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महिलाओं के जश्न का समय?

बहस
 

महिलाओं के जश्न का समय?

रेणु अगाल

 

तेरह मई को भारतीय राजनीति ने भारी उलट फेर देखा. सोशल नेटवर्किंग साइट्स आजकल मध्यवर्गीय युवाओं की सोच समझने का अच्छा माध्यम हो गया है. तो इन साइट्स पर लाल सलाम के सलामत न होने और बंगाल के हरे चोगे पहनने का जश्न बहुत साफ पढ़ने में आया.

women-politics

फिर बात नारी शक्ति की भारतीय राजनीति में बढ़ती पैठ की भी चर्चा गर्म थी. एक मित्र ने तो पड़ोसी देश से बधाई संदेश दे दिया. कुछ इस अंदाज़ में कि सोनिया, शीला और मायावती के बाद अब ममता और जयललिता- भारतीय राजनीति पर 33 प्रतिशत कब्ज़ा हो ही गया समझो क्योंकि जिन राज्यों पर इन महिलाओं का शासन है और होने जा रहा है, वो देश का एक तिहाई हिस्सा तो है ही.

फिर महामहिम प्रतिभा पाटिल और मीरा कुमार को भी भुलाना ठीक नहीं. लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को भूलना भी ठीक नहीं. यानि बिन आरक्षण महिलाओं ने नई उंचाईयां छू ली है, इस पर तो जश्न मनाया जाना चाहिए.

बात में दम तो है पर मुझे अभी भी कुछ बातें अखर रही हैं. सक्रिय राजनीति में जगह बनाने वाली इन महिलाओं की ओर देखिए..एक विचार मन में आता है कि राजनीति में पहुंची महिलाओं की सफलता के पीछे क्या इनका मुख्यधारा के नेताओं जैसा व्यवहार एक कारण है.

ये तेज़ तर्रार है, पार्टी में इनकी तूती बोलती है, इनके आगे पार्टी में कोई नहीं बढ़ सकता या इनकी होड़ इनकी पार्टी में कोई नहीं कर सकता. अगर यूं कहे कि ये सभी को जूते की नोंक पर रखती हैं, तो ग़लत न होगा. किसी दबंग से कम नहीं होती इनकी कार्यशैली या बॉडी लैंगुएज. ऐसा कोई ऐब नहीं जो बाकी राजनेताओं की तरह इन्हें न छू पाया हो.

कुछ ने भ्रष्टाचार और बाज़ूबल का इस्तेमाल दिखा दिया है, कुछ जैसे ममता दीदी अभी राज्य में सत्ता का सुख पहली बार भोगेंगी और विपक्षी वामपंथियों को काबू में रखने के लिए क्या राह अपनाएंगी, इस पर सबकी नज़र है. मायावती की माया का तो अनुभव हो ही गया है और हाल में भट्टा परसौल ने बची खुची कसर भी पूरी कर दी. शीला दीक्षित पर भी भ्रष्टाचार की आंच आई है, जयललिता तो कई मामलों में अदालतों का चक्कर लगाती रही हैं.

यानि नारी शक्ति भी तभी भारतीय राजनीति में चल पाती है जब वो दुर्गा रुपी इंदिरा हो या फिर सॉफ्ट पावर से लैस सोनिया हो जिनके इशारे पर सरकार चलती है. उसकी सफलता का पैमाना भी वही ऐब है, जो भारतीय राजनीति का कैंसर बन गए हैं.

पर स्वयं ये महिलाएं बिना पुरुषों की राह पर चले क्या अपना राजनीतिक सफ़र सफलतापूर्वक चला सकती हैं? अगर ऐसा होता है तो शायद आम महिलाओं के लिए ये वाकई गर्व की बात होगी तब तक ये खुशी अधुरी-अधुरी सी ही लगेगी. महिलाओं के राजनीति में इस बढ़ते रोल पर युवा वर्ग सोशल नेटवर्क साइट्स पर इन नेताओं के आचरण पर सवाल उठाते रहेंगे और उनके मन में चिंता भी बनी रहेगी कि महिलाओं के राजनीति में बढ़ते कदम क्या वाकई देश की राजनीति की लय ताल बदलेंगे?

15.05.2011, 08.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Anil kumar sagar [] ghaziabad - 2011-05-21 07:34:38

 
  जब तक राजनीति से बाजुबल और भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं होगा तब तक विकास नहीं हो सकता चाहे सत्ता की चाबी महिलाओ के हाथ हो या पुरुषो के. 
   
 

Ajay kumar singh [ajay.k.singh@hotmail.com] Yorkshire - 2011-05-17 09:16:42

 
  देखने लायक बात तो ये होगी की ये जो पुरुष प्रधान समाज है, वह किस हद तक इन महिलाओं को बर्दाश्त करेगा. भाजपा जैसी पार्टियों में तो महिला नेत्रियां हमेशा दूसरे दर्जे की ही रही हैं. 
   
 

Sunita jain [] Noida - 2011-05-17 09:13:56

 
  नहीं-नहीं रेणु जी. भारतीय महिलायें अभी 33 प्रतिशत की हालत में नहीं हैं. राजनीति में महिलाओं को हिस्सा देने के मामले में यह 98वें नंबर पर है. भारत तो पाकिस्तान और नेपाल से पीछे है. भारतीय संसद में करीब 800 सीटें हैं. इनमें कायदे से 400 महिलाएं होतीं तो राजनीति में उनकी बराबर की साझीदारी होती. थोड़ी कम भी होतीं तो साझीदारी समझी जा सकती है. लेकिन उनकी संख्या 100 से भी कम है. कुल 10 प्रतिशत महिलाएं भी संसद में नहीं पहुंच पाती हैं.
अंतर संसदीय यूनियन के आंकड़ो के अनुसार बता रहे हैं कि राजनीति में महिलाओं को अधिकार देने के मामले में भारत विश्व का 98वें नंबर पर आता है. भारत में लोकसभा की 545 सीटों में 59 महिलाएं हैं, राज्यसभा की 242 सीटों में सिर्फ 25 महिलाएं. महिलाओं को अधिकार देने के मामले भारत जॉर्डन और बेनिन जैसे देशों के साथ खड़ा है. पाकिस्तान इससे 47 स्थान ऊपर है, नेपाल 80 स्थान. पाकिस्तान की संसद के निचले सदन में 22.2 प्रतिशत महिलाएं हैं, जबकि ऊपरी सदन में 17 फीसदी. वह दुनिया में 51वें नंबर पर है, जबकि नेपाल इस रैंकिंग में 18वें नंबर पर खड़ा है. बांग्लादेश और चीन में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व संसद में भारत की तुलना से कहीं ज्यादा है. चीन 55वें नंबर पर है, बांग्लादेश 65वें नंबर पर है. भारत से पीछे दक्षिण एशिया के सिर्फ श्रीलंका और म्यांमार जैसे देश हैं, जो इस सूची में 100 से नीचे के पायदान पर हैं.
और रेणु जी, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पिछड़े देश हमसे इस मामले में आगे हैं. अफ्रीकी देश रवांडा इस सूची में पहले नंबर पर है, जहां संसद के निचले सदन में 56 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी है और ऊपरी सदन में 34 फीसदी की. स्वीडन 45 प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर और दक्षिण अफ्रीका तीसरे स्थान पर है. नंबर चार पर क्यूबा है. इसके बाद यूरोपीय देश आइसलैंड, नीदरलैंड्स, फिनलैंड और नॉर्वे आते हैं.
 
   
 

Sanjeev Tiwari [saneev.tiwari@yahoo.co.in] Kanpur - 2011-05-17 09:13:35

 
  पुऱुष समाज इसको बर्दाश्त कर पाएगा, इसमें मुझे शक है. याद करें, पिछले साल गोवा के मुख्यमंत्री दिगंबर कामत का बयान, जिसमें इस मुख्यमंत्री ने कहा था- अगर महिलाएं राजनीति शुरू करती हैं तो समाज पर इसका नकारात्मक असर पड़ेगा. अब अगर मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे लोग इस तरह सोचते हों, खास तौर पर गोवा जैसे खुले समाज का मुख्यमंत्री तो देश का क्या होगा...  
   
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