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नेपाल का संवैधानिक संकट

बात पते की

 

नेपाल का संवैधानिक संकट

रेणु अगाल


अभी चंद साल पहले की ही तो बात थी कि नेपाल में सड़कों पर जश्न का माहौल था. राजशाही हट गई थी, तख़्त और ताज फेंक दिए गए थे, जनता की जीत हुई थी. काठमांडु का माहौल बदला-बदला था. लोग एक नई सुबह के स्वागत के लिए तैयार थे. नेपाल की अपनी जैसमिन क्रांति की महक चारों ओर फैली हुई थी. नेपाल की जनता ने जो जनतंत्र की स्थापना का मन बनाया था, उस दिशा में देश आगे बढ़ रहा था. सशस्त्र संघर्ष की राह छोड़कर मुख्य धारा में आई माओवादी पार्टी समेत सभी राजनीतिक दलों ने एक नए संविधान के गठन का मन बनाया. ये वो दिन थे, जब भारत ने माओवादियों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने की कोशिश में 12 सूत्री समझौता करवा कर अहम भूमिका निभाई थी.

नेपाल के नेता


पर पिछले तीन सालों में नेपाली जनता के सपनों पर ग्रहण लगता नज़र आने लगा. कई कोशिशों के बावजूद संविधान गठित नहीं हुआ, माओवादियों ने शस्त्र सौंपने के अपने वादे को पूरा नहीं किया, नेपाली कांग्रेस ने बहुमत न पाने के बावजूद प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहने का रिकार्ड बनाया, मधेसी दलों ने अपनी मांगों और हितों के लिए राजनीतिक सौदेबाज़ी के गुर दिखाए. इन सब चालों के बीच संविधान बनाने की प्रक्रिया कछुआ चाल चलती रही. लोग अपनी आंखों के सामने अपने नए संविधान का सपना चूर-चूर होते देखते रहे. लोकतंत्र के तौर तरीक़ो को माओवादी भी समझने लगे. और सत्ता का सुख क्या कर सकता है, उसका नज़ारा नेपाली जनता को देखने को मिला.

नेपाल के माओवादी भी उसी सिस्टम का हिस्सा बन गए, जिसको सुधारने के नाम पर उन्होंने दशकों तक सशस्त्र संघर्ष किया था. और जब-जब उनके कारनामे उनकी लोकप्रियता घटाते दिखते, उनका भारत विरोधी स्वर तेज़ होने लगता. अभी तक नेपाल पर पैनी नज़र टिकाए और अपने मन माफिक प्रशासन की स्थापना की आस में बैठे भारत की चिंताएं बढ़ने लगीं. और इस सब के बीच 28 मई को संविधान गठित करने की एक और समय सीमा आई.

एक बार फिर उस दिन जनता ने देखा कि कैसे राजनीतिक दलों का दिन तू-तू मैं-मैं में बीता और मध्यरात्री तक चली बहसों के बाद सुबह-सुबह संविधान बनाने की मियाद तीन महीने और बढ़ाने का फरमान किसी तरह आपस में मिलकर पास करा लिया गया. जो लोग इसका शुरु से आखिरी तक विरोध करते रहे वो थे, राजा की समर्थक राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक पार्टी के नेता; क्योंकि वे राजा की वापसी के हक़ में और नए संविधान के गठन के ख़िलाफ़ रहे हैं. वो विरोध करते रहे. यानि केवल उन्हीं की भूमिका इन तीन सालों में नहीं बदली. वे ही थे, जिनके हाथ से रेत की तरह सत्ता निकल चुकी थी और बाकी राजनीतिक दलों की विफलता उनके भविष्य में फिर नेपाल की राजनीति में आवाज़ बनने का रास्ता बन सकती थी. डेमोक्रेटिक मधेसी फ्रंट ने भी मतदान में यह कहते हुये भाग नहीं लिया कि सत्ता उनकी तीन सूत्री मांगों को पूरा करने में असफल रही है.

दूसरे सभी राजनीतिक दलों पर देश की भलाई और जनता की इच्छा से ज़्यादा अपना राजनीतिक नफा नुकसान हावी रहा. प्रचंड के नेतृत्व में सालों तक सशस्त्र संघर्ष करने वाले माओवादियों ने लोकतंत्र की राह पर आने के समय अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के शस्त्रों का समर्पण करने का वादा किया था. वह वादा आज तक पूरा नहीं हुआ. अब तीन प्रमुख राजनीतिक धाराओं के बीच जो पांच सूत्री समझौता हुआ है, उससे भी कुछ बदलेगा ऐसा लगता नहीं है. इस बीच माओवादियों के बीच आपसी खींचतान भी जारी है.

आपको याद होगा कि माधव नेपाल ने भी ऐसे ही समझौते के तहत प्रधानमंत्री पद छोड़ा था और अब झलनाथ खनाल का भी यही वादा है. जो नज़ारे नेपाल ने पिछले सात महीनों में देखे हैं, संभव है वैसे ही नज़ारे आने वाले 3 महीनों में भी उसे देखना पड़े. 28 अगस्त भी शायद वैसे ही आ जाए, जैसे 28 मई आया था.

कितने पीएलए लड़ाकू नेपाली सेना में भर्ती होंगे, कब और कैसे शस्त्रों को माओवादी सौंपेंगे ये मुद्दे आज भी बने हुए हैं. मधेसियों की अलग राज्य की मांग, सेना में तराई वासियों की भर्ती जैसी मांगें भी पूरी होती नज़र नहीं आ रहीं. सत्ता को समझने वाली और नेपाली राजनीति के केंद्र में सबसे अधिक समय तक रही, नेपाली कांग्रेस, सत्ता से दूर रहकर राजनीतिक हाशिये पर पहुँचना नहीं चाहती.

अभी तो माओवादियों,वामपंथियों और नेपाली कांग्रेस के बीच हुए समझौते में ये भी स्पष्ट नहीं है कि प्रधानमंत्री खनाल कब अपना पद छोड़ेंगे. सवाल ये भी है कि क्या संसद को मिली तीन महीने की मोहलत संवैधानिक है भी या नहीं. पर शायद सबसे बड़ी चुनौती नेपाल के नेतृत्व के सामने राजनीतिक परिपक्वता दिखाते हुये अपना नफा नुकसान भूल कर देश हित में सोचने की है. इस बात की उम्मीद नेपाली जनता ही नहीं पड़ोसी देश भारत भी करेगा. ये और बात है कि फिलहाल नेपाल की राजनीति का जो रुप सामने आया है, वो ज़्यादा आशा और विश्वास नहीं जगाता- न नेपालियों के मन में न पड़ोसी भारतीयों के ही.

04.06.2011, 01.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Ninad pandey [] Toranto Road, Sembawang, Singapore - 2011-06-07 12:34:58

 
  नेपाल में सभी लोग केवल सत्ता के भूखे हैं. उन्हें आम जनता की बदहाली से कोई लेना-देना नहीं है. नेपाल में इस लोकशाही में भी कहीं ज्यादा गरीबी, अशिक्षा बढ़ी है. राजशाही के दिनों से कहीं अधिक लड़कियां आज दुनिया भर में वेश्यावृत्ति में हैं. अगर यही लोकशाही है तो ऐसी लोकशाही किसी भी देश में नहीं होनी चाहिये. 
   
 

Namita Mehta [] Agra - 2011-06-07 12:29:46

 
  नेपाल के संकट पर लिखते समय आपको माओवादियों की स्थिति पर भी थोड़ा प्रकाश डालना चाहिये था. मुझे तो लगता है कि नेपाल की ताजा हालत के लिये सबस अधिक कोई जिम्मेवार है तो वो हैं माओवादी. खासतौर पर प्रचंड का समूह. प्रचंड जैसे लोगों ने नेपाल को दिवास्वप्न दिखाया और फिर देश को एक ऐसे चौराहे पर खड़ा कर दिया, जहां से कहीं जाना संभव ही नहीं था. 
   
 

Ajay Sengupta [ajaysengupta@hotmail.com] Ranchi - 2011-06-04 07:01:57

 
  Do we know, what maoist think about their movement ? Do we know, what maoist think about their movement ? The basic aim of the CPN(M) armed struggle is to capture state power and establish new people\'s democracy (naulo janbad). The concept of new democracy is inherited from the thoughts of Mao Zedong, which in turn built on the views of Lenin, Trotsky and Stalin. The new democratic revolution marks the transition from the classical Marxist stages of bourgeois hegemony (old democracy) to proletarian hegemony (new democracy). For a society in which even the bourgeois democratic revolution has not reached completion, however- such as China in the 1930s or Nepal in the current Maoist analysis- the new democratic revolution can telescope
the stages of bourgeois and proletarian hegemony. Combined with the Leninist theory of continuous revolution, this forms the basis of the Nepali Maoists\' vision of their struggle:
This plan would be based on the aim of completing the new democratic revolution after the destruction of feudalism and imperialism, then immediately moving towards socialism, and, by way of cultural revolutions based on the theory of continuous revolution under the dictatorship of the proletariat, marching to communism -- the golden future of the whole humanity.
 
   
 

सरोजराज अधिकारी [] Kathmandu - 2011-06-04 06:44:28

 
  माओवादी लडाकु रेखदेख, समायोजन र पुनःस्थापनासम्बन्धी विशेष समितिको बिहीबारको बैठकले लडाकुको वर्गीकरणका लागि विज्ञहरू सम्मिलित १ सय २० जनशक्ति यथाशीघ्र नियुक्त गर्ने निर्णय गरेर एउटा सकारात्मक सन्देश दिएको छ । तर संविधानसभाको म्याद सकिन दुई महिना तीन सातामात्र बाँकी रहँदा दलहरू समायोजन र पुनःस्थापनासम्बन्धी मुख्य विवादित विषयमा प्रवेश गरेका छैनन् ।

वर्गीकरणअघि नै हुनुपर्ने समायोजनसम्बन्धी मापदण्ड, प्रक्रिया, संख्या, पदीय मिलान

-र्‍यांक हार्मोनाइजेसन), प्रवेश -सामूहिक कि व्यक्तिगत) र पुनःस्थापना तथा स्वैच्छिक अवकाशसम्बन्धी आर्थिक प्याकेजका विषय अझै टुंगो लाग्न बाँकी छ । संख्या पहिले नै तोक्ने कि लडाकुसँग समायोजन, पुनःस्थापना र स्वैच्छिक अवकाशमध्ये कुन रोज्ने भनी सर्वेक्षण गर्ने विषय पनि विवादित छ ।

यी विषयमा टुंगोमा नपुग्दै समितिले सर्वेक्षणका लागि विज्ञ सम्मिलित जनशक्ति भर्ना गर्ने निर्णय गरेको छ । समायोजनको \'मोडालिटी\' र पुनःस्थापनाको प्याकेज टुंगो नलागी सर्वेक्षण गर्दा माओवादी प्रभावमा रहेकाले सबै लडाकुले सुरक्षा निकाय त्यसमा पनि नेपाली सेनामै समायोजन हुनुपर्ने अडान राख्ने निश्चित छ । पहिले नै संख्या निर्धारण गर्दा सर्वेक्षणका क्रममा समायोजनमा जान चाहनेको संख्या तोकिएभन्दा बढी वा घटी भयो भने के गर्ने अन्योल छ ।
 
   
 

Biju Toppo [biju.toppo@gmail.com] Noida - 2011-06-04 06:40:17

 
  नेपाल का संकट असल में संविधान का नहीं, इन नेताओं की नियत का संकट है. प्रचंड ने सत्ता में आते ही जिस तरह से राजतंत्र की मुद्रा में संविधान सभा को हांकने की कोशिश की थी, यह संकट उसी का परिणाम है. 
   
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