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बहानों का बाम

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बहानों का बाम

एम जे अकबर

 

चुनावी लोकतंत्र के बेहद विस्मयकारी पहलुओं में से एक है झूठी दिलासा देने की सम्मोहक शक्ति. इसका विस्तार मूर्खतापूर्ण भाव-भंगिमाओं से लेकर समझ में न आने वाली भ्रांति तक है. लेकिन इसकी निरर्थकता को इस सीधे-साफ सवाल के जवाब से बेहतर कोई और व्यक्त नहीं कर सकता-ऐसे सच को नकारकर कोई राजनेता आखिर क्या पाने की उम्मीद करता है, जिसके सबूत बाकी सभी को नजर आ रहे हैं और जिस सच की 48 से 72 घंटे के भीतर आधिकारिक पुष्टि हो ही जाएगी? कुछ भी नहीं. शायद भ्रम का यह घेरा अभिशप्त के लिए आखिरी उम्मीद होता है, क्योंकि वे किसी चमत्कार की आस में सजा के दिन के आगे बढ़ जाने की बड़ी बेताबी से प्रतीक्षा करते रहते हैं. लेकिन ईश्वर अपने चमत्कारों को राजनीतिक पार्टियों के लिए बर्बाद नहीं करता.

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मतदान समाप्ति और मतगणना के बीच के छोटे से अंतराल में बंगाल सीपीआई (एम) की राज्य समिति पार्टी मुख्यालय में इकट्ठा हुई और खुद को फिर से आश्वस्त किया कि वे कम से कम 150 या फिर बहुमत के लायक सीटें जीत रहे हैं. फिर वे इस दावे को लेकर जनता के बीच गए, जहां उनकी भाषा अक्खड़ और डराने-धमकाने वाली थी, मानो उन्होंने अपने प्रमुख चरित्रगत दोषों को आखिरी आक्रमण के तौर पर सामने कर दिया हो.

आमतौर पर मृदुभाषी रहने वाले राज्य प्रमुख बिमान बोस ने वादा किया कि नतीजे आने के बाद मीडिया को उनकी पार्टी पर उछाले गए कीचड़ को जीभ से चाटकर साफ करना होगा. अन्य नेता अपनी घृणा की केंद्र, ममता बनर्जी पर विषवमन करने में जुट गए. वे असभ्य, लैंगिकवादी और नीरस थे. लेकिन इस तुच्छ रोष ने इस बात का खुलासा करने में अहम भूमिका निभाई कि आखिर क्यों सीपीएम ने 34 साल बाद कोलकाता में सत्ता गंवा दी.

पार्टी इतनी ज्यादा अंधी और संवेदनहीन हो चुकी थी कि उसने न तो देखा, न ही एहसास किया कि उसके पैरों तले जमीन खिसक चुकी है. हार की बजाय हार में अपना व्यवहार सीपीएम को ज्यादा महंगा पड़ सकता है, बशर्ते वह अपने व्यवहार में खुद ही नाटकीय सुधार न कर ले.

झूठी सहजता की कांग्रेसी कवायद कहीं ज्यादा परिष्कृत और असरदार है. बंगाल सीपीएम के उलट, कांग्रेस सीख चुकी है कि बुरी खबर को कैसे लिया जाता है. यह सच को सात परदों की ओट में छिपाती है और बड़ी आसानी से, अंत में आप परदे के रेशमी कपड़े की तारीफ करने लगते हैं. तथ्य बेहद सर्द हैं.

कांग्रेस को एक राज्य, असम में एक प्रभावशाली विजय मिली, जिसकी वह हकदार थी. यह तरुण गोगोई के शानदार नेतृत्व के कारण हुआ, लेकिन केरल में वह इस प्रदर्शन से काफी दूर रही, जबकि तमिलनाडु में तो उजड़ ही गई. वीएस अच्युतानंदन के नेतृत्व वाले केरल वाम मोर्चे ने यूडीएफ गठबंधन में कांग्रेस के लक्ष्य को अत्यंत कम करके तूफान को करीब-करीब मोड़ ही दिया. कांग्रेस ने अपनी 82 सीटों में से सिर्फ 38 जीतीं, और अगर राज्य तक सीमित मुस्लिम लीग ने अपने द्वारा लड़ी गई 24 सीटों में से 20 सीटें नहीं जीती होतीं, तो वाम मोर्चा तिरुअनंतपुरम में सरकार बना चुका होता.

यह तो मस्जिद और चर्च का मेल था, जिसने संतुलन को कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ के पक्ष में जरा सा घुमा दिया. संभवत: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मंत्रिपरिषद के अगले हेर-फेर में लीग नेता ई. अहमद को कैबिनेट में पदोन्नत करने के जरिए धन्यवाद कहें.

तमिलनाडु में कांग्रेस 63 सीटों पर लड़ी और उसने सिर्फ पांच जीतीं. इसका सीधा और सरल स्पष्टीकरण डीएमके के साथ जुड़ाव को दोषी ठहराएगा. लेकिन डीएमके के भ्रष्टाचार से खुद को अलग दिखाने के लिए कांग्रेस ने तमाम जतन किए, यहां तक कि ए. राजा को जेल भी भेज दिया. लेकिन मतदाता, चुनावी विश्लेषकों या पत्रकारों की तुलना में रेशमी परदे के पार भी ज्यादा साफ देख सकता है.

इन दोनों वर्गों का बड़बोला निराशावाद ऐसा था, मानो उन्होंने यह हवा बनाई कि जातिगत समीकरणों और धनबल के कारण डीएमके-कांग्रेस गठबंधन जीत सकता है. दूसरे शब्दों में, इन लोगों ने कुतर्क दिया कि तमिल वोटर भ्रष्ट हो चुका है, और इसीलिए डीएमके के भ्रष्टाचार की अनदेखी कर देगा. यह पक्षपाती दृष्टिकोण तमिल वोटर का अपमान था, जिसने अपने अपमान का बदला डीएमके-कांग्रेस गठबंधन की धज्जियां उड़ाकर चुकाया.

बंगाल में कांग्रेस ममता बनर्जी के पुछल्ले के तौर पर 42 सीटें पा सकी, इसलिए कोई भी बधाई अनुपयुक्त होगी. असम को छोड़कर सारे देश में कांग्रेस के वोट घटे हैं. मतदाता राहुल गांधी द्वारा निजी तौर पर चुने गए ‘युवा’ उम्मीदवारों, जो आमतौर पर लुगदी जैसे थे, की सूची से व्यापक स्तर पर अप्रभावित रहा. उनके लिए अच्युतानंदन का उपेक्षापूर्ण ठप्पा ‘अमूल बेबी’ उनसे तब तक चिपका रहेगा, जब तक कि वे अपने बड़े होने के सबूत न पेश कर दें. और आंध्रप्रदेश में जगन रेड्डी का विजयोल्लास सबूत है कि पार्टी को कहीं मुंह छिपाने की भी जगह नहीं है.

कांग्रेस के लिए सचमुच राहत की केवल एक ही बात है कि उसकी मुख्य विरोधी बीजेपी तो झूठी सहजता की तसल्ली से भी इंकार कर रही है. असम में उसका कीमा बन गया और वह बंगाल या दक्षिण में एक भी गंभीर सीट न ले सकी. राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा छोड़ी गई जगह को भरने के लिए धार्मिक और उप-क्षेत्रीय नई शक्तियां उभर रही हैं. 1990 के बाद के वर्षों में जो प्रक्रिया तेज हुई थी, उसे नई शक्ति मिली है.

बड़े खिलाड़ी उबर जाएंगे, बशर्ते वे इस बुनियादी तथ्य को स्वीकार कर लें: बहाने शीतलता देने वाले बाम हैं, कोई दवा नहीं.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
15.05.2011, 00.57 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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