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अमरनाथ की आग | राम पुनियानी

विचार

 

अमरनाथ की आग

 

राम पुनियानी

 

कश्मीर के बारामूला में पुलिस गोली चालन में पांच व्यक्तियों की मौत अत्यंत दु:खद है. सरकार का जम्मू कश्मीर में शांति व सौहार्द की पुनरस्थापना के लिए वहां सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ले जाने का निर्णय स्वागत योग्य तो है परंतु इस कदम को उठाने में बहुत देरी हुई है.

अमरनाथ यात्रा संघर्ष समिति के आंदोलन के चलते कश्मीर घाटी का रास्ता बंद हो गया है और जम्मू क्षेत्र में रहने वाले कश्मीरियों पर हमले हो रहे हैं. आंदोलन की शुरुआत घाटी में हुई थी. अब घाटी के लोग ही परेशान हैं. उन तक आवश्यक सामग्री का पहुंचना संघर्ष समिति के आंदोलन के कारण रुक गया है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.

बिना सोच-विचार कर लिए गए निर्णयों की श्रृंखला का नतीजा यह है कि कई दशकों की मेहनत से स्थापित की गई शांति के हिंसा और अव्यवस्था में बदल जाने का खतरा पैदा हो गया है.


अमरनाथ यात्रा कश्मीर घाटी की प्रमुख धार्मिक-पर्यटन गतिविधियों में से एक है. इस यात्रा का संचालन स्थानीय नागरिकों-जिनमें मुस्लिम बहुसंख्यक थे- द्वारा किया जाता था. सन् 2001 में ''श्री अमरनाथ श्राईन बोर्ड'' का गठन किया गया और ठीक-ठाक चल रही व्यवस्थाओं को बोर्ड के हवाले कर दिया गया. बोर्ड के अध्यक्ष राज्य के राज्यपाल थे व राज्यपाल के प्रमुख सचिव इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी थे.

शनै: शनै: बोर्ड अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करने लगा और वे काम भी करने लगा जो उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं थे. बोर्ड का अध्यक्ष राज्यपाल होने से उसे कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था. बोर्ड ने पहलगाम गोल्फ कोर्स पर निर्माण कर डाला. सन् 2005 में, नियमों के विपरीत, बोर्ड को यात्रियों के उपयोग के लिए वन भूमि के इस्तेमाल की इजाजत दे दी गई.

मजे की बात यह है कि बोर्ड की इस गैर-कानूनी मांग को मंजूरी देने वाली वन अधिकारी, बोर्ड के सी. ई. ओ. की पत्नी थीं. इस इजाजत से ही उस प्रक्रिया की शुरुआत हुई जिसके गंभीर नतीजे आज हमारे सामने हैं. राज्य सरकार ने शुरु में वन विभाग के इस निर्णय को गलत ठहराया परंतु हाईकोर्ट ने सरकार के निर्णय पर रोक लगा दी. इसके बाद राज्य सरकार दबाव में आ गई और उसने उक्त भूमि बोर्ड को अंतरित कर दी. बाद में यह अंतरण रद्द कर दिया गया.

बिना सोच-विचार कर लिए गए निर्णयों की श्रृंखला का नतीजा यह है कि कई दशकों की मेहनत से स्थापित की गई शांति के हिंसा और अव्यवस्था में बदल जाने का खतरा पैदा हो गया है.

यह जानना दिलचस्प होगा कि अमरनाथ यात्रा- हमारे देश के कई अन्य धार्मिक आयोजनों की तरह- भारत की मिली-जुली संस्कृति का प्रतीक है. अमरनाथ गुफा की खोज एक मुस्लिम चरवाहे मालिक ने सन् 1850 के दशक में की थी. इसी के बाद से अमरनाथ यात्रा की शुरुआत हुई. मालिक परिवार के सदस्य सन् 2001 तक यात्रा के इंतजामात से जुड़े थे. यात्रा का प्रबंध श्राईन बोर्ड के हाथों में आते ही बोर्ड ने पूरी यात्रा और उसके प्रबंधन को भगवे रंग में रंगना शुरु कर दिया. यात्रा का पूरे देश में जमकर प्रचार-प्रसार भी किया गया और नतीजे में तीर्थयात्रियों की संख्या में भारी उछाल आया.

जहां सन् 1989 में अमरनाथ यात्रियों की संख्या 12 हजार थी वहीं सन् 2007 में 4 लाख से ज्यादा श्रध्दालुओं ने यात्रा में भाग लिया. जहां पहले यात्रा साल के केवल दो सप्ताहों में संपन्न की जाती थी, अब इस अवधि को बढ़ाकर दस सप्ताह कर दिया गया है. इस सबका विपरीत पर्यावरणीय प्रभाव साफ दिखलाई पड़ रहा है . सैकड़ों टन मानव विष्ठा और प्लास्टिक और पोलीथीन के कचरे ने निकट की अदिव्तीय रुप से सुंदर लिङ्ढर नदी को एक गंदे नाले में बदल दिया है.

कुछ वर्ष पहिले पर्यावरण प्रदूषण ही शिवलिंग के पिघलने का कारण भी बना था और उस पर सूखी बर्फ डालकर उसके अस्तित्व को तीर्थयात्रियों के दर्शन के लिए बचाए रखा गया था. जहां भाजपा एक तरफ पर्यावरण सुरक्षा के नाम पर तीर्थयात्रियों की संख्या सीमित रखने की मांग कर रही है (150 यात्री प्रतिदिन) वहीं दूसरी ओर यात्रा का आक्रामक ढ़ंग से प्रचार कर यात्रियों की संख्या में वृध्दि करने में योगदान दे रही है. इससे क्षेत्र के पर्यावरण को अपूरनीय क्षति होगी. इन सब मुद्दों से बेरखबर अमनाथ श्राईन बोर्ड यात्रियों की संख्या बढ़ाने और अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करने में जुटा हुआ है. राज्यपाल के अध्यक्ष होने का लाभ उठाकर बोर्ड ने पहलगाम विकास प्राधिकरण के द्वारा किए जाने वाले कार्यों को भी खुद ही करना शुरु कर दिया है.

श्राईन बोर्ड को जमीन अंतरित करने के सरकार के आदेश से पहले से ही तनाव और आतंक ग्रस्त घाटी के मुसलमानों में भय की एक नई लहर फैल गई. उन्हें यह डर था कि इस भूमि पर हिन्दुओं को बसाकर घाटी के मुस्लिम-बहुल चरित्र को बदलने का प्रयास किया जाएगा.

देश में कभी भी किसी धार्मिक स्थल को वनभूमि नहीं दी गई है और न ही कहीं मंदिरों के ट्रस्टों या दरगाहों के प्रबंधन बोर्डों का राज मंदिर या दरगाहों की सीमाओं के बाहर चलने दिया गया है.


इस भय कर एक कारण यह भी था कि कुछ वर्ष पहिले तत्कालीन इजरायली विदेशमंत्री शिमोन पैरेस ने भाजपा नेता एल. के. आडवानी को सार्वजनिक रुप से ऐसा करने की सलाह दी थी. उन दिनों आडवानी देश के गृह मंत्री थे.

घाटी के स्वस्फूर्त विरोध प्रदर्शनों का लाभ हुरियत कांफ्रेस के कट्टरवादी धड़े के नेताओं ने उठाया. सैयद अली शाह गिलानी ने विरोध को अलगाववादी प्रदर्शनों में बदल दिया. गिलानी द्वारा अक्टूबर में होने वाले चुनावों के बहिष्कार करने के आव्हान ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है.

यह सचमुच बहुत विंडबनापूर्ण है कि कश्मीर-जो भारतीय संस्कृति की विविध धाराओं का शानदार संगम है- आज इस मुकाम पर पहुंच गया है. कश्मीरियत में वेदांत के मूल्य, सूफी संतों की शिक्षाएं और गौतम बुध्द के अंहिसा के सिद्धांत शामिल हैं. कश्मीर साठ वर्ष पहिले भारत में सम्मिलित होने के लिए राजी हुआ था. इन साठ वर्षों में विलय की संधि की सभी शर्तों का जमकर उल्लंघन हुआ है. हर समस्या का समाधान सेना के जरिए ढूढ़ने की कोशिश की गई. यह कितना दु:खद है कि सेना, जिसका काम हमें बाहरी शत्रुओं से बचाना है, कश्मीर में भारत सरकार की नीतियों को लागू करने का एक मात्र प्रभावी तंत्र है. हमें इस विषय पर गंभीरता से आत्म चिंतन करना होगा.

जम्मू के लोगों की समस्याओं को भी बरसों से नजरअंदाज किया जाता रहा है. कोई आश्चर्य नहीं कि जम्मू के लोग यह मानने लगे हैं कि केन्द्र सरकार केवल घाटी की भलाई के बारे में चिंतित रहती है. जम्मू क्षेत्र की समस्याओं को सुलझाने के लिए गंभीर प्रयत्न किए जाने चाहिए.

अलगाववादी तत्वों की भड़काऊ हरकतों और साम्प्रदायिक तत्वों की राजनीति से मुकाबला करने का एकमात्र तरीका यह है कि बंदूक की नहीं मेल-मिलाप की भाषा में बात की जाए, समाज के असंतुष्ट हिस्से के साथ रचनात्मक बातचीत के रास्ते निर्मित किए जाएं और शांति वापिस लाई जाए. अतीत में हुई गल्तियों पर पर्दा डालने की बजाए उन्हें स्वीकार किया जाए. देश में कभी भी किसी धार्मिक स्थल को वनभूमि नहीं दी गई है और न ही कहीं मंदिरों के ट्रस्टों या दरगाहों के प्रबंधन बोर्डों का राज मंदिर या दरगाहों की सीमाओं के बाहर चलने दिया गया है. अमरनाथ श्राईन बोर्ड तो मानो अमरनाथ यात्रा के पूरे मार्ग को अपनी जागीर समझने लगा था.

कश्मीरियत यदि वापिस आएगी तो अपने साथ शांति, सौहार्द और सामाजिक-आर्थिक उन्नति भी लाएगी. कश्मीरियत को वापिस लाने के लिए जो भी जरुरी हो, किया जाना चाहिए.

 

26.08.2008, 03.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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