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प्यार पुचकार और निरापद संसार

बात बोलेगी

 

प्यार पुचकार और निरापद संसार

कृष्ण राघव


हर बात के दो पहलू होते ही है. जब तरक्की की बात चलती है तो मैं सदा यही सोचता हूं कि कैसी तरक्की ! कहावत है कि सांप की लंबाई दोनों ओर से बराबर की ही होती है, मुंह की ओर से भी और पूंछ की ओर से भी. परिवार नियोजन, समृद्ध जीवन जीने के लिए गांव और कस्बों से शहर की ओर पलायन और व्यक्तिगत स्वंतत्रता के लिए पिता और पुत्र तक के भी अलग—अलग निवास, ये सारी स्थितियां हैं तो आदमी के सुख के लिए किंतु इसके गलत अंजाम भी सामने आए हैं, आते रहे हैं.

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आज मुंबई में तो स्थिति भयावह हो गई है. बड़े-बूढ़ों को दिन दहाड़े धन के लिए कत्ल किया जा रहा है. ये वे बड़े-ब़ूढ़े ही हैं, जो अकेले रह रहे हैं. उनके बेटे-बेटी, नाती-पोते देश-विदेश में अपनी-अपनी नौकरियों पर लगे हुए हैं, उनके अलग-अलग संसार हैं अथवा कुछ जगहों पर ऐसा भी हो सकता है कि बड़े-बूढ़े का कोई सगा हो ही नहीं. सगा न हो और उन पर गाज गिरे यह तो एक बार फिर भी समझ में आता है किंतु अपनों के होते हुए भी बड़े-बूढ़े कष्ट झेलें, यह अक्ष्मय है. ऐसा भी नहीं है कि इन दिल को झकझोरने वाली घटनाओं के शिकार एक विशेष वर्ग के वृद्ध ही हैं और केवल मुंबई में ही है.

त्रासदी उन छोटे लोगों की भी है, जो अपने माता-पिता को मुंबई में रख नहीं पाते क्योंकि उनके पास स्वयं के रहने के लिए भी ठीक से स्थान नहीं होता. स्थान होता भी है तो बड़े-बूढ़े यहां आना नहीं चाहते. उन्हें मुंबई में आकर अजीब-सा लगता है. वे अपने आपको यहां ‘एडजस्ट’ नहीं कर पाते. तो क्या चाहिये उन्हें ? उन्हें परिवेश भी वही चाहिए, जहां उनका जीवन गुजरा है और अपना बच्चा और बच्ची भी वहीं चाहिए. बच्चों का वहां लौटना संभव नहीं है क्योंकि रोजी—रोटी का मसला ही ऐसा है. नतीजा ? कुछ मामलों में तो ऐसा भी होता है कि माता-पिता अथवा दोनों ही बारी-बारी कभी इस तो कभी उस बच्चे के पास घूमते रहते हैं. कहीं भी उनका मन नहीं लगता.

अक्सर उनकी शिकायत होती है कि फलां बच्चा अथवा उसकी पत्नी अथवा उन दोनों के बच्चे उनकी इज्जत नहीं करते. प्रत्येक व्यक्ति अपनी कमाई के दिनों में एक विशेष प्रकार के अधिकार का आदी हो जाता है. एक मान, एक प्रतिष्ठा जो उसे अपने परिवार के अन्य सदस्यों से मिलती रहती है.

ज्यों-ज्यों वह वृद्धावस्था की ओर बढ़ता है, उसकी आवश्यकता परिवार में कम होती जाती है. वह उतना सार्थक नहीं रह जाता. गृहस्थी के काम उसकी जगह किसी और की मर्जी से चल रहे होते हैं. इसलिए घर में उसकी उपेक्षा होती है. उपेक्षा न भी हो किंतु उसे लगती है. वह इसीलिए होता है क्यों कि उसके हाथ से उसका राजदंड निकल गया होता है. बहू तो बहू, नाती—पोते और बेटे—बेटी तक अवहेलना करते से लगते हैं. फलत: अधिकतर ये वृद्धजन अपने उसी घर में वापस चले जाते हैं, जहां पहले से रहते आए हैं. यहां आकर चोरी—डकैती, अपहरण और कत्ल के शिकार होते हैं ! तो क्या किया जाए? जीवन का क्रम तो रूकने से रहा! तो क्या इन वृद्धों को एक निश्चित अवस्था के बाद जिंदगी से भी रिटायरमेंट ले लेना चाहिए? यों तो ऐसा सोचना भी पाप है किंतु यही एक निष्ठुर सच्चाई भी है.

मैंने अपने ही आसपास, बेटे-बेटियों के होते हुए भी, एक बूढ़ी मां को खाना न मिलने की शिकायत करते हुए भी देखा है. एक पिता को एक ही शहर में अपनी बेटी से अलग तीसरी मंजिल पर छोटे से कमरे में रहते देखा है यद्यपि बेटी के पास उसी शहर के पॉश इलाके में दो मंजिला कोठी है और जिसके लगभग सात कमरे हमेशा खाली रहते हैं. कारण यह भी है कि बेटी के यहां कैसे जाउं? किंतु यह कारण भी मजबूरी ही है. दरअसल यह कहकर वह अपनी बेटी और दामाद को बचा लेते हैं. उन्हें पता है कि वे दोनों ही उनकी टहल नहीं कर पाएंगे क्योंकि उनके दामाद अपनी सगी मां की ही टहल नहीं कर पाए थे. पड़ोसियों से खाना मांगते—मांगते वह मर गई.

ये बूढ़े जो हमें इतना बड़ा कर देते हैं कि हम कमा सकें, कमाने लायक बन सकें तो क्या वे इतनी अपेक्षा भी नहीं कर सकते कि बदले में हम उन्हें एक सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन दे सकें?

मन ही मन मनाते तो अधिकतर यहीं रहते हैं कि अब काफी खा-पी लिया जी भी लिया, अब पिंड छोड़ें, जाएं उपर ! मैं मानता हूं कि उपर से कोई नहीं कहता किंतु अधिकतर चाहते यही है. मैं सोचता हूं क्या इन्हें अपनी बोनस की जिंदगी जीने का कोई अधिकार नहीं है? हरेक कार्यालय या कि व्यावसायिक संस्थान में छोटे से छोटे नौकर को भी बोनस दिया जाता है, वह उसका हक माना जाता है. उसी तरह बुढ़ापे के दिन भी एक तरह का बोनस ही हैं जो भगवान ने उन्हें दिया है. आप और हम कौन होते हैं उनसे उनका बोनस छीनने वाले? जरा अपनी फैक्टरी के कर्मचारी से छीनकर देखिए, हड़ताल करवा देगा. ये बिचारे रुठकर, रो कर, थोड़ा बहुत बुरा-भला कह कर ही थक जाते हैं तो कभी आपकी मान जाते हैं ओर कभी अपनी ठान लेते हैं.

जब ये अकेले रहना तय करते हैं तो लगता तो आपको यह है कि ये अपनी आजादी चाह रहे हैं किंतु होता यह है कि ये आपको आजाद कर रहे होते हैं. बदले में लुटकर मर-खप जाते हैं. आनन—फानन में आप वह जायदाद बेच देते हैं क्योंकि आपको वहां रहना ही नहीं है, कितनी आसानी से आप उनके ‘स्मृति चिहृन’ तक मिटा देते हैं, ये वहीं है जिन्होंने खुद गीले में सोकर आपको सूखे में सुलाया था, आपकी उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, पढ़ा—लिखाकर इस काबिल बनाया था कि आप उनसे दूर हो सकें और अपने मन माफिक रह सके.

‘अल्बर्ट आइंस्टाइन’ ने एक बात कही है. वे कहते हैं- ‘दिन में सैंकड़ों बार मैं स्वयं को यह याद दिलाता हूं कि मेरा बाहरी और भीतरी जीवन न जाने कितने जीवित और मृत प्राणियों के सहयोग से ही संवरा है. मुझे भी निरंतर यहीं प्रयास करना चाहिए कि मैं भी उसी गति से, उसी परिमाण से, उतना लौटा सकूं, जितना मैंने पाया है और अभी भी पा रहा हूं.’

क्या हम, आप और हमारा समाज कम से कम इतना ऋण इन बुजुर्गों को चुकाना चाहेगा? कहा न, इनका जीवन तो इनका बोनस है ये, अब उम्र के इस पड़ाव पर कैसे बदलेंगे? कहने दीजिए जो कहते हैं, कब तक कहेंगे ? काल के गाल में न जाने कब समा जाए! थोड़ा सब्र थोड़ा इंतजार और हो सके तो इन्हें दीजिए, प्यार, पुचकार और निरापद संसार.

30.05.2011, 18.29 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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