी बीस पड़ने की स्थिति में होता तो पकड़ से ही कोसों दूर हो चुका होता.

इस तरह तो यही संकेत-निष्कर्ष मिल रहा है कि अमरीकी सैनिक निर्धारित कार्रवाई-संकल्प से विचलित होकर अपने भीतर के उमड़ते ‘नाइन एलेवन’ प्रतिशोध में उबल रहे थे. सामने लादेन को पाकर उनके भीतर कराहते-गिरते वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के टावर जीवंत हो उठे और वे आपे से बाहर हो अपना लक्ष्य भूल गये. उन्होंने अपनी ही कमान की निर्धारित सैनिक कार्रवाई पूरी करना नहीं, बल्कि ‘नाइन एलेवन’ के नरसंहार का बदला चुका लेना अधिक जरूरी समझा.

उसी तरह लादेन के शव को लेकर भी सूचना आहिस्ते-आहिस्ते बदलती रही. पहले यह खबर चली कि उसका शव अमरीकी सैनिकों के कब्जे़ में है. कुछ ही देर बाद कहा जाने लगा कि उसका शव अफगानिस्तान के मिलिट्री बेस को ले जाया गया है. जल्दी यह सूचना भी आहिस्ते से संशोधित हो गयी. संशोधित क्या, यह पूरी तरह उलट कर ही रह गयी. अब यह सूचना तैर रही थी कि लादेन को समुद्र के भीतर दफ़ना दिया गया है. ऐसा इसलिए ताकि आतंकवादी ताक़तें उसकी कब्र का ग़लत इस्तेमाल न कर सकें.

तमाम छलकते विवरणों और चमकते संकेतों से यह व्यक्त हुए बग़ैर भी न रह सका कि सद्दाम को पकड़ते समय अमरीका के पास एक सुनियोजित कार्रवाई-योजना थी, जबकि ओसामा को देख अमरीकी जवान ऐसी कोई भी योजना याद न रख सके. सद्दाम को कैसे उसकी सरजमीं पर मुकदमा चलाकर आहिस्ते-आहिस्ते लाचार और असहाय बना दिया गया, यह पूरी दुनिया ने देखा. अंतत लादी हुई अपनी मौत को नकारने में भी वह नाकाम रहा और फांसी के फंदे से झूलने से बच न सका. सद्दाम को अमरीका के खिलाफ दशकों तक दहाड़ते रहने की यह सज़ा थी. अमरीका को जख़्म देने के मामले में ओसामा बिन लादेन बेशक़ सद्दाम से उन्नीस नहीं, बीस ही था. इसलिए उसे लंबा और दुखदायी अंत न देने का अमरीका को अफसोस ही रहेगा.

लादेन के शव का जो चित्र इंटरनेट के माध्यम से फैला है, उसमें दर्ज चेहरे का निचला हिस्सा उसकी करीब दस साल पुरानी तस्वीर से हू-ब-हू मेल खा रहा है. जितने दांतों के साथ पुरानी तस्वीर में जैसा मुंह खुला दिख रहा है, बिल्कुल उतना-वैसा ही शव वाले चित्र में भी. क्या भाषण देते या बोलते हुए ओसामा ने दस साल पहले जितना मुंह खोला था, एक मई की रात एबटाबाद की बिल्डिंग में अमरीकी सेना की गोली खाकर भी जबड़े उतने ही खोल सका? जैसी छंटी मूंछों के साथ जितनी उजली लकीरों वाली दाढ़ी पुरानी तस्वीर में, बिल्कुल वही नयी में. क्या उसकी दाढ़ी का पकना दस साल से यथावत रुका हुआ रह गया था या उसने निर्धारित उजले बालों को छोड़ बाक़ी को रंगने का कोई ख़ास अभियान चला रखा था? कहना न होगा कि ऐसा कुछ भी नहीं था. मूल बात यह कि इंटरनेट पर ज़ारी उसके शव का चित्र ही अवास्तविक है.

दोनों चित्रों को देखकर विशेषज्ञों की तो यही राय मीडिया में ज़ाहिर हुई है. ग़ौर करने पर कोई भी समझ सकता है कि किसी ने फोटोशॉप पर जाकर लादेन की पुरानी तस्वीर से ही यह कारस्तानी की है. नाक के नीचे वाले हिस्से को ज़रा भी न छूते हुए, केवल ऊपरी हिस्से में बायीं कनपट्टी पर गोली लगने, इसके अलावा आंखें फूटने और ललाट समेत आसपास थोड़ा-बहुत खून लगे होने का इफेक्ट डालते हुए. निस्संदेह इसकी भी जांच होनी चाहिए कि लादेन यदि सचमुच मार गिराया गया है तो उसके शव का असली चित्र क्यों नहीं सामने आया? यह भी कि यह नक़ली चित्र किसने और किस लक्ष्य से ज़ारी किया?

अमरीकी दावे के अनुसार ही ओसामा बिन लादेन जिस तरह ऐन इस्लामाबाद से सटे एबटाबाद में हवेली लेकर बीवी-बच्चों के साथ ठाट से रहता पकड़ा और मारा गया है, यह पाकिस्तान के आतंकवाद के गढ़ होने का जिंदा सुबूत है. क्या इसके बाद भी कोई प्रमाण चाहिए? अब आतंकवाद के विरुद्ध अमरीकी संकल्प की परीक्षा की यही कसौटी होगी कि वह पाकिस्तान में बैठे दूसरे आतंकी सरगनाओं के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई करता है. अपने नाइन एलेवन का बदला चुका लेने के बाद यदि उसकी लड़ाई आगे शिथिल पड़ जाती है तो उस पर लगने वाले दोहरे मानदंड अपनाने जैसे आरोपों को ही बल मिलेगा.

04.05.2011, 17.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

uttam [] varanasi - 2011-05-06 06:30:29

 
  भाई साहब लादेन को अमेरिका ने ही पैदा किया था. रूस के खिलाफ और सभी आतंकवादी संगठनो की फन्डिंग भी अमेरिका के द्वारा ही होती है. 26/11 हमले का मास्टर माइंड हेडली भी अमेरिकी नागरिक है. इराक पर हमला सिर्फ तेल के लिए हुआ और लाखों बेगुनाहों की जान चली गई. अफगानिस्तान में भी यही हुआ. आज लीबिया में रोज अमेरिकी हमले में मासूम लोगो की जान जा रही है. मुझे लगता है आज अमेरिका से बड़ा आतंकवादी दूसरा नहीं है. 
   
 

Ramesh yadav [opinion73@gmail.com] New Delhi - 2011-05-06 04:49:22

 
  सद्दाम हुसैन से अमेरिका का वैसा वैर नहीं था जैसा लादेन से. 
   
 

savita singh [] varanasi - 2011-05-05 08:47:03

 
  ओसामा का मारा जाना कोई खास चौकाने वाली बात नहीं थी, क्योंकि उसे तो आज न कल मारा जाना ही था. जिसके पीछे अमेरीका पड़ जाये वो भला कब तक अपनी खैर मना सकता है. श्यामल जी ने जिस तरह अमेरिका की चिर-फाड़ की है वो गौर करने लायक और काबिले- तारीफ है. 
   
 

रवीन्द्र के दास [dasravindrak@gmail.com ] नई दिल्ली - 2011-05-05 02:38:46

 
  नाहक खुश होने वाले यदि समग्रता में स्थिति का आकलन करेंगे तो ... उन्हें समझ में आ जाएगा .. समरथ को नहीं दोस् गुसाईं... किसी का नाम लेना जरूरी नहीं. 
   
 

misir [misirkatya55@gmail.com] sitapur - 2011-05-05 01:18:12

 
  निःसंदेह ओसामा की मौत की कहानी संदेहों से भरी है और गढ़ी हुई लगती है ,जिसका खुलासा धीरे-धीरे होगा ! अमरीका और उसके चहेते ओसामा के बीच तकरार का कारण तो अफगानिस्तान और उसकी अफीम उत्पादन योग्य भूमि और अन्य संसाधन हैं जिस पर सोवियत समर्थित सरकार को अपदस्थ करने के बाद ओसामा ने अमरीका को किनारे करके कब्ज़ा कर लिया ! वहां ज़बरिया किसानों से अफीम पैदा कराई जाती रही ! उसकी योजना में पाकिस्तान,इराक व् अन्य कई देश भी बाद में शामिल हुए ! बहुत सी संभावनाएं हैं ,देर-सबेर सच्चाई सामने आयेगी ,फिर भी बहुत सी बातें दुनियाँ नहीं जान पायेगी ! 
   
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