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ग़ज़ल उसने छेड़ी...

बात बोलेगी

 

ग़ज़ल उसने छेड़ी...

कृष्ण राघव


कल ही खबर आई कि मानसून ने दस्तक दे दी है! ये बारिश का मौसम भी अजीब शय है. न जाने कैसी-कैसी रंगीनियों को पैदा करता है. बारिश हो, शाम हो, महफ़िल हो और अचानक कोई गा उठे-

गजल

‘‘शाम थी, तुम थे मैंने छेड़ी थी ग़ज़ल,
खिल उठे मुस्कुराहटों के कंवल ’’

ग़ज़ल के ये कंवल पहले पहल खिलाने वाले का नाम है अबुल हसन रूदकी. यह लगभग ग्यारह सौ साल पुरानी बात है. अमीर-ए-बुखारा के यहां यह एक रूदक नाम का वाद्य बजाता था, जो सारंगी से मिलता-जुलता होता है. सो दुनिया का पहला ग़ज़ल गो संगीतज्ञ भी था.

हुआ यों कि बादशाह ने दुश्मन पर हमला किया, जीत गया, जगह घेर ली, सब हो गया मगर फ़ौज लेकर जो पड़ा, सो वहीं रह गया, टले ही नहीं. अब फ़ौजियों को वतन याद आने लगा. बीवियों के सपने सताने लगे. अबुल हसन रूदकी मोर्चे पर अमीर-ए-बुखारा का रूदक बजाकर मन बहलाया करता था, सो उसका मुंहलगा भी था. सारे फ़ौजियों ने इसी ख़ातिर अपना दुखड़ा उसी को सुनाया. रूदकी ने उसी रात दुनिया की पहली ग़ज़ल कही, जिसमें बारह शे’र थे.

अगले दिन अलस्सुबह जब वह बादशाह को रूदक सुनाने गया तो साथ ही साथ भाव-विभोर होकर अपनी कही ग़ज़ल भी गाता गया, जिसमें इश्क, हिज्र, बेगमात के दर्द वग़ैरह का पुरसोज़ बयान था.

बादशाह सलामत अमीर-ए-बुखारा पर इस ग़ज़ल का ऐसा रंग चढ़ा कि फ़ौरन घोड़ा तलब किया और बग़ैर जूते पहने ही कूच कर दिया. सो यह है ग़ज़ल की तासीर. अलफ़ाज़ के फूल मौसिक़ी के हार में पिरोये जाते हैं. इस संगीत का एहसास ग़ज़ल कहने वाले में, जितना गहरा और नाजुक होगा, उतना ही ग़ज़ल में रंग चोखा आएगा.

मौसिक़ी के हार में, ग़ज़ल के अशआर को, जिस धागे के ज़रिये पिरोया जाता है उसका नाम है रदीफ़. हर शे’र के आख़िर में क़ाफ़िया और रदीफ़ ज़रुर होते हैं. जैसे- ‘दिले नादां तुझे हुआ क्या है’ में ‘क्या है’ रदीफ़ है. रदीफ़ अगर लंबी हो तो शायर का क़ाफ़िया तंग हो जाता है क्योंकि कुछ और कहने के लिए जगह नहीं बचती.

इसके अलावा आवाज़ें नर्म हों, इशारों में बाते हों (लट्ठमार खुली या बरहना नहीं) ग़ज़ल का हर शे’र अपने आप में पूरी तरह मुक्म्मल होता है. मानों एक-एक शे’र शायर के किसी तजुर्बे की आत्मकहानी होता है. मिज़ाज में इसके एक हल्की-सी नग़्मगी रहती ही है.

ईरान में ग्यारह सौ बरस पहले जन्मी शायरी की यह नस्ल आर्यों की ही देन है. अच्छी से अच्छी ग़ज़लें फ़ारसी और तुर्की में कहीं गई लेकिन हिंदुस्तान में इसे अलग ढंग से ही संवारा गया. यहां यह तक़रीबन चार सौ साल पहले उर्दू की ‘दकनी’ शकल में आई. बाद में इसमें गुजराती और मालवी जैसी भाषा-बोलियों के अलफ़ाज भी घुल गए. जैसे ‘सजन’ और ‘सेती’ वग़ैरह.

शायर ‘वली दकनी’ फ़रमाते हैं—
‘‘दिल 'वली' का ले लिया दिल्ली ने छीन, जा कहो कोई मुहम्मद शाह सूं।’’

इस तरह ग़ज़ल ने दिल छीनना शुरू किया. वैसे उस वक्त के शरीफ़ लोग (इलीट) तो शे’र फ़ारसी में ही कहते थे जैसे कि आज भी ‘इलीट’ इंग्लिश में ही लिखना चाहता है. फिर भी धीरे—धीरे दिल्ली के बाज़ारों में इसका चलन हुआ और यह आम इंसान के हाथ लग गई. सूफ़ियों और ख़ानक़ाहों के यहां पलने लगी. उर्स और मेलों में गाई जाने लगी. शोहरत इसकी ऐसी बढ़ी कि जल्द ही दरबार में बुला ली गई और हरम में बेगम साहिबान का दिल जीत लिया. सो आम-फ़हम से बेगम हो गई. बेगम साहिबान जैसी ही साफ, धुली और सजी हुई ज़बान भी इसने अपना ली. फिर क्या था, बादशाहों और शहज़ादों ने भी ग़ज़ल कहनी शुरू कर दी. सो इसका रूतबा ऐसा बढ़ा कि ‘ स्टेटस सिंबल’ बन गई.

फिर जब दरबार उजड़े, लड़ाइयां हुई और रियासतें गईं तो बिचारी फिर अपने मायके लौट आई यानी सूफ़ियों और ख़ानक़ाहों आश्रमों में, जहां ये पली थी. वहीं फिर परवान चढ़ी, ग़रीब की बेटी...सिर्फ़ तीन ही साज़ मिले इसे- सारंगी,तबला और ढोल. फिर से उर्स वग़ैरह की ज़ीनत बनी. बाद में जब अमन, क़ायम हुआ और शहर फिर से आबाद हुए तो कोठों पर चढ़ गई. कॉमर्शियल हो गई. खूब धूम मची. कोठों पर सबकी पहुंच न थी, सो मंच और नाटक की चीज़ बनी. आगा हश्र कश्मीरी के पारसी थियेटर में संवादों के बीच में ग़ज़लें भी पिरोई गईं.

ज़ाहिर है, इन ग़ज़लों को दृश्य और संवाद से तालमेल रखना जरूरी था. उसी से प्रभावित होकर बाद में फ़िल्मों के दृश्य भी ग़ज़लों से सजने लगे. ड्रामें में ग़ज़ल गाने वाले और वालियां रौशन चौकी में भी शामिल होते थे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Neha Pandit [nehasathibhopal81@gmail.com] Bhopal - 2011-06-14 21:52:01

 
  Abul Hasan Rudakai was born near Penjikent, Arab in 884. He died in 954.Rudaki was one of the great poet of the Saman dynasty. He is especially famous for his simple but moving juyi muliyan song, which he composed and sang in the presence of his patron Amir Nasar-|| of Khurasan.. 
   
 

Ajay Sen Gupta [ajaysengupta@gmail.com] Kanpur - 2011-06-14 21:42:13

 
  I am not agree with you regarding History of ghazal. According to K. C. Kanda, Ghazal originated in Iran in the 10th century A.D. It grew from the Persian qasida, which in verse form had come to Iran from Arabia. The qasida was a panegyric written in praise of the emperor or his noblemen. The part of the qasida called tashbib got detached and developed in due course of time into the ghazal. Whereas the qasida sometimes ran into as many as 100 couplets or more in monorhyme, the ghazal seldom exceeded twelve, and settled down to an average of seven. Because of its comparative brevity and concentration, its thematic variety and rich suggestiveness, the ghazal soon eclipsed the qasida and became the most popular form of poetry in Iran.
The ghazal came to India with the advent and extension of the Muslim influence from the 12th century onwards. The Moghuls brought along with them Iranian culture and civilization, including Iranian poetry and literature. When Persian gave way to Urdu as the language of poetry and culture in India, the ghazal, the fruit of Indo-Iranian culture, found its opportunity to grow and develop. Although the ghazal is said to have begun with Amir Khusro (1253-1325) in Northern India, Deccan in the South was its real home in the early stages. It was nursed and trained in the courts of Golconda and Bijapur under the patronage of Muslim rulers. Mohd. Quli Qutab Shah, Wajhi, Hashmi, Nusrati and Wali may be counted among its pioneers. Of these, Wali Deccany (1667-1707) may be called the Chaucer of Urdu poetry. Wali\\\'s visit to Delhi made in 1700 acquires a historic significance. This visit was instrumental in synthesizing the poetic streams of the South and the North. Wali\\\'s poetry awakened the minds of the Persian-loving North to the beauty and richness of Urdu language, and introduced them to the true flavor of ghazal, thus encouraging its rapid growth and popularity.
 
   
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