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...कि बरगद उजड़ गया

बात निकलेगी तो...

 

...कि बरगद उजड़ गया

श्यामबिहारी श्यामल


पश्चिम बंगाल का वाम बरगद धराशायी अब हुआ है, सूख बहुत पहले चुका था. उसका वृहद् व्यास-परिधि वाला परिपुष्ट तना खोखला रह गया था. फैली हुई डालियां दम तोड़ते पत्तों की अंतिम खेप ढो रही थीं. दरख्त की भूख-प्यास से टूटतीं नसें न जाने कब से ऐंठ-टटा रही थीं. उन्हें प्राण-वायु और जीवन-रस मिलना कब के बंद हो चुके थे. जीवनी-शक्ति यानी वे वाम-मूल्य, जिन पर जनता जान छिड़कती थी. तिस पर तुर्रा यह कि महीन और पतली-सी ही किंतु एक छरछराती धार उसकी जड़ पर लगातार अपने भाले भोंकने लगी. ऐसे में उखड़ने और चारों खाने चित होने से उसे आखिर बचा ही कौन पाता.

buddhadeb-bhattacharjee

कहना पड़ेगा कि उसकी यह गति वस्तुतः उन्हीं ‘अपनों’ ने निर्धारित कर दी थी, जो वर्षों पहले कर्णधार बनाकर लाये गये किंतु जुट गये बंटाढार करने में. वाम-मूल्य बिना किसी घोषणा या दृष्टिकोण- प्रकटीकरण के धड़ाधड़ बदले जाने लगे. अब यह गहरे विश्लेषण या समुचित गहन जांच का विषय है कि ऐसा गोर्वाच्योवी घात उन्होंने क्यों किया. अज्ञानतावश अनजाने में अथवा किसी प्रतिशोधी-प्रतिघाती संकल्प के तहत. वे मट्ठा डालने की कोई चुटिया-खोल सौगन्ध पूरी करने तो नहीं आये थे ?

इसमें शक नहीं कि उनके राजनीतिक चरित्र-व्यवहार में आये अचानक बदलाव सबके लिए चौंकाने वाले रहे. यही जनता के लिए पहले पहेली बने और बाद में उनसे मोहभंग का कारण भी. जो बंगाल आर्थिक नीति के सवाल पर एक ही पाले में खड़ी कांग्रेस और भाजपा को ललकारता था और विकास के पश्चिम वर्चस्ववादी माडल को ठेंगा दिखाता था, वह कुछ साल से अपनी यह आमूलचूल पहचान बदल रहा था.

दिल्ली से रह-रहकर झोंकी जाने वाली महंगाई और केंद्रीय मूल्यवृद्धि के खिलाफ हर बार हुंकार भरने वाले बंगाल का विरोध-स्वर बदलने लगा था. बदलने क्या, दबने लगा था. जनता बोलती भले कम हो, इतिहास साक्षी है उसकी समझ पातालभेदी ही जाहिर होती आयी है. लिहाजा यह अहसास आम होने लगा कि वाम ब्रिगेड अब सर्कस का शेर रह गया है. कांग्रेस-भाजपा का महज अखबारी या कागजी विरोधी, नीतिगत विपक्ष या कड़ी चुनौती तो कदापि नहीं. जनचेतना में यह बात समा जाने के बाद जो होना स्वाभाविक था, अंततः वही इस चुनाव में हुआ है. वाम का दक्षिण झुकाव ही बंगाल में 34 साल के लाल दुर्ग के पतन का कारण है. दुष्यंत की पंक्तियां यहां अजीब सटीकता के साथ अक्षर-अक्षर मौजूं महसूस हो रही हैं- ‘‘...बायीं से उड़कर दायीं दिशा को गरुड़ गया, कैसा हुआ सगुन कि बरगद उजड़ गया ’’

सादगी, जनोन्मुखी राजनीति और आम आदमी से जुड़े सवाल को लेकर केंद्र से हमेशा दो-दो हाथ करने को उद्धत तेवरदार सजगता. यही तो पहचान थी वाम नेताओं की. ताकत भी. सत्ताधारी होने के बावजूद सहज-सरल. दूसरे प्रदेशों यानी गैर वाम शासित राज्यों की क्या हालत रही है या आज भी है, यह किसी से छुपी नहीं. कैबिनेट मंत्री या राज्यमंत्री ही नहीं, निगम-कार्पोरेशन के अध्यक्ष-सचिव तक बत्ती भुकभुकाती गाड़ी में सजे वाहनों का हुजूम लिये निकलते हैं तो संबंधित सड़क की पूरी यातायात-व्यवस्था के लिए यह दुःसह्य सजा बन जाता है.

इसके बरक्स पश्चिम बंगाल सरकार के मंत्री किसी भी साधारण व्यक्ति की तरह यहां-वहां आते-जाते दिख जाते थे. सड़कों पर आम आवागमन को कंपा देने वाला सायरन बजाता न वाहनों का लंबा-चौड़ा काफिला, न चेहराबंद हथियारबंद कमांडो-कवचों की सुरक्षा-बारात.

सादगी-सरलता और जनोन्मुखता वाली यह पहचान पिछले कुछ वर्षों में कैसे उलट कर रह गयी, इसे नंदीग्राम-सिंगूर मामलों में सरकार की उभरी मुकम्मल छवि से पूरे देश ने आकलित किया. अभी-अभी संपन्न हुए इसी चुनाव में तो हद हो गयी. बताते हैं, कुछ प्रमुख वाम नेताओं ने प्रचार के दौरान अशिष्टता और सत्ता-शक्ति के घमंड के बेहद शर्मनाक नमूने भी पेश किये. ऐसे सत्ताधारी नेताओं ने ममता या उनके पक्ष के लोगों के लिए कैसी भद्दी भाषा और कैसे-कैसे घिनौने रूपकों का इस्तेमाल किया है, इससे संबंधित विवरणों पर नजर डालना भी अत्यंत दुखदायी है.

बताते हैं, एक वाम नेता ने तो ममता-पक्ष का उल्लेख करते हुए लोगों के सामने अपनी धोती तक उठा दी और यहां तक कह दिया कि फलां का तो इससे भी बड़ा है. समझा जा सकता है कि पतन की अंतिम हद तक जा पहुंचे इस ‘वाम’ का कैसा वैचारिक ‘काम तमाम’ हो चुका था. ऐसों का पतन न होता तो और क्या होता.

अब सवाल यह कि सत्ता की चाभी पा जाने वाली ममता बनर्जी से क्या-क्या उम्मीद पाली जाये और कैसे. जाने-अनजाने अभी अचानक दिमाग में समाजवादी सिद्धांत के अनोखे लड़ाके राजनारायण की याद आ रही है. एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसकी राजनीतिक शख्सियत यह कि उसने कांग्रेस के गढ़ यानी ऐन नेहरू-भूमि पर उतरकर इंदिरा गांधी जैसी हैसियत को चुनावी शिकस्त दी और औकात बतायी थी. ऐसा शख्स, जिसकी पहचान ही थे जुझारुपन और प्रतिरोध. किंतु अजीब यह कि यही उसकी अंतिम सीमा भी बन गये.

राजनारायण की फितरत का तकाजा यह कि संसद में जब वह सत्ताधारी पक्ष में मंत्री बनकर बैठे तब भी स्वर नहीं बदला. बात-बात में अपनी सरकार पर ही तमक जाते. उठकर पूर्ववत गरजने-मचलने वाली बेचैनी जाग उठती. कहते हैं, उन्होंने यह बात कुबूल भी कर ली थी कि वह सत्ता नहीं, मूलतः विपक्ष चरित्र के व्यक्ति हैं और ऐसा ही रहेंगे.

केंद्र में भाजपा से लेकर कांग्रेस तक की कई सरकारों में ममता बनर्जी का जो मूल स्वभाव सामने आया है, वह बंगाल की उनकी आरंभिक और मूल ‘अग्निकन्या’ छवि से अलग नहीं है. काम बनाने के नहीं, अड़ंगे लगाने के मौके तलाशती रहने वाली बेचैन शख्सियत. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में तो वह और जयललिता ‘मानव बम’ की जोड़ी के नाम से ही जानी जाती थीं. उनकी क्षण-क्षण रुष्ट-तुष्ट होने वाली प्रवृति उन्हें एक आम भारतीय नारी की छवि तो देती है, किंतु साथ ही आहिस्ते उनके वैचारिक शून्य का संकेत भी दे डालती है. एकदम शून्य यदि न भी, तो शून्यता के आसपास अवश्य ही. केंद्र में अवसरानुसार भाजपा और कांग्रेस, दोनों की ‘कुशल’ सहयोगी बन अपनी राजनीतिक-सैद्धांतिक शून्यता तो उन्होंने बेशक पहले ही साबित कर रखी है. अब यह देखना है कि बंगाल की कमान हाथ में ले लेने के बाद वह खुद को कितना बदल पाती हैं.

जहां तक 34 साल के अनुभवों की बात है, पश्चिम बंगाल के जिस्म पर नक्सलवाद और इससे भी पहले साम्प्रदायिक हिंसा के ढेरों खूनी निशान बेशक थे किंतु लंबे वामपंथी शासन के दौरान इससे मुक्ति का अहसास सबसे बड़ी उपलब्धि रहा. अब चुनौती यह होगी कि ममता इसे कैसे कायम रख पाती हैं. वाम सत्ता ने पश्चिम बंगाल में भूमि सुधार को जिस सफलता से लागू किया, शायद ही इसकी कोई दूसरी मिसाल हो.

चावल और सब्जी से लेकर मछली-उत्पादन तक के मामले में वह अव्वल रहा किंतु औद्योगिक तौर पर हमेशा लिथड़ता रहा. माकपा के बिगड़ैलों के हाथों उद्योग उच्छेदित होते रहे. धंधे धधकाये जाते रहे. बीते कुछ दशक के दौरान इतने उद्योग-धंधे रौंदे गये कि उनका सहज ही हिसाब लगाना मुश्किल है.

आलम यह कि आसनसोल, बराकर या वर्दमान के अनेक ऐसे इलाके हैं जिन्हें अब बंद उद्योगों की कब्रगाह के रूप में पुकारा जाता है. वामपंथी शासन के दौरान वहां माकपा कार्यकर्ताओं की गुंडागर्दी के चलते कितने कल-कारखाने बंद हुए हैं, यदि इनका आंकड़ा और जमीनी विवरण जमा किया जाये तो वामपंथी शासन के मध्यम और निचले तंत्र या उनके राजनीतिक चरित्र को समझने का एक नया आयाम खुलेगा.

आंकड़े बताते हैं कि 1975-77 में यानी वाम-सत्ता के पहले पश्चिम बंगाल मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में 19 प्रतिशत की उपलब्धि के साथ जहां गुजरात के बराबर में था, वहीं आज वह इतना पीछे खिसक चुका है कि यह अंक 7.4 फीसदी ही रह गया है.

इसके बरक्स गुजरात फिलहाल 30 प्रतिशत के उठान पर है. सूत्र रूप में वामपंथी सत्ता-शासन के लंबे दौर की एक महत्वपूर्ण झांकी यह भी है. बंगाल को आगे बढ़ाने नहीं, बल्कि पीछे खिसका देने वाले वामपंथी शासन पर फिर दुष्यंत की पंक्तियां सटीक प्रक्षेपित हो रही हैं- ‘‘ कैसी मशालें लेके चले तीरगी में आप, जो रोशनी भी थी सलामत नहीं रही.’’

16.05.2011, 17.26 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

जितेन्द्र नारायण [jitendralic@hotmail.com] Samastipur(Bihar) - 2011-07-16 04:47:57

 
  कमाल का लेख है.वाम नेताओं और ममता बनर्जी,दोनों के बारे में बिलकुल सटीक विश्लेषण किया है.लेखन शैली में नवीनता और सटीक नए शब्दों के प्रयोग से एक नीरस विषय सरस बन गया है. 
   
 

anwar suhail [anwarsuhail_09@yahoo.co.in] bijuri - 2011-05-27 15:19:48

 
  वाम पंथ कोई जादू की पुडिया नहीं है, हिन्दुस्तान में प्रजातांत्रिक ढाँचे में कहन का वामपंथ, कैसा वामपंथ
मैं अपनी कोयला इन्दुस्ट्री में वम्पन्थिओन को बिकते और समझौता करते और ऐश करते देखता तो हूँ ....जो हुआ ठीक हुआ...अब बेटा बैठ का किर्तन करो...ऐतिहासिक गलतियों की जुगाली करो.
 
   
 

सूरज [kathaakar@gmail.com] मुंबई - 2011-05-23 04:18:00

 
  श्‍यामल जी
बहुत अच्‍छे से स्थितियों का विश्‍लेषण किया है आपने और पराभव के कारण भी गिनाये हैं। हमारे देश की राजनीति का सबसे बड़ा संकट विकल्‍पहीनता है। बारी बारी से सत्‍ताधारी बदलने के अलावा हमारे पास कोई चाइस नहीं। बंगाल में तो खैर पहली बार हुआ है लेकिन आप तमिलनाडु में देखें। कब से यही खेल चल रहा है कि जो भूतपूर्व था,वही भावी होगा। बारी बारी से। ऐसे में दुश्‍यंत कुमार याद आते हैं
अपनी सारी गज़लों के साथ.. सूरज
 
   
 

अभिनव अरुण [arunkrpnd@gmail.com] वाराणसी - 2011-05-20 08:56:46

 
  श्यामल जी सार्थक और सामयिक लेख | उम्मीद की जानी चाहिये कि पश्चिम बंगाल में हुआ ये परिवर्तन जनता के लिये उपयोगी और सकारात्मक होगा |सामयिक टिप्पणी के लिये साधुवाद आपको और इस प्रकाशक को ! 
   
 

Tripurari Kumar Sharma [] New Delhi - 2011-05-20 08:39:56

 
  बरगद उजड़ गया... 
   
 

अंशुमाली रस्तोगी [anshum.mali@gmail.com] बरेली - 2011-05-20 04:46:15

 
  अपने इस हश्र से वामपंथी कुछ सबक लेंगे, अब यह देखना है..अच्छा लेख। 
   
 

Ramanbhai Rathod [] Baroda - 2011-05-19 08:13:21

 
  वाम ने 34 साल सरकार चलाई. वह लोगों के समर्थन के कारण ही संभव हो सका था. बुद्ददेव के आने के बाद तो उनका पतन शुरू हो गया.शायद उनका अप्रोच लोगो को जंचा नहीं होगा. दूसरा परमाणु संधि के दौरान उनका अप्रोच कोई समाज नहीं पाया. यूपीए को समर्थन देने के बदले में उन्होंने पश्चिम बंगाल के विकास के लिए कोई फायदा नहीं उठाया जबकि दुसरे राज्यों ने जमकर फायदा उठाया. ममता मुझे लगता है कि विकास के लिये कुछ ना कर पायेंगी क्योंकि सिंगुर में टाटा के साथ का उनका अप्रोच दूसरों को आने के पहले सोचने को मजबूर करेगा. Only Honesty is not a major portion of efficient administration.It is good to note that Mamta is very selective for the team.At this stage we should wish her all the best for the betterment of West Bengal.  
   
 

vivek ranjan shrivastava [vivek1959@yahoo.co.in] jabalpur - 2011-05-19 02:42:08

 
  वामपंथ का पराभव समूचे विश्व में हो रहा है , चीन ने अवश्य परिवर्तनवादी अर्थव्यवस्था से किंचित समांजस्य बनाये रखा है. बंगाल में जब जड़ता के चलते ज्योतिबसू ने प्रधानमंत्री बनना अस्वीकार कर दिया था शायद तभी इस परिवर्तन की नींव का पहला पत्थर रख दिया गया था. आज के परिवर्तनशील युग में नवाचार को स्वीकार करते जाना जरूरी है, देखें अब क्रांति का पुरोधा बंगाल समय की स्याही से क्या नया इतिहास रचता है ... 
   
 

vijay singh [vijaysikriwal@gmail.com] delhi - 2011-05-18 14:40:37

 
  लेख सारगर्भित और जानकारी-प्रदत है परन्तु ममता बनर्जी की संभावनाओ पर और विचार किया जाता तो अच्छा रहता| 
   
 

rajesh [] Delhi - 2011-05-18 05:51:15

 
  प्रस्तुति सराहनीय हैं. मैं तो लाल झंडे को ही वामपंथ के नेस्तनाबूद होने का कारण मानता हूँ. समय और काल के अनुसार विचारधारा में आवश्यक परिवर्तन लाकर ही वर्तमान के साथ जुड़ा रहा जा सकता हैं. वर्तमान की अनदेखी करना, जनभावना से अधिक सिर्फ विचारधारा से ही बंधे रहना हासिये से बाहर धकेल देता हैं. 
   
 

anil pusadkar [anil.pusadkar@gmail.com] raipur - 2011-05-18 05:20:39

 
  इसमें कोई शक नहीं कि बरगद उजड़ गया है.लेकिन लालकिले पर हरा पताका फहराने वाली दीदी को भी दादा लोग उनके उसी तेवर के कारण पसंद करते थे, जो वामपंथियों के थे. विरोध का स्वर जब दबने लगे तो ये हालत तो होनी ही थी. अब देखना ये भी है कि राजनैतिक मजबूरियों और समझौतों के दबाव के बीच क्या दीदी अपने तेवर दिखा पायेंगी. अगर स्वर फिर बदला तो क्या दादा लोग फिर हरे को लाल में नहीं बदल देंगे? अभी कुछ भी कहना बहुत ज़ल्दबाज़ी होगा मगर आपने पोस्टमार्टम अच्छा किया है. 
   
 

jai kumar jha [honestyprojectdemocracy@gmail.com] delhi - 2011-05-17 05:20:28

 
  देश व समाज को चूसकर व सरकारी खजाने को लूटकर पूंजीवादियों द्वारा इंसानी संवेदना व सामाजिक सरोकार को ख़त्म करने का अंतिम चरण चल रहा है इससे लड़ने के लिए कट्टर त्यागी,परोपकारी व सामाजिक व्यक्ति को सत्ता के उच्च शिखर पर बैठना होगा...ना की बुद्धदेव भट्टाचार्य या ममता जैसे उद्योगपतियों व सत्ता के दलाल टाइप लोगों को...ममता का चेहरा चुनाव जीतते ही सामने आ गया जब उसने पेट्रोल की कीमतों के बढ़ने पर एक शब्द नहीं कहे....ममता जैसे लोग बहुत खतरनाक हैं भारतीय समाज के लिए ये इस देश के नागरिकों को समझना होगा... 
   
 

misir [misirkatya55@gmail.com] sitapur - 2011-05-17 05:18:31

 
  श्यामल जी , सबसे पहले मैं आपके इस सारगर्भित ,तथ्यपरक और सुस्पष्ट लेख की प्रसंशा करता हूँ ,फिर कुछ अन्य तथ्यों की और आपका ध्यान भी खींचना चाहता हूँ !समाज में एक प्रवत्ति काम करती आई है - जो वस्तु,व्यक्ति या विचार जनता का भरोसा जीत कर लोकप्रिय हो जाता है उसके साथ जुड़े भले लोगों को धीरे-धीरे कुटिल कपटी लोग विस्थापित करके जम जाते हैं और अपना धंधा जमा लेते है ! इसे हर क्षेत्र यथा :धर्म,राजनीतिक आन्दोलन, खेल,सिनेमा ,शिक्षा आदि-आदि में साफ़ देखा जा सकता है ! हर वह कार्य जो किसी सदोद्देश्य के लिए आरम्भ किया जाता है अंत तक जनता को धोखा देकर लूटने का उपस्कर बना दिया जाता है ! ऐसा कुछ बंगाल के परिप्रेक्ष्य में भी अवश्य हुआ है ! दूसरी बात यह कि वामपंथी मोर्चे के सदस्यों के बीच की पद और प्रतिष्ठा की प्रतिद्वंदिता ने भी एक-दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोडी होगी ! तीसरी बात कि वामपंथियों के अतिरिक्त समूचे विपक्ष ने बंगाल की हवा में लगातार विष घोला ,जिसमें केंद्र में बैठे सत्ताधारियों ने अपनी पूरी शक्ति से ,साम,दाम,दंड,और भेद के कूटनैतिक प्रयास भी सम्मिलित हैं ! कांग्रेस ने ममता बनर्जी को तो एक रणनीति के तहत कांग्रेस से अलग करके नयी पार्टी बनाकर वामपंथी सरकार को उखाड़ने की नियत से पीछे ही लगा दिया ! फिर भी इससे अपनी कमजोरी को हलके में नहीं लिया जा सकता ,हमें इन सब बातों से सजग रहना था और हम नहीं रह पाए ! यहाँ इन बातों का उल्लेख इस लिये किया कि संभवतः इनसे हमें आत्म-मंथन में कुछ सहायता मिले ! धन्यवाद ! 
   
 

navneet pandey [poet_india@yahoo.co.in] bikaner - 2011-05-17 04:50:36

 
  बहुत ही सही और सटीक विश्लेषण और मूल्यांकन किया है आपने. एक ही बात मेरी समझ से बाहर है कि सिंगूर से टाटा को खदेड़कर कर बाहर करनेवाली ममता बंगाल की जनता को किस औद्योगिक विकास के सपने दिखा रही है? 
   
 

satyendra [] India - 2011-05-17 04:17:05

 
  पश्चिम बंगाल में वामपंथ के हिल जाने का एक प्रमुख कारण यह भी है कि वे सिर्फ २ राज्यों की सत्ता तक सिमटे रहे! 
   
 

Kamal Dubey [kdbaba@yahoo.com] Bilaspur - 2011-05-17 04:06:58

 
  वाम का दक्षिण झुकाव ही बंगाल में 34 साल के लाल दुर्ग के पतन का कारण है. 
   
 

Awanish singh [awanish1233@gmail.com] Qatar - 2011-05-17 04:04:12

 
  आज जो बंगाल की स्थिति है उसके लिए वाम दल को पूरी तरह उतरदायी मन जा सकता है.वाम दल ने विकास के नाम पर unionism को बढावा दिया ,उसका परिणाम ये हुआ की सारी industry को बंगाल से बहार का रास्ता देखना पड़ा,जो लोग बंगाल की तरफ रुख करते थे ,अपना रास्ता बदल दिए ,अब देखिये क्या होता है .क्या ममता जी बंगाल का गौरव लौटा सकेंगी ?
 
   
 

Hemant [pillai.hemant@gmail.com] Hisar - 2011-05-17 03:49:13

 
  यह तो हम हमेशा ही पढ़ते आये हैं कि पूंजीवादी अखवार को लेफ्ट में न पहले कोई अच्छाई नज़र आयी और न आगे ही नज़र आएगी. 
   
 

dr.niranjan singh [dr.niranjanparmar2007@rediffmail.com] allahabad uttar pradesh - 2011-05-17 03:48:02

 
  श्यामल जी,जब कोई भी परम्परा जड़ बन जाये,तो उसे उखाड फेंकने में ही जनता और समाज की भलाई होती है.बंगाल के लोगों को बधाई कि उन्होंने जड़ हो चुकी वाम परंपरा को उखाड़ फेंका. 
   
 

आर . के . दुबे [rkdbxr@gmail] patna - 2011-05-17 03:14:43

 
  श्री श्याम बिहारी श्यामल जी का यह आलेख काबिले तारीफ है : गागर में सागर भर डाला है उन्होंने ! भाई, श्याम बिहारी जी की अभिव्यक्ति की शैली रोचक और स्पस्ट होती है! बंगाल में परिवर्तन की गाथा और व्यथा को इस लेख में बखूबी व्यक्त किया गया है ! 
   
 

मउ [rabib2010@gmail.com] मउनाथ भंजन - 2011-05-17 02:58:46

 
  ऐसा बरगद ,जिसमें केवल तनाएं थी,दूसरों को डराने के लिए। जड़ शुरू से ही कमजोर रहा । 
   
 

अजय कुमार झा [ajaykumarjha1973@gmail.com] दिल्ली - 2011-05-17 01:45:40

 
  नए राजनीतिक परिणामों में परिप्रेक्ष्य में एक सार्थक सामयिक आलेख लिखा आपने श्यामल भाई । हां भविष्य में क्या रंग लाएगा ये बदलाव ये देखने वाली बात होगी , मुझे तो खुशी है जनता बदलाव चाहती और जनता बदलाव कर देती है अब भी। 
   
 

Pushpendra Falgun [pushpendrafalgoun@gmail.com] Nagpur - 2011-05-17 01:36:42

 
  ...बायीं से उड़कर दायीं दिशा को गरुड़ गया, कैसा हुआ सगुन कि बरगद उजड़ गया
सटीक विश्लेषण किया है भाई श्यामल जी ने... उनसे आग्रह है कि समग्रता से इस पूरे उजाड़ का विश्लेषण करें ताकि उन पाठकों को वाम-सत्ता की अधोगति का पता चले, जिनकी उम्र अभी 25 भी नहीं है... इस विश्लेषण के लिए भाई श्यामल जी को बधाई...
 
   
 

अविनाश वाचस्‍पति [nukkadh@gmail.com] नई दिल्‍ली का एक नुक्‍कड़ - 2011-05-17 01:34:17

 
  और कितना छीलोगे जिन्‍होंने सबको पल पल पर छला है। 
   
 

bharat sharma [] bhopal - 2011-05-16 15:02:32

 
  आज मैंने दैनिक हिंदुस्तान की वेबसाइट पर एक समाचार पढ़ा, जिसमें लिखा था- प्रकाश करात ही अध्यक्ष रहेंगे. जिन लोगों को यह नहीं पता, कि वाम दलों में अध्यक्ष होता है या महासचिव, वे वाम दलों की व्याख्या कर रहे हैं, यह दुर्भाग्य है.मित्र ने अपने लेख में बंगाल का उद्योग में पिछड़ने का जिक्र किया है, मेरा सवाल है ग्वालियर में सिंधिया ने मालनपुर और बानमोर दो ओद्यौगिक क्षेत्र बनाये थे, आज वहां 80% कारखाने बंद हैं, यहाँ सरकार भी वामपंथियों की नहीं रही. इसका विश्लेषण भी साथ में कर दें तो उपकार होगा. 
   
 

rajiv mittal [rajivmittal707@gmail.com] agra - 2011-05-16 13:35:49

 
  मजा आ गया. कई नई बातें. 
   
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