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राजनीति का अन्ना-रामदेव युग

मुद्दा

 

राजनीति का अन्ना रामदेव युग

श्यामबिहारी श्यामल


भविष्य का इतिहासकार पता नहीं हमारे इस समय को किन शब्दों में पारिभाषित करना चाहे. राजनीति में यह विचित्र दौर उपस्थित है. भ्रष्टाचार के विरोध का तेज स्वर हो या विदेशों में जमा अकूत काले धन की वापसी की मांग, मामले सारे राजनीतिक गूंज रहे हैं. इसके बावजूद सत्ता पर आसीन या अपनी बारी की प्रतीक्षा में तल्लीन, दोनों ही प्रकार की राजनीतिक शक्तियों के मुंह सिले हुए-से हैं. वे हतप्रभ हैं, हतवाक् हैं. किसी हद तक हतचेत् भी. उनके कंठ जैसे बैठ गये हों.

baba-ramdev

आश्चर्य तो यह कि ऐसे में जिनकी आवाज पूरे देश में गूंज रही है, वे पूर्णतः गैरराजनीतिक महकमे की शख्सियतें हैं. महाराष्ट्र से आकर दिल्ली हिला जाने वाले अन्ना हजारे या अब अपनी ताकत आजमाने को बेताब योगगुरु रामदेव. दोनों में से कोई न राजनीति का खिलाड़ी है न इसका दावेदार, किंतु जाने-अनजाने देश की राजनीति की बागडोर ही इन्हीं लोगों की ओर खिंचती-सी चली आ रही है. क्या कहा जाये इसे?

दिलचस्प यह कि अन्ना हजारे और योगगुरु रामदेव, दोनों में से किसी की टोली में प्रचलित ढांचे के राजनीतिक संगी-साथी नहीं हैं किंतु भ्रष्टाचार-विरोध के उनके स्वर ने स्वयं से जोड़ लिया है पूरे देश को. राजनीति के चाल-चलन से पूर्णतः निराश हो चुके लोग जैसे नेताओं की ओर से विकर्षित हो चुके हों. भ्रष्टाचार के सवालों ने समूची राजनीतिक बिरादरी की मौलिक ताकत या पूरी साख ही जैसे मिटाकर रख दी हो. हालत यह है कि सत्याग्रह के ऐलान मात्र पर स्वयं प्रधानमंत्री को योगगुरु के सामने हाथ जोड़े फुसफुसाते हुए महसूस किया जा रहा है.

योगगुरु रामदेव का अभियान आगे क्या मोड़ लेता या कैसे गुल खिलाता है, इस पर अभी से कुछ कहना तो जल्दबाजी होगी किंतु लोकपाल के सवाल पर अन्ना हजारे के साथ सरकार की जारी पैंतरेबाजी यह संकेत अवश्य दे रही है कि बात इतनी जल्दी हल होने वाली भी नहीं. लोकपाल के सवाल पर सारी मांगें मान लेने का वायदा कर सरकार ने अन्ना का प्रभावशाली सत्याग्रह तो तुड़वा दिया किंतु अब पैंतरे चल रही है.

कभी यह कहा जा रहा है कि लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को नहीं जाने देंगे तो कभी सुना जा रहा कि सांसद इससे मुक्त रखे जायेंगे. इस बीच अब योगगुरु रामदेव ने सरकारी रुख के ही मनमुताबिक यह राग आलाप दिया है कि लोकपाल के दायरे से प्रधानमंत्री और देश के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखा जाना चाहिए. असली दिक्कत यह है कि अन्ना हजारे अपने सत्याग्रह के दौरान दिखे देशव्यापी जनसमर्थन को राजनीतिक ताकत में तब्दील नहीं कर सके हैं. यह समर्थन यदि ताकत बन चुका होता तो न सरकार अपना स्वर इस तरह नहीं बदल पाती न कोई दूसरा सामने आकर सरकारी रुख को मजबूती देने वाला राग आलाप पाता.

भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना हजारे की लड़ाई को जो गति और दिशा मिलनी चाहिए थी, वह शुरू से ही उसे मिलती नहीं दिखी. कम से कम बनारस में 29 अप्रैल को जो देखा गया, इससे तो यही महसूस किया गया. यह वस्तुतः भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान की विधिवत् राष्ट्रव्यापी शुरुआत का अवसर था. दिल्ली के जंतर-मंतर में अपने अनशन से पूरे देश को भावनात्मक रूप से जोड़ लेने और जनलोकपाल विधेयक विषयक मांगें न मानने पर अड़ी केंद्र सरकार का गुरुर तोड़ देने के बाद उन्होंने इसकी बाकायदा घोषणा कर रखी थी. उनके प्रति जन्मे जोरदार आकर्षण का ही यह नतीजा था कि काशी का कटिंग मेमोरियल मैदान ही भरा हुआ नहीं, बल्कि पूरा इलाका उमड़ते लोगों से अंटा पड़ा था.

सभा शुरू हुई तो जैसे ही यह बताया गया कि यहां अन्ना हजारे फिलहाल दिखाई नहीं, बल्कि सिर्फ सुनाई पड़ेंगे तो पल भर में भीड़ का आधा उत्साह ही छींटों से आहत दूध की उबाल की गति को प्राप्त हो गया. तो, भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी इस पहली सभा को उन्होंने महाराष्ट्र के पुणे के निकट स्थित अपने गांव रालेगांव सिद्धी से ही मोबाइल फोन द्वारा संबोधित किया. कारण बताया गया कि अन्ना हजारे अस्वस्थ हैं. डाक्टरों की सलाह मानकर ही वह यहां नहीं आ सके किंतु मोबाइल फोन से ही संबोधित किया. इस महत्वपूर्ण सभा का मंच संभाला अरविंद केजरीवाल, स्वामी अग्निवेश और हास्य कलाकार जसपाल भट्टी आदि ने.

कहने की आवश्यकता नहीं कि इतिहास में ऐसे अवसर कभी-कभार आते हैं, जब कोई व्यक्ति अचानक करोड़ों लोगों के विश्वास का केंद्र-बिन्दु बनकर उभरता दिखे. ऐसा जनसमर्थन जुटाने का न कोई अचूक नुस्खा-टोटका तय है, न सिद्धान्त-सिद्ध निर्धारित कोई युक्ति-पद्धति. देश-काल की स्थितियां-परिस्थितियां और उलझ-सुलझ रहे समय-संदर्भ ही अपना ताप-चाप कुछ ऐसा बना लेते हैं कि यह उच्चतम पारिस्थितिक तापमान एक ऐसा व्यक्तित्व सृजित कर देता है जो रातोंरात करोड़ों दिलों की धड़कन बन जाता है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

satyaveersinghtomer [satyaveersinghtomer@gmail.com] Ghaziabad/Meerut - 2011-06-05 16:50:08

 
  जब तक हमारे भारत में सामाजिक और बौद्धिक स्तर में सुधार नहीं होगा तब तक भ्रष्टाचार रुपी असुर को रोक पाना मुश्किल होगा, चाहे कितनी भी बड़ी हस्ती अनशन क्यों न करें... 
   
 

श्यामबिहारी श्यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] varanasi - 2011-06-05 05:37:31

 
  इस आलेख के लिखे व यहां प्रकाशित होने के पांचचें दिन अर्थात् 05 जून की सुबह का अपडेट यह कि दिल्ली में बाबा रामदेव का अनशन-स्थल रौंदा पड़ा है। देर रात पुलिस ने कठोर ‘ऑपरेशन’ करते हुए इसे ध्वस्त कर डाला और अंधेरे में ही उन्हें उठा ले गयी! न्यूज चैनल चिल्ला-चिल्ला कर रात में हुई बर्बर कार्रवाई का विवरण दे रहे हैं। अनशन-स्थल पर पंहुचा रिपोर्टर रात में यहां किये गये पथराव की बात बताते हुए गिरे पत्थर उठा-उठाकर दिखा रहा है। बाबा को देहरादून रवाना किये जाने की सूचना भी आ रही है। कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह बयान दे रहे हैं कि बाबा रामदेव ने योग के नाम पर ठगी की है और प्रशासन ने शनिवार की रात उन पर जो कार्रवाई की, वह जायज है! कांग्रेस सरकार का यह बौखलाहट से भरा संयम-भंग क्या संकेत दे रहा है? क्या देश 1974 की ओर लौट रहा है? 
   
 

मिसिर [misirkatya55@gmail.com] sitapur,uttar pradesh - 2011-06-04 14:17:05

 
  शानदार लेख ! वर्तमान राजनैतिक हलचलों के परिप्रेक्ष्य में खुली दृष्टि से किया गया विश्लेषण देखने को मिला ! श्यामल जी को धन्यवाद ! 
   
 

रामजी यादव [yadav.ramji2@gmail.com] दिल्ली - 2011-06-04 01:47:04

 
  वैसे यह लेख एक बुद्धिजीवी की उन जायज़ चिंताओं को सामने लाता है कि राजनीतिक रूप से निरंकुश इस दौर को इतिहास मे किस तरह याद रखा जाएगा । सत्तासीन पार्टियों मे जनभावनाओं को लेकर कोई सूचिन्ता नहीं बल्कि एक शातिर दिमागी भरी हुयी है । लेकिन एक बात तो तय है कि दरअसल भारत का शासक वर्ग बेशर्मी और मनुष्यविरोध की हद को पार कर चुका है । यदि हम वर्ग हितों को भूल जाएंगे तो शायद यह दुख मनाने कि बात होगी लेकिन राजनीतिक रूप से सचेत होकर सोचें तब यह समझ सकते हैं कि ऐसे हालत भी किसी व्यवस्था की एक ऐतिहासिक सच्चाई होते हैं और अनियंत्रित स्थितियाँ तथा दिशाहीनता भी एक मोड तक राजनीति और इतिहास को ले जाकर छोडते हैं। अन्ना और रामदेव जैसे लोग, जो भीड़ के मनोविज्ञान को समझकर अपने को महत्वपूर्ण बनाते हैं, चाहे मुहरे हों या वज़ीर, भी इस चक्र से बाहर नहीं हैं। वैसे एक बात है कि आशाराम, मुरारी बापू, रविशंकर, सत्य साईं आदि के मुक़ाबले रामदेव जनता के अधिक नजदीक हो गए हैं और राष्ट्रीय आंदोलन के दौर के आध्यात्मिक नेताओं की याद दिलाते हैं। हो सकता है रामदेव के बाद कुछ और लोग भी सामने आयें और जैसा हमारा देश और राजनीति है, उसमें उनकी जगह कोई खत्म नहीं कर सकता क्योंकि यहाँ लोग अपनी सामाजिक-राजनीतिक भूमिकाओं को छोडकर उपभोक्ता हो रहे हैं। यह लेख इन स्थितियों का अच्छा तबसरा है। 
   
 

padmsingh [ppsingh8@gmail.com] Ghaziabad - 2011-06-04 01:27:40

 
  अन्ना हजारे के आंदोलन को छोटे से मंच और चंद सहयोगियों के साथ किये गए अनशन को रातों रात देश व्यापी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में बदलने का प्रत्यक्ष गवाह मै रहा हूँ..ऐसी उम्मीद स्वयं अन्ना को भी नहीं रही होगी... पूरी पूरी रात बच्चे बड़े और बुज़ुर्ग अपने घरों से निकल निकल कर आते रहे... लोग हज़ारों रूपये हाथ में लिए घूम रहे थे और पूछ रहे थे हम अनुदान करना चाहते हैं... उस समय किसी तरह के दान लेने की कोई व्यवस्था नहीं की गयी थी... लोग जिस तरह से भ्रष्टाचार के विरुद्ध एकजुट हुए वह आम जनता की अकुलाहट और वर्तमान व्यवस्था के प्रति असहमति दर्शाती है.. मगर अन्ना राजनैतिक पैंतरेबाजी में फँसे और इनकी मुहिम को कहीं भटकाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है.
बाबा रामदेव की मुहिम कहीं अधिक व्यापक सोच और पूर्वनियोजित है ... संभव है यह एक नए युग का सूत्रपात हो... आगाज़ हो चुका है... ईश्वर करे यह मुहिम अपने अंजाम तक भी पहुँचे
 
   
 

savita singh [savitasingh.singh7@gmail.com] varanasi - 2011-06-01 19:31:09

 
  अन्ना हजारे जिस उदेश्य को लेकर अनशन पर बैठे, बिचारी जनता दौड़ पडी़। चलो कोई तो आगे आया। अब उसी आंदोलन में घालमेल करने बाबा रामदेव भी घुस पड़े हैं। अब कहना ना होगा कि भ्रष्टाचार रुपी अंगद का पांव जस का तस ही रहेगा। हां, भ्रष्टाचार रुपी आग पर अन्ना और रामदेव की रोटी जरुर सिंक जायेगी। जनता तो बस महंगाई रुपी गेहूं के साथ घुन की तरह पिसती रही है और आगे भी पिसती रहेगी। 
   
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