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जनसत्ताः हिन्दी का बंगीय आईना

बात निकलेगी तो...

 

जनसत्ताः हिन्दी का बंगीय आईना

कृपाशंकर चौबे


बीसवीं शताब्दी के आखिरी दशक में हिन्दी की बंगीय भूमिका का आईना ‘जनसत्ता’ के कोलकाता संस्करण के तत्कालीन अंकों में देखा जा सकता है. ‘जनसत्ता’ का कोलकाता संस्करण 1991 में शुरू हुआ और उसके स्थापना काल से ही उप संपादक के रूप में मैं उससे जुड़ गया था. ‘जनसत्ता’ में ग्यारह वर्ष से ज्यादा समय तक काम करते हुए मैंने निरन्तर महसूस किया कि हिन्दी पाठकों से संवाद स्थापित करने का इससे उपयुक्त मंच और कहीं नहीं है.

jansatta


पत्रकारिता बगैर संवाद के चल ही नहीं सकती और उसकी सार्थकता इस बात में है कि वह पाठकों से कितना जीवंत संवाद रखती है. किसी भी रचनात्मकता के लिए, विकास के लिए, यहाँ तक कि किसी समुदाय को आगे ले जाने के लिए संवाद जरूरी है. ‘जनसत्ता’ ने बंगाल के प्रवासी हिंदी समाज के साथ ही बांग्ला समाज के साथ भी जीवंत संवाद कायम किया. समाज में जहां भी अनौचित्य दिखता, ‘जनसत्ता’ उसे टोकता. उसी के समानांतर बांग्ला साहित्य- कला-संस्कृति के कई सबल पक्षों को उसने हिन्दी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया.

सुभाष मुखोपाध्याय, नीरेंद्र नाथ चक्रवर्ती, सुनील गंगोपाध्याय, शंख घोष, नवारूण भट्टाचार्य, दिव्येंदु पालित, देवेश राय, जय गोस्वामी, नवनीता देव सेन, सुचित्रा भट्टाचार्य, अलोक रंजन दासगुप्त, पंकज साहा, मल्लिका सेनगुप्त, सुबोध सरकार, कृष्णा बसु, विजया मुखोपाध्याय, मंदाक्रांता सेन आदि बांग्ला साहित्यकारों की प्रमुख रचनाओं से हिंदी जगत को ‘जनसत्ता’ ने ही परिचित कराया. इनमें से कई लेखकों को तो ‘जनसत्ता’ ने ही हिंदी में ‘इन्ट्रोड्यूस’ किया. बादल सरकार, सत्यजित राय, तपन सिन्हा, शंभु मित्र, मृणाल सेन, मनोज मित्र, तापस सेन, खालिद चौधरी, जोगेन चौधरी, चिंतामणि कर, के. जी. सुब्रह्मण्यम, गणेश पाइन, विकास भट्टाचार्य, विभास चक्रवर्ती, उषा गांगुली, गौतम घोष, बुद्धदेव दासगुप्ता, रूद्रप्रसाद सेनगुप्त, ब्रात्य बसु आदि के कला-कर्म की अद्यतन जानकारी भी 'जनसत्ता' देता रहा. बांग्लाभाषी शिल्पियों के लम्बे-लम्बे साक्षात्कार भी ‘जनसत्ता’ ने प्रकाशित किए. बांग्ला की सहवर्ती संस्कृति के साथ 'जनसत्ता' के इस "इंटरेक्शन' को बांग्ला का बौद्धिक जगत आज भी आदर के साथ याद करता है.

कोलकाता में ‘जनसत्ता’ के आने के पहले भी हिंदी के समाचार पत्र निकलते थे पर उन अखबारों में बांग्ला समाज तो दूर, हिंदी समाज की सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए भी कोई जगह नहीं होती थी. ‘जनसत्ता’ बांग्ला के साथ ही हिन्दी भाषी संस्कृतिकर्मियों की गतिविधियों को प्रमुखता से प्रकाशित करता था. बंगाल के हिन्दी पाठकों ने देखा कि पहली बार ‘जनसत्ता’ के रविवारीय अंक 'सबरंग' की कवर स्टोरी कभी प्रतिभा अग्रवाल पर तो कभी श्यामानंद जालान पर, कभी नागार्जुन तो कभी केदारनाथ अग्रवाल पर, कभी राम विलास शर्मा तो कभी नामवर सिंह पर, कभी कृष्णा सोबती तो कभी विद्या निवास मिश्र पर, कभी महाश्वेता देवी तो कभी पंडित जसराज पर तो कभी उषा गांगुली पर छप रही है. बंगाल के हिन्दी पाठकों ने देखा कि नागार्जुन से लेकर त्रिलोचन और कृष्ण बिहारी मिश्र के वक्तव्य ‘जनसत्ता’ के पहले पृष्ठ पर सचित्र प्रकाशित होते हैं.

‘जनसत्ता’ ने सिर्फ साहित्य-कला-संस्कृति ही नहीं, राजनीति, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, स्त्री-विमर्श, दलित और अल्पसंख्यकों के समसामयिक सवालों को भी उम्दा तरीके से उठाया. मदर टेरेसा और उनकी संस्था मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी से जुड़ी अन्तरराष्ट्रीय महत्व की कई खबरें पहली बार ‘जनसत्ता’ में छपीं, बाद में बांग्ला अखबारों में आर्इं.

अपराध की अनेकानेक खबरें प्रभात रंजन दीन ने ‘जनसत्ता’ में ब्रेक कीं तो प्रकाश चण्डालिया ने राजस्थानी समाज से जुड़ी खबरों को और रंजीव ने बंगाल कांग्रेस की कई खबरों को ब्रेक किया. पलाश विश्वास ने बांग्लादेश से दशकों पूर्व भारत आए लोगों की नागरिकता से जुड़ी खबरें ब्रेक की तो जयनारायण प्रसाद ने फिल्म जगत और कृष्ण कुमार शाह ने समाज सेवा से जुड़ी कई खबरों को ब्रेक किया.

‘जनसत्ता’ में डेस्क के साथियों को भी खुलकर लिखने की स्वतंत्रता थी. अपना ही उदाहरण दूँ तो 1991 से 2001 तक लगभग हर पखवारे ‘जनसत्ता’ के सम्पादकीय पृष्ठ पर मेरा मुख्य लेख छपता रहा. उसके अलावा बंगाल के साहित्य-कला-संस्कृति जगत से सम्बद्ध रिपोर्ताज और फीचर भी मैं नियमित लिखता था. बंगीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर लगातार 25 दिनों तक मैंने ‘जनसत्ता’ के पहले पेज की बाटम स्टोरी लिखी थी. हावड़ा ताना बाना उप शीर्षक से. उन सबकी प्रेरणा के स्रोत थे कवि अरविन्द चतुर्वेदी. ‘जनसत्ता’ के कारण यदि मेरी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनी तो उसका सबसे ज्यादा श्रेय मैं अरविन्द जी को देना चाहूँगा. अरविन्द जी खुद भी सांस्कृतिक विषयों पर ‘जनसत्ता’ में लिखते थे. श्याम आचार्य, अमित प्रकाश सिंह, अनिल त्रिवेदी, शैलेंद्र, ओमप्रकाश अश्क, राजेश त्रिपाठी, डॉ. मान्धाता सिंह, सुमंत भट्टाचार्य, दिलीप मंडल, विनय बिहारी सिंह, फज़ल इमाम मल्लिक, गंगा प्रसाद, प्रभाकर मणि तिवारी, दीपक रस्तोगी और प्रमोद मल्लिक भी विविध विषयों पर खबरें और फीचर लिखते थे. कुछ समय के लिए ‘जनसत्ता’, कोलकाता को शम्भुनाथ शुक्ल और रवीन्द्र त्रिपाठी का संपादन सहयोग व रचनात्मक संस्पर्श भी मिला था.

बंगाल में रहने वाले हिन्दी के सभी वरिष्ठ और नवोदित लेखकों की रचनाएं ‘जनसत्ता’ ने छापीं. अलका सरावगी का उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाईपास’ सबसे पहले ‘जनसत्ता’ कोलकाता के रविवारीय अंक ‘सबरंग’ ने ही धारावाहिक छापा था. प्रभा खेतान के दो-दो उपन्यास 'सबरंग' ने धारावाहिक छापा तो मधु कांकरिया की रचनाएं भी. "सबरंग' के संपादक अरविन्द चतुर्वेद एक पूरा पन्ना कविता के लिए देते थे और "सबरंग" में कविता हमेशा दाहिने पृष्ठ पर छपती थी. कवि के सचित्र परिचय के साथ. कविता की अन्तर्वस्तु के अनुरूप रेखाचित्र भी प्रकाशित किए जाते थे. "जनसत्ता' में कविता कभी फीलर के रूप में नहीं छपी. एक तरफ जगदीश्वर चतुर्वेदी और अनय "जनसत्ता', कोलकाता में कॉलम लिखते थे तो दूसरी तरफ महाश्वेता देवी "मैं जो देखती हूँ' शीर्षक स्तम्भ लिखती थीं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shivkumar singh kaushikey [sk.kaushikey@gmil.com] ballia - 2011-06-10 08:35:10

 
  जनसत्ता ने सच में बंग समाज को हिंदी के पाठकों के सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाई है. 
   
 

ved vilas [vedvilas@gmail.com] noida - 2011-06-10 04:06:02

 
  कृपा जी जब भी लिखते हैं, अच्छा लिखते हैं. 
   
 

प्रफुल्ल कोलख्यान [kolkhyanji@gmail.com] कोलकाता - 2011-06-09 04:51:45

 
  आपने कोलकाता में जनसत्ता पर अच्छा संस्मरण लिखा है। यह ठीक है कि जनसत्ता के हिंदी में होने का और खासकर कोलकाता में होने का अपना बड़ा अर्थ रहा है। मुझ जैसे साधारण लोगों को भी जनसत्ता से बहुत कुछ मिला है। जनसत्ता के लिए हमारे मन में गहरा सम्मान है, गर्व भी। अच्छा लगा। 
   
 

Sambhu ghosh [] Kolkata - 2011-06-09 04:42:13

 
  जनसत्ता हमारे जैसे कई लोगों के लिये हिंदी समाज को बेहतर तरीके से पहचानने का अवसर मिला. कोलकाता से पहले भी बिश्वामित्र और सन्मार्ग जैसे अखबार निकलते थे लेकिन जो ख्याति जनसत्ता ने अर्जित की, वह दुर्लभ है. कृपाशंकर चौबे जी से जनसत्ता के साथ-साथ तत्कालीन साप्ताहिक पत्रिका रविवार का भी विश्लेषण करना अपेक्षित है. 
   
 

Sanjeev Tiwari [sanjeev.tiwari.2001@gmail.com] Delhi - 2011-06-08 18:51:38

 
  जनसत्ता को गोयनका की नई पीढ़ी ने मार डाला वरना कौन से कारण थे कि इतना बेहतर अखबार धीरे-धीरे मर गया. वह भी तब, जब उसी समूह का अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस पगार के साथ-साथ सुविधायें बढ़ाते चला गया और जिंदा ही नहीं रहा, अच्छे से आज भी बाजार में है. कृपाशंकर चौबे के बांगला लेखकों के साथ जिस तरह के रिश्ते रहे हैं और जिस तरह से वह सब कुछ जनसत्ता में बरसों आता रहा, उसके लिये कृपाशंकर जी को जितनी भी साधुवाद दी जाये, कम है. 
   
 

Biju Toppo [biju.toppo@gmail.com] Noida - 2011-06-08 18:43:42

 
  जनसत्ता कोलकाता पर आपने सुंदर लिखा है. एक पाठक के बतौर बहुत-सी स्मृतियां इस अखबार से जुड़ी हुई हैं.
इस अखबार का कोलकाता संस्करण मैं बरसों पढ़ता रहा हूं. इसको पढ़ कर कभी लगा ही नहीं कि यह बंगाल की धरती से निकल रहा है और यह भी कि बंगला का समाज हिंदी समाज से एक दम भिन्न है. जनसत्ता ने सच में बंग समाज को हिंदी के पाठकों के सामने लाने में बड़ी भूमिका निभाई है.
 
   
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