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गरीब होने की गुस्ताखी

मुद्दा
 

गरीब होने की गुस्ताखी

देविंदर शर्मा

 

हम सभी के लिए ऐसा कोई भी दिन नहीं होता, जब मोबाइल पर अपने सपनों का आशियाना खरीदने के लिए करीब आधे दर्जन संदेश न आते हों. ग्राहकों को लुभाने के लिए इन संदेशों में ऐसे विला उपलब्ध कराने का भी आग्रह किया जाता है, जिसके साथ स्वीमिंग पूल और मिनी गोल्फ कोर्स की सुविधाएं हैं. ये खूबसूरत आशियाने जिस जमीन की धरातल पर खड़े किए गए होते हैं, मूल रूप से वे उन गरीब किसानों की जमीन है, जिनकी बस एक ही गुस्ताखी है कि वे गरीब हैं.

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि पूरे देश के गरीब किसान अपनी जमीन की सुरक्षा के लिए डर के साये में जी रहे हैं. वे सरकार और उद्योगों द्वारा भूमि अधिग्रहण किए जाने के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं. कर्नाटक के मंगलूर से लेकर गोवा तक, उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ से लेकर ग्रेटर नोएडा तक, पश्चिम बंगाल में सिंगुर से लेकर पंजाब में मानसा और हरियाणा में अंबाला तक ग्रामीण क्षेत्र विद्रोह की आग में सुलग रहे हैं. बड़ी संख्या में कृषि उपयोगी भूमि को गैर कृषि कार्यो में तब्दील किया जा रहा है.

खाद्यान्न उत्पादन में अग्रणी पंजाब और हरियाणा राज्यों में पहले से ही कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण का कार्य शुरू हो चुका है. आंध्र प्रदेश में करीब 20 लाख एकड़ भूमि को गैर कृषि कार्यो में बदल दिया गया. हरियाणा में वर्ष 2005-2010 के बीच करीब 60 हजार एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है. मध्य प्रदेश में करीब 4.40 लाख हेक्टेयर जमीन को पिछले पांच वर्षो की अवधि के भीतर औद्योगिक कार्यो के लिए अधिग्रहीत किया गया. कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और पंजाब ने उद्योगों के लिए 'लैंड बैंक' बनाए हैं. जबकि राजस्थान ने उद्योगों को किसानों से प्रत्यक्ष तौर पर जमीन खरीदने की अनुमति प्रदान की हुई है.

इसी कड़ी में ग्रेटर नोएडा में भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के संघर्ष को इस तरह प्रचारित किया जा रहा है मानो कि वह अधिक दाम वसूलने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. जबकि वास्तविकता यह है कि अधिकांश किसान अपनी पुश्तैनी जमीन को देना ही नहीं चाहते. उनको ऐसा करने के लिए बाध्य किया गया.

असल मसला यह है कि सरकार खुद बिल्डर की भांति किसानों से व्यवहार करती है. वह बेहद काम दामों पर कृषि योग्य भूमि को किसानों से खरीदकर गैर कृषि कार्यो मसलन बिल्डरों को आवासीय इकाइयां बनाने के लिए महंगे दामों में बेच देती है. बाद में बिल्डर उस क्षेत्र में आधारभूत संरचनाओं के विकास द्वारा जमीन की कीमतों को कई गुना बढ़ा देते हैं. इन्हीं कीमतों पर वे अपने प्रोजेक्ट ग्राहकों में बेचते हैं. अब इस नई कीमतों को देखकर किसान खुद को ठगा सा महसूस करता है.

समाज में विकास के दो मानदंड कैसे हो सकते हैं? अमीरों के लिए अलग और गरीबों के लिए अलग? क्या यह सच्चाई नहीं है कि हर व्यक्ति चाहता है कि उसके पास भी जमीन का एक टुकड़ा हो? इसको हासिल करने के लिए वह जी-तोड़ मेहनत करता है. इसके उलट तस्वीर का एक स्याह पहलू यह है कि गांव में जिनके पास जमीन और मकान है, उनको विकास के नाम पर जबर्दस्ती बे-दखल किया जा रहा है. निश्चित रूप से यह विकास नहीं है बल्कि जबरन भूमि अधिग्रहण है.

कृषि योग्य भूमि का गैर कृषि कार्यो में उपयोग करने के दुष्परिणाम खाद्य सुरक्षा में भी दिखाई देंगे. उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित आठ लेन के एक्सप्रेस-वे के निर्माण और टाउनशिप निर्माण के अलावा उद्योगों, रीयल एस्टेट इत्यादि में कुल मिलाकर 23 हजार गांवों के विस्थापन की योजना है. यह राज्य के सभी गांवों का एक चौथाई आंकड़ा है.

इसका मतलब यह हुआ कि उत्तर प्रदेश के अनाज उत्पादन के कुल 198 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में से एक तिहाई यानी कि 66 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि को गैर कृषि कार्यो में इस्तेमाल किया जाएगा. इनमें से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपजाऊ जमीन का एक बड़ा हिस्सा गायब होकर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो जाएगा.

एक मोटे अनुमान के मुताबिक 66 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि क्षेत्र को गैर कृषि कार्यो में उपयोग किए जाने से अनाज के उत्पादन में 140 लाख टन की कमी आएगी. इसका मतलब यह हुआ कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश को भयानक खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ सकता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले ही खाद्यान्न संकट गहराता जा रहा है. वैश्विक स्तर पर वर्ष 2008 के खाद्य संकट के कारण 37 देशों में खाद्यान्न के लिए दंगे भड़क उठे थे. इसी से भविष्य की भयावह तस्वीर का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

21.05.2011, 23.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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