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भ्रष्टाचार करो, सहो, लड़ो मत

बहस

 

भ्रष्टाचार करो, सहो, लड़ो मत

विष्णु राजगढ़िया


अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन ने राजनेता-नौकरशाह-कारपोरेट गंठजोड़ की खुली लूट पर गंभीर सवाल उठाये हैं. ये ऐसे सवाल हैं, जो लंबे समय से भारतीय राज-समाज को मथ रहे हैं.

अन्ना हजारे

इन बुनियादी सवालों को उठाने की हिम्मत और हैसियत किसी राजनीतिक दल के पास नहीं. इसीलिए ऐसे सवाल अब सिविल सोसाइटी, एनजीओ और बाबा टाइप लोग उठा रहे हैं. कांग्रेस और उसका चाटुकार मीडिया उन सवालों पर चर्चा के बजाय सवाल उठाने वालों पर ही चर्चा केंद्रित करके बचाव का रास्ता ढूंढ़ रहा है.

जो लोग यह कह रहे हैं कि राजनीति के बजाय अन्ना जैसों को समाजसेवा और बाबा जैसों को धरम-करम और योगा में सिमटे रहना चाहिए, उन्हें यह एहसास नहीं कि राजनीतिकों के प्रति भारतीय जनमानस में आम तौर पर और नयी पीढ़ी में खास तौर पर कितनी गहरी अनास्था और घृणा व्याप्त है. विकल्प की तलाश सबको है और कोई विकल्प देने में लेफ्ट से राइट और मध्यमार्गियों तक सब किस कदर अप्रासंगिक हो चुके हैं. रामदेव के पीछे लाखों लोगों के हुजूम और अन्ना हजारे के मंच से राजनेताओं को खदेड़े जाने का मतलब भी यही है.

आज उठे सवालों पर सोचने और शर्मसार होने के बजाय कांग्रेस और उसके चाटुकारों के जवाबी हमलों से यह साबित हुआ है कि भ्रष्टाचार करना जितना आसान है, भ्रष्टाचार से लड़ना उतना ही मुश्किल. कांग्रेस और मीडिया के इस प्रहार का मूलमंत्र है- भ्रष्टाचार करो, भ्रष्टाचार सहो, इससे लड़ो मत.

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव कभी शासकों को बहुत प्यारे हुआ करते थे. प्रणव मुखर्जी के नेतृत्व में चार केंद्रीय मंत्रियों ने एयरपोर्ट पर बाबा रामदेव के सामने साष्टांग दंडवत करके इसका एहसास भी कराया. बाबा रामदेव का आंदोलन खत्म कराने के लिए कांग्रेस ने क्या गुपचुप समझौता किया, यह एक अलग अध्याय है. लेकिन जब रामदेव ने काला धन और भ्रष्टाचार पर तीन दिनों के तथाकथित तप के नाम पर जनजागरण की जिद नहीं छोड़ी तो कांग्रेस सरकार और उसके मीडिया ने बाबा रामदेव की जो दुर्गति की, वो सबके लिए सबक है.

रामदेव की संस्था ने अरबों की संपत्ति बनायी. अन्ना टीम के सदस्य एडवोकेट शांति भूषण ने भी करोड़ों की जायदाद जुटायी. यह उन्होंने एक दिन में या आज नहीं किया. लेकिन इस पर सवाल तब तक नहीं उठे, जब तक कि ये लोग अपना संपत्ति-साम्राज्य बनाने में जुटे रहे. ये इसी धंधे में जुटे रहते तब भी इन पर सवाल नहीं उठते. इन पर सवाल तब उठे, जब इन्होंने भ्रष्टाचार, काला धन और सत्ता-शीर्ष पर बैठे लोगों के लिए असुविधाजनक सवालों पर नागरिकों को सचेत और एकजुट करना शुरू किया.

अगर अन्ना-बाबा का आंदोलन नहीं होता, तो रामदेव को अपने ट्रस्ट का खजाना भरने की छूट थी. उनके सहयोगी बालकृष्ण को तथाकथित फरजी पासपोर्ट का उपयोग करने से भी कोई नहीं रोक रहा था. शांतिभूषण भी अपने आर्थिक साम्राज्य के विस्तार को स्वतंत्र थे. इन सबको अचानक सवालों के घेरे में लाकर शासक वर्ग ने साफ संदेश दिया है- हर कोई अपनी औकात में रहते हुए भ्रष्टाचार की मूल धारा में इत्मिनान के साथ गोते लगाता रहे. जिस किसी ने इस मूल धारा के विपरित जाने या इसमें बहते हुए इसके विपरित धारा बहाने की कोशिश की, उसकी खैर नहीं.

कोई आश्चर्य नहीं यदि किरण बेदी से लेकर अन्ना टीम के अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसौदिया जैसे लोगों को भी ठिकाने लगाने के लिए जल्द ही कोई शिगूफे छोड़ दिये जायें. कांग्रेस और मीडिया के प्रहार का साफ संदेश है कि जो कोई भी ऐसे आंदोलनों में आगे आयेगा, उन्हें उनके ही इतिहास के पन्नों में धकेल दिया जायेगा.

जो लोग अन्ना और रामदेव के आंदोलन की तथाकथित असफलता से खुश हैं, उन्हें मालूम होना चाहिये कि यह इस देश में गांधीवादी सत्याग्रही आंदोलनों की ताबूत में आखिरी कील साबित होगी. इसके बाद का रास्ता सिर्फ व्यापक जनविद्रोह, अराजकता या हिंसक संघर्षों की ओर ही ले जायेगा.

प्रसंगवश, हताशा में रामदेव द्वारा शास्त्र के साथ शस्त्र का भी प्रशिक्षण देने के बयान पर उठा बवाल भी कम दिलचस्प नहीं. रामदेव के इस बयान को उसके प्रसंग से काटकर हाय-तौबा के अंदाज में पेश करने में चाटुकार मीडिया ने कोई कसर नहीं छोड़ी. एक दिग्गज चाटुकार ने तो बिहार की जातिवादी निजी सेनाओं के अनुभवों और इतिहास से जोड़कर लंबा-चौड़ा मूर्खतापूर्ण विश्लेषण लिख मारा, जिसे एक राष्ट्रीय दैनिक ने संपादकीय पेज की शोभा बनाया.

जबकि सबको मालूम है कि बाबा रामदेव भारतीय राज-व्यवस्था के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष छेड़ने वाली कोई सेना बनाने की बात नहीं कर रहे थे. वह तो बस दिल बहलाने के लिए और पूरी सदाशयता के साथ ऐसे नौजवानों को तैयार करने की बात कर रहे थे, जो किसी को पीटें नहीं तो किसी से पिटें भी नहीं. उनके सपनों की इस सेना का हथियार उसके मनोबल और योग से बनी देह के सिवाय शायद ही कुछ हो.

लेकिन इस पर मची हायतौबा के बीच केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने साक्षात लौहपुरूष की तरह घोषणा कर दी कि रामदेव ने ऐसा कुछ किया तो उससे हम फौरन निपटेंगे. ऐसी गर्वोक्ति करते वक्त चिदंबरम यह भूल गये थे कि भारतीय राजव्यस्था को उखाड़ फेंकने के नाम पर ऐसी हथियारबंद सेनाएं पूरे इत्मिनान के साथ दंतेवाड़ा से पलामू तक अपना माओवादी साम्राज्य चला रही हैं. उन इलाकों में घुसने और उनसे दो-दो हाथ आजमाने की कोई योजना, हैसियत या इच्छाशक्ति न तो केंद्र के पास है और न ही संबंधित राज्यों के पास.

इससे यह भी साबित हुआ कि अगर आप वाकई कोई हथियारबंद सेना बनाकर बगावत पर उतरे हों, तो शासन को भीगी बिल्ली की तरह बैठे रहने में कोई शर्म नहीं. लेकिन अगर आप आत्मरक्षार्थ कोई सत्याग्रही सेना की बात भी करें तो चिदंबरम और उनके कलमबंद सैनिक आप पर टूट प़ड़ेंगे. ठीक उसी तरह, जैसे आप भ्रष्टाचार करें, भ्रष्टाचार सहें तो आपकी वाह-वाह, इससे लड़ें तो आप ही निशाने पर होंगे.

अन्ना और रामदेव के आंदोलनों का हश्र चाहे जो हो, इस बहाने कई बुनियादी सवालों ने भारतीय जनमानस में गहरी पैठ तो जरूर जमा ली है. आम तौर पर राजनीति को गंदी चीज समझकर इससे दूर रहने को अभ्यस्त जनमानस के बड़े हिस्से खासकर नौजवानों ने गैर-राजनीतिक तरीके से ही सही, राजनीति के कुछ गूढ़ मंत्र भी समझ लिये हैं. इससे शायद अब भारतीय राजनेता-नौकरशाह-कारपोरेट गठजोड़ को अपनी मनमानी को पहले के तरीकों से जारी रखना आसान नहीं होगा. उन्हें शोषण के और बेशक दमन के भी नये-नये तरीके अपनाने होंगे. ठीक उसी तरह, जैसे जनता भी लड़ने के नये-नये तरीके सीख रही है.

कौन जाने वर्ष 2011 को एक बड़े सबक के ऐतिहासिक दौर के बतौर याद किया जाये. कम-से-कम गांधीवादी सत्याग्राही आंदोलनों की सीमा उजागर करने के लिए तो अवश्य ही.

11.06.2011, 13.33 (GMT+05:30) पर प्रकाशित