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मौत के सौदागर: हम, आप और सरकार

बात बोलेगी

 

मौत के सौदागर: हम, आप और सरकार

कृष्ण राघव


आपको पता है कि हमारे देश का सबसे बड़ा शौक क्या है?...हॉबी...हॉबी! जी नहीं जो आप सोच रहे हैं, वह नहीं है. आप जो कुछ भी सोच रहे हैं वह घटिया लोगों का काम है. इसे कोई हॉबी कहते हैं? अरे भाई हम हिंदुस्तानी हैं. हमारा सात हजार साल पुराना इतिहास है. हम से ऊंचा कौन ? सो भैया ऊंचे लोग, ऊंची पसंद. अब समझे आप? जी गुटखा, तम्बाखू, सिगरेट, बीड़ी, फर्शी, हुक्का, चिलम और सुल्फा वगैरह वगैरह...!

smoking

एक डाक्टर ने मरीज से कहा- “सिगरेट, बीड़ी छोड़ दो, तुम्हारे लिए खतरनाक है.” मरीज ने तत्काल छोड़ दी. डाक्टर ने अगली बार उसे शाबासी दी- “बिल्कुल छोड़ दिया न!” उसने तसल्ली करनी चाही.

“जी बिल्कुल”, मरीज ने कहा- “बस थोड़ा-सा गुटखा खा लेता हूं.”

अगली बार यह थोड़ा-सा भी सुबह छह बजे शौच जाने से पहले से लेकर दूसरे दिन छह बजे तक का हो गया. केवल खाना खाते समय मजबूरन बाहर निकालना पड़ता वरना तो सोते समय भी एक गाल फूला ही रहता. मानों दिन भर चने चबा रहे हों. सिर्फ भगवान का मंदिर छोडकर जहां चाहें, पीक मार दें. न मुंह की सफाई, न गली-मुहल्ले, मकान और सडक़ों की. सरकारी कार्यालय, सीढिय़ां, बरामदे, कमरों के कोने सब इसी माडर्न आर्ट की कृतियों से सजे रहते हैं.

खमीरेदार तम्बाकू के भी न जाने कौन-कौन से नंबर हैं और कौन-कौन से ब्रांड. सरकार जानती है कि तम्बाकू खतरनाक है. आदमी का दुश्मन नंबर-1, फिर भी इसके उत्पादन से सरकार को आमदनी होती है. तैयार तम्बाकू, गुटखे और सिगरेट-बीड़ी से अंधाधुंध पैसा मिलता है सो चलता है...आदमी मरता है, मरता रहे, कैंसर हो चाहे और कुछ. सरकार को पैसा तो मिलना ही चाहिए. खासतौर पर यदि उत्तरप्रदेश और बिहार के संतरी से लेकर मंत्री तक पर आप नजर डालें तो बिना बात किसी को बोलने की जरूरत ही नहीं पड़ती. इधर भी मुंह में पिक और उधर भी. खाली ऊं-ऊं से ही काम चल जाता है. बिहार-यूपी का नाम लिया तो यों न समझें कि बाकी दूध के धुले हैं. पंजाब में जरूर यह अलामत, सरदारों के कारण, कुछ कम हो सकती है वरना जहां तम्बाकू नहीं, वहां बीड़ी है, सिगरेट है, सिगार है, पाइप है. कुछ नहीं तो हुक्का-चिलम है. पर सारे भारत की नजर किसी न किसी रूप से तम्बाखू पर ही टिकी हुई है. सरकार तो खैर चाहती भी नहीं कि यह बात खत्म हो, सो आंकड़ों से अपनी आंखे मूंदे पड़ी रहती है. बल्कि यह कितनी बड़ी विडंबना है कि नेतागण खुद ही इस नशे गटक रहते हैं.

कुछ भी मांगने में व्यक्ति को शर्म मालूम होती है पर तम्बाकू कहीं भी, किसी से भी मांगा जा सकता है. देने वाला खुशी-खुशी देता है बल्कि अपने आपको भाग्यवान समझता है कि किसी ने उससे तम्बाकू मांगा. दूसरी ओर शायद यह देखकर उसे खुशी होती है कि मरने वालों में वह अकेला नहीं है. बल्कि एक और भी उसके साथ है.

इसी तरह रेल में, बस में, हवाई जहाज में, मीटिंग में, पार्टी में गरज कि कहीं भी, किसी से भी आप मांग लीजिए, मिलती है. देने वाला धन्य होता है, कृतार्थ होता है. मांगने वाला ऊंचे ओहदे का हो और देने वाला मामूली तब तो मामला और भी शानदार हो जाता है. छोटे को बड़े की नजर में बड़ा बनने का खूबसूरत मौका मिलता है. लानत है!

एक बार इंसान शराब पीए तो भी इतना और ऐसा नुकसान न हो, जैसा तम्बाकू से होता है. साधारणत: व्यक्ति ने शराब शाम को ली, रात तक नशा रहा, सो गया, उतर गया! यह नशा तो कम्बख्त उतरता ही नहीं. या तो तम्बाकू हर वक्त नीचे या उपर वाले होंठ के नीचे दबा रहता है. और नशा गले से होकर शिराओं में रिसता रहता है. या फिर गुटखा गाल में दबा रहता है, या सिगरेट का धुंआ इकट्ठा होता जाता है या अब कहां तक गिनाएं. इतना ही कह सकते हैं कि तम्बाकू का नशा तो तम्बाकू लेने वाला उतरने ही नहीं देता. उतरने लगता ही है कि एक और चुटकी ले लेता है या एक और पाउच या एक और बीड़ी-सिगरेट या चिलम. हर हालत में यह नशा नाड़ियों को सुन्न किए रहता है. नींद-सी आई रहती हैं. जबान मोटी हो जाती है. स्वाद के जो ठिकाने जबान पर होते हैं, वे भी सुन्न पड़ जाते हैं. नतीजा यह होता है कि बोलने की रफ्तार मद्धम हो जाती है और स्वाद फीके हो जाते हैं. रही बात आंकड़ों की तो वह भी हम प्रस्तुत करने का प्रयास करते हैं. शायद किसी एक कान में तो यह भनक पड़ी ही जाए कि कोई कुछ भी कहे, तम्बाकू का सेवन अहितकर ही है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

सचिन रौथाण [sachinrauthan96@gmail.com] ग्राम-थल्दा, सतपुली, पौडी गढवाल, उत्तराखंड । - 2013-12-12 11:35:39

 
  महोदय,मैँ 12वीँ का छात्र हूँ । आपके विचार ,आपका लिखा मुझे बहुत पसंद आया ,जो कि बिल्कुल सही है । मैं पूरा प्रयास करूँगा कि आपका जनहित मेँ यह संदेश सब तक पहुँचा सकूँ । 
   
 

nirmal singh [] italy - 2011-06-25 17:34:41

 
  आपने तंबाकू पर बहुत सुंदर लिखा है. तंबाकू खाने वालों का वाकई यही हाल है. मैं तो सरकार के रव्वैये के खिलाफ हूं. मेरा मानना है कि सरकार को इसके उत्पादन पर रोक लगाना चाहिये.  
   
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