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मैट्रो के नाम एक पत्र

बात निकलेगी तो...

 

मैट्रो के नाम एक पत्र

अनिल चमड़िया


प्रति
प्रबंध निदेशक,
दिल्ली मैट्रो रेल कारपोरेशन लिमिटेड

विषय- मैट्रो स्टेशनों के नामों को संशोधित करने के संबंध में

मैट्रो ट्रेन


मैं आपका ध्यान मैट्रो स्टेशनों के नामों के निर्धारण की प्रक्रिया की तरफ ले जाना चाहता हूं. मैं सामान्य तौर पर यह समझता हूं कि स्टेशनों के नामों के निर्धारण के लिए आपकी एक प्रक्रिया होगी. मैं उस निर्धारण की प्रकिया को समझना चाहता हूं. लेकिन उसके साथ मैं आपका ध्यान स्टेशनों के कुछ नामों की तरफ जरूर ले जाना चाहता हूं और मैं यह कहने की स्थिति में हूं कि इनके निर्धारण और उनके संबोधन के पीछे पूर्वग्रह सक्रिय हैं.

भारतीय समाज की विविधता के बारे में मुझसे आप ज्यादा जानते हैं. इसकी संस्कृति से भी आप वाकिफ हैं. मैं पहला सवाल यह पूछना चाहता हूं कि गुरूतेग बहादुर नगर को जी टी बी नगर क्यों संबोधित किया जाता है? क्या राजीव चौक को आर सी संबोधित किया जा सकता है? नामों का संक्षिप्तकरण के पीछे क्या उद्देश्य हैं? किसी नामकरण के पीछे एक निश्चित उद्देश्य होता है. उसके संक्षिप्तकरण से उसके उद्देश्य में भटकाव आता है. आखिर यह समझने की कोशिश ही क्यों की जाए कि जीटीबी का क्या अर्थ होता है. क्या सिखों के भावनाओं को इससे ठेस नहीं लगती होगी?

इस तरह के सवालों की गंभीरता को शायद आप एक घटना से समझ सकते हैं. एक यात्री ने यमुना बैंक स्टेशन पहुंचकर यह सोचा कि यहां यमुना बैंक नाम का कोई बैंक होगा. ऐसे बहुत सारे यात्री ये समझ नहीं पाते हैं कि यमुना बैंक नाम क्यों है. यमुना नदी को तो लोग जानते हैं लेकिन उसके साथ बैंक लगने का कारण हमारी समझ में नहीं आता है. अंग्रेजी में बैंक का अर्थ यदि तट होता है और यमुना तट की जगह यमुना बैंक नाम रखा गया है तो इसके पीछे क्या उद्देश्य हैं?

किसी एक शब्द की रचना समाज की बड़ी धरोहर होती है. एक लंबी प्रक्रिया के बाद एक शब्द रचित होता है और फिर वह सामान्य जन में पहुंचता है. शब्द में एक पूरी अर्थवत्ता होती है. अर्थवत्ता में छवि और कल्पनाएं भी होती है. तट की यात्रा आधुनिक सभ्यता के विकास के साथ शुरू होती है. क्या यमुना पर जो कविताएं लिखी गई है- मसलन मां यह कदम का पेड़ अगर होता यमुना तीरे..... मैं केवल उदाहरण के लिए कविता की एक पंक्ति आपके सामने रख रहा हूं ताकि आप जैसे संवेदनशील लोग एक शब्द के महत्व को समझ सकें. एक पूरा रचना संसार एक शब्द की अर्थवत्ता से जुड़ा होता है. आखिर यमुना बैंक के नामकरण की प्रक्रिया में यह सोचने तक की जरूरत महसूस क्यों नहीं की गई कि यमुना तट की जगह यमुना बैंक के नामकरण से उसका अर्थ ही बदल जाता है. दो भाषाओं के इस तरह मिश्रिण से संचार के सिद्धांतों का उल्लंधन होता है. यदि आपने यमुना तट नामकरण किया होता तो क्या बिगड़ जाता?

यह किसी समाज की अभिजात्य संस्कृति का भी परिचायक नहीं है बल्कि एक भौड़ापन है. यह सांस्कृतिक विरासत के साथ खेल हैं. चूंकि इस समय हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषाओं के समाज पर तरह तरह के सांस्कृतिक आक्रमण चल रहे हैं ऐसे में बहुत सारे ऐसे सवाल है जिन पर कोई आवाज नहीं उठ रही है. लेकिन मैं आपको यह कहना चाहता हूं कि मैट्रो महज ट्रेन सेवा नहीं है. इसके जरिये एक भाषा और संस्कृति भी संचारित होती है. मैं तो यहां तक समझता हूं कि महाशहरी सभ्यता का यह (मैट्रो) नदी का किनारा है. इसी संवेदना के साथ मैं आपको इन बातों की तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं. मैं तो अपनी उस विरासत को हर संभव तरीके से सुरक्षित करने का पक्षधर हूं जो समाज को जोड़ने में जरा सी मदद करता हो.

मेरी समझ में ये बात नहीं आई कि आखिर वजीर पुर के नाम से क्यों नहीं स्टेशन का नामकरण किया गया? क्या नेताजी सुभाष पैलेस और वजीर पुर एक साथ नहीं सुरक्षित रह सकते थे. पुरानी दिल्ली स्टेशन के बजाय हमने चांदनी चौक का नामकरण आखिर किस उद्देश्य से किया ? आखिर क्यों एक तरह की संवेदना और समझ दूसरी जगहों पर निष्क्रिय हो जाती है? यह हमारे भीतर पूर्वाग्रहों को टटोलने की जरूरत जताता है.

इसी तरह कालका जी इलाके का नाम है और नामकरण कालकाजी मंदिर के नाम पर किया गया. क्या हमें नहीं लगता है कि कालका जी का नामकरण ही हमारे समाज के लिए बेहतर होता? आखिर कालका जी मंदिर के नामकरण के पीछे क्या उद्देश्य है? मैं यहां यह भी साफ करना चाहता हूं कि अक्षरधाम के पास के स्टेशन का नामकरण इसके नाम पर किया गया.वहां शायद कोई और प्रसिद्ध जगह नहीं हो. मैं समझता हूं कि समाज में कई तरह के लोग है और उनकी मानसिकता विभाजनकारी है. नामकरण के समय उनकी सक्रियता बढ़ जाती है और मैं यह कई स्तरों पर ऐसे लोगों और संगठनों की सक्रियता के मद्देनजर कह रहा हूं. ऐसे लोगों को लगता है कि उनकी सांस्कृतिक लड़ाई का आधार ऐसे ही नामकरणों से तैयार होता है.

मैं दरअसल ये सारे सवाल केवल नामकरणों को लेकर ही खड़ा नहीं करना चाहता. आपके संस्थान द्वारा अंग्रेजी से जो हिन्दी के अनुवाद प्रसारित किए जाते है, वे चाहे लिखने में हो या बोलने में हो, उनकी भाषा के प्रति भी आपको संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिए. दूरी का ध्यान रखें- केवल अंग्रेजी के जिस वाक्य के लिए इस तरह के अनुवाद किए गए हैं उन पर गौर करें. आप स्टेशन पर उतरने वाले यात्रियों को सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं. लेकिन हिन्दी में ये किस अर्थ के साथ संप्रेषित हो रहा है? क्या हिन्दी के अनुवादों के साथ उसके अर्थ को समझा जा सकता है?

हिन्दी में एक अनुवादकों की वह धारा है जो संकीर्णतावादी है. वह सृजनशील नहीं है. उसके पूर्वाग्रह इतने जड़ है कि वह इस उद्देश्य में यकीन नहीं करता है कि अपनी भाषा के जरिये एक अर्थ संप्रेषित करना है. उसकी संवेदना में जनमानस होता ही नहीं है. आपको जन अनुवादकों की जरूरत है. लेकिन अनुवादक ही आपको क्यों चाहिए? भारतीय भाषाओं की सृजनशीलता को आप लोगों से संवाद स्थापित करने के लिए क्यों नहीं उपयोग करते हैं. अंग्रेजी की मानसिकता से भारतीय जनमानस के साथ संवाद करने की प्रेरणा ही सांस्कृतिक घपलेबाजी मूल में हैं. मैं आपसे अपील करता हूं कि आप सांस्कृतिक पहलूओं पर ध्यान दें.

एक मैट्रो यात्री

10.06.2010, 19.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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