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पार्टी फेल

बात निकलेगी तो...

 

पार्टी फेल

आनंद मिश्रा


ताज़ा विधानसभा चुनाव पर विश्लेषण का दौर अभी हफ्तों-महीनों तक चलेगा लेकिन एक बात चुनाव से पहले ही तय हो गई थी कि नई आर्थिक नीतियों को लागू करने के बाद गुजरात, बिहार एवं असोम, कुछ मायने में छत्तीसगढ़ को छोड़ कर हर सरकार ने अपने घुटने टेक दिये हैं. जिन राज्यों के परिणाम सामने आये हैं, उन राज्यों में सरकारें नहीं, नीतियां ध्वस्त हुई हैं. लेकिन यह देखना भी कम दिलचस्प नहीं है कि नई चुनी जाने वाली सरकार लगभग उन्हीं नीतियों पर कदम-ताल करती हैं.

जनता में असंतोष है पर विकल्पहीनता के कारण जो भी बेहतर विकल्प उपलब्ध है, उसे ही वह चुन रही है. पश्चिम बंगाल में पिछले 34 सालों से मार्क्सवादी चुने जा रहे थे क्योंकि वह केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ नजर आते थे. वर्तमान में बुद्धदेव भट्टाचार्य की नीतियों के कारण वह फर्क भी मिट गया और उनकी तमाम कमजोरियां प्रकट हो गईं.

तमिलनाडु में जनता ने वास्तव में केंद्र सरकार की सहयोगी को हराया है. भ्रष्टाचार के मामले में तो दोनों ही स्थानीय दलों का रिकार्ड खराब रहा है. असोम में कांग्रेस का दुहराना बेहतर विकल्प का अभाव है. वही बात छत्तीसगढ़ में लागू होती है. बस्तर चुनाव में बस्तर के विकास को लेकर वहां के प्राकृतिक संपदा के दोहन को प्रश्न बना कर, आदिवासियों की बस्तर के विकास में क्या भूमिका होगी, इस पर कांग्रेस और भाजपा की एक ही भाषा है. राज्य में कांग्रेस पार्टी भाजपा की बी टीम है, वहीं केंद्र में कांग्रेस की बी टीम भाजपा है.

भारतीय राजनीति में पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम भले चौंकाने वाले नहीं हों लेकिन लोकतंत्र और राजनीतिक दलों के रिश्तों को एक बार फिर से परखने के लिये बड़ा अवसर देते हैं. ताज़ा परिणाम के बाद इस बात का गंभीर खतरा है कि 34 सालों तक लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता सुख भोगने वाली वामदलों की असफलता को लोकतंत्र की असफलता न मान लिया जाये. वैसे भी यह भ्रम भारतीय मार्क्सवादियों को हमेशा से रहा है कि विकास के लिये केवल गोली और वोट ही विकल्प हो सकते हैं. यह देखना दिलचस्प होगा कि ताज़ा परिणाम के बाद मार्क्सवादियों का यह भ्रम टूटता है या और गहराता है. वैसे राजनीति को चुटकुले की तरह देखने-समझने वाले इसे अमरीका और साम्राज्वादियों की साजिश ठहरा सकते हैं.

1970 के दशक में मार्क्सवादियों के सत्ता विस्तार ने तत्कालीन नक्सलवादी आंदोलन को रोकने में एक अहम भूमिका निभाई थी. आज स्थितियां उससे कहीं अधिक भयावह हैं. देश की वर्तमान विकास की नीतियों से बढ़ती असमानता, बेगारी, एक तरफ वैभव का विशाल प्रदर्शन, ऑटोमोबाइल सेक्टर का 27 प्रतिशत की दर से बढ़ना, कृषि विकास में 2.1 प्रतिशत की दर को भी बरकरार रखने में आ रही मुश्किलें, सड़कों पर लाखों की कारें और उन्हीं सड़कों पर करोड़ों बेरोजगार नौजवानों की डोलती फौज कुल मिला कर एक ऐसी स्थितियां पैदा कर रही हैं, जहां हिंसक समाज ज्यादा जगह घेर सकता है.

ऐसी हालत में यह विचारने की बात है कि सत्ता व्यवस्था का प्रभावशाली अंग है लेकिन सत्ता सब कुछ नहीं है. आजादी के बाद से गांधी-लोहिया यही बताते रहे हैं. लेकिन सत्ता मिलने के बाद सत्तारुढ़ लोगों ने अपने को सर्वशक्तिमान मान कर शासकीय नीतियों और कानून के द्वारा समाज को बदलने की लगातार कोशिश की है. आज भी विकास का मूल आधार व्यक्ति न हो कर आर्थिक सूचकांक है और प्रगति का पैमाना आज भी उपभोग का सामर्थ्य है.

यह समझने की जरुरत है कि औपनिवेशिक नीतियों से समाजवाद नहीं आता और ना ही महज समाजवाद के नारे से समाजवाद आता है. दूसरी ओर यह बात भी कि पार्टियां समाज की अंग हैं लेकिन वही संपूर्ण समाज नहीं हैं. हमारी राजनीति का एक बड़ा संकट यही है कि हमने पार्टी अभिमूख समाज बनाने में ही लगातार अपनी ऊर्जा खपा दी जबकि होना यह था कि हम समाज अभिमूख पार्टियां बनाते. ऐसा होने पर हमारे सामने विकल्पहीनता की स्थिति नहीं होती. हमारे पास जयललिता फिर करुणानिधि, फिर करुणानिधि, फिर जयललिता जैसी आम नियति से मुक्त होने का विकल्प होता. हमारे लोकतांत्रिक होने के कहीं अधिक सार्थक परिणाम सामने आते.

14.05.2011, 00.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

श्यामबिहारी श्यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] वाराणसी ( उप्र), भारत - 2011-05-15 00:32:29

 
  संक्षिप्त किंतु सहमतिजन्य नजरिया। बधाई! 
   
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