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ये सरकार नहीं चलेगी

बात बोलेगी...
 

ये सरकार नहीं चलेगी

कृष्ण राघव

 

यह घर मेरा है. यह गली मेरी है. यह देश मेरा है. बस. अच्छा! तो गली से जुड़ने वाली सड़क किसकी है उस पर दौड़ने वाली बस, बिजली के खंभे, लोकल ट्रेन किसके है....सरकार के हैं, और किसके हैं. सड़क पर पानी का नल खुला है...तो हम क्या करें सरकार से कहिए न! सरकार है ही निकम्मी. पार्क में किस कदर गंदगी है, भई यह सरकार नहीं चल सकती... सच्चाई तो यह है कि सारी सरकारों को देख लिया, कोई भी सरकार काम नहीं करती.

अच्छा, और आप क्या करते हैं, हम क्या कर सकते हैं...हम ठहरे मामूली आदमी. यह मामूली आदमी क्या कर सकता है, आइए जापान से सीखें. हाल ही में जापान से लौटे एक म़ित्र के दो व्यक्गित अनुभव सुनिए.

अपने जापान प्रवास के दौरान वह एक रेल में सफर कर रहे थे. एक बच्चे के नुकीले खिलौने से सीट की गददी फट गई. पास ही बैठी एक दूसरी बूढ़ी महिला ने अपना बड़ा सा थैला खोला, उसमें से एक डिब्बा निकाला, उसमें रखे सुई धागे से, मुस्कुराते हुए फटी हुई गददी को सीना शुरू कर दिया. बच्चे के अभिभावक ने उनके हाथ से सुई धागा लेना चाहा तो बड़े प्यार से कहकर मना कर दिया कि वह मर्द है, सीट को अच्छी तरह से सी नहीं पाएगा. हमारे मित्र का कहना है कि उसके हाथ की सफाई का जवाब तो था ही नहीं, किंतु उसके जिम्मेदार नजरिए का तो कहना ही क्या!

उसके चेहरे पर झलक रहे भावों से ऐसा नहीं लगता था कि वह अपनी सरकार की अवैतनिक सेवा कर रही है. लगता था कि जैसे अपने ही किसी बच्चे का फ्रॉक सी रही है. ऐसा ही एक अनुभव उन्हें एक दूसरी रेल यात्रा में हुआ. अपने भारतीय मित्र के साथ, यात्रा के दौरान वे जापान में हुए अपने अनुभव बता रहे थे. बातचीत हिंदी में हो रही थी. हमारे मित्र शुद्ध शाकाहारी हैं. उन्हें कदाचित अच्छा शाकाहारी भोजन नहीं मिल पाया था. यह लोग बातों में लगे ही हुए थे कि एक स्टेशन आया और गुजर गया. गाड़ी चल रही थी कि उन्होंने देखा एक जापानी सज्जन अपने हाथों में कुछ फल लिए खड़े थे.

किसके पैसे से ये सारी सार्वजनिक इमारतें बनती हैं, जिनके कोनों में पान की पीक मार—मार कर उन्हें उगाल दान बना दिया जाता है.

पहला आश्चर्य था कि उन्होंने कहा यह फल शाकाहारी हैं, इन्हें लीजिए और कृपया यह न कहिए कि मेरे देश में आपको खाने को नहीं मिला. दूसरा सुखद आश्चर्य यह था कि वे शुद्ध हिंदी में बोले. बहरहाल जो बात जरूरी है, वह इतनी सी है कि अपने देश के प्रति जो स्वाभिमान उनमें था, वह केवल यह नारा लगाकर ही नहीं था कि सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा, वह तो है. आप उसे क्या बनाएंगे. किंतु उस हिंदोस्तां को अच्छा बनाने में आपका कितना योगदान है. या कि उसे अच्छा बनाने का ठेका आपने सिर्फ सरकार को ही दे रखा है बल्कि हम तो एक कदम और भी आगे जाना चाहेंगे. आज की पीढ़ी को तो अपने देश में इतनी कमियां नजर आने लगी हैं कि इस दुनिया के बाकी हर देश में कोई न कोई अच्छाई ऐसी दिख ही जाती है कि जवान होते—होते वह इस देश में रहना ही नहीं चाहते.

किंतु ऐसे पलायन से या कि सरकार को दोष देने से देश साफ हो जाएगा क्या ? उसकी सारी संपत्ति ठीक रह पाएगी क्या? किसी भी चीज को जब हम ‘’पब्लिक प्रापर्टी’’ कहकर पुकारते हैं तो उस समय अपने आपको पब्लिक से अलग क्यों कर लेते हैं. हम पब्लिक नहीं हैं, दूसरे के फेंके केले के छिलके से फिसल कर जब हम गिरते हैं, तब तो जी भरकर पब्लिक को कोसते हैं और जब स्वयं केला जमीन पर फेंकते हैं तब इस बात का ख्याल क्यों नहीं रहता कि कोई फिसल कर गिर सकता है.

उस समय हम यह क्यों भूल जाते हैं कि ऐसा करने से गंदगी नहीं फैल रही है क्या? सड़क पर फेंका गया कचरा सड़कर वातावरण में सड़ांध नहीं फैलाएगा क्या? इसका कोई सर्टिफिकेट होता है क्या हमारे पास कि अपने घर का कचरा किसी और के दरवाजे पर फेंकने से वह सोना हो जाता है?

आजादी के साठ साल बाद भी हमें कौन यह समझाने आएगा कि रेल से पंखे चोरी हो जाते हैं, नल से पानी बहता है या कि टेलीफोन के तार काट लिए जाते हैं तो ये सब चोरियां किसी और के घर में नहीं, हमारे अपने घर में होती हैं. यह समूचा देश, हमारा घर नहीं तो किसका है, किसके पैसे से ये सारी सार्वजनिक इमारतें बनती हैं, जिनके कोनों में पान की पीक मार—मार कर उन्हें उगाल दान बना दिया जाता है. हमारा बस चले तो इस तरह थूकने वालों के रसोईघर में जाकर थूकें, तब उन्हें पता चले कि गंदगी का मतलब क्या है. मित्रों हममें से अब कोई गुलाम नहीं है.

भगवान के लिए अपनी मानसिकता बदलिए. इस देश के चप्पे—चप्पे ने संचित सारी सार्वजनिक संपत्ति हमारी, आपकी, सबकी है...न सरकार की है न तथाकथित पब्लिक की है. अरे भाई! अपने घर के लिए चौकीदार रखने के बाद भी लोग बाग गफलत में तो नहीं सो जाते. तब भी उनका ध्यान उनकी संपत्ति की ओर रहता है. चौकीदार हो, माली हो या कोई और, हम उन्हें कोई गलत काम करने देते हैं क्या? तो जरूरत है कि अपनी संपत्ति का पहले तो हम खुद ख्याल रखें. साथ ही अपनी नजर भी खुली रखें, ताकि हमारी संपत्ति को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचे. साथ ही जो रखवाली के लिए रखे गए हैं, उन पर भी नजर रखें, वे किसी तरह की गड़बड़ी नहीं कर पाएं. संपत्ति चोरों या कि तोड़—फोड़ करने वालों के बारे में कौन सजग होगा, कौन उन्हें टालेगा? हम और आप ही न. आजादी के 60 साल कब के पूरे हो गए. अपने बारे में सतर्क और सजग होने के लिए यह समय कम नहीं है. अब तो राष्ट्रीय धर्म के बारे में अपने नजरिए में बदलाव करें जनाब.

21.05.2011, 16.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Beer Singh Rajput [singh.beer2011@gmail.com] Tikamgarh M.P. - 2011-05-24 16:58:56

 
  कृष्ण राघव जी, अच्छे विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिय आप बधाई के पात्र हैं. मैं पहले अमल की कोशिश करता हूं, फिर मैं विस्तार से अपने् जीवन के बारे में कहानियां सुनता हूं.krishna raghao ji achchhe bichar logon tak pahuchane ke liye ap badhai ke patra hain.Main pahle amal karne ki koshish karunga phir apni pratikriya dunga. 
   
 

श्यामबिहारी श्यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] varanasi - 2011-05-22 00:43:39

 
  बहुत ही सार्थक पोस्ट। खुली आंखों की बंद दृष्टि खोलने वाला। लेखक ने मित्र के हवाले से जापान के जो अनुभव-प्रसंग दिये हैं, उनके आलोक में हमें स्वयं को तौलना चाहिए कि हम अपने सार्वजनिक दायित्वों के प्रति कितने सजग हैं! निश्चय ही देशप्रेम जबानी जमाखर्ची से साकार नहीं होता बल्कि इसके लिए हमें अपने नागरिक-दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन करना होगा। कृष्ण राघव जी को जन-जागरुकता की दिशा में लेखनी चलाने के लिए बधाई!  
   
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