पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >कृष्ण राघव Print | Share This  

इन्हें भी एक कंधा चाहिए...

बहस

 

इन्हें भी एक कंधा चाहिए...

कृष्ण राघव


कई महीनो से यह एक मुअम्मा (रहस्य) था कि सीटी बजाता कौन है ? यह सीटी सबेरे पांच बजे बजनी शुरू होती है. वैसी ही जैसी जीभ के नीचे दो उंगलियां रखकर गली के लड़के बजाया करते हैं. लंबी—लंबी सीटियां सुबह पांच बजे से साढ़े पांच—छ: बजे तक, रोज. हमारी बिल्डिंग में कई लोग सोचने लगे कि सीटियां बजाता कौन है, और क्यों ? हमारे चारों तरफ झोपड़—पट्टियां काफी हैं, सोचा गया कोई जरायम पेशा तो नहीं है!

madman

कुछ लोगों ने पुलिस की बात भी सोची कि रिपोर्ट तो कर ही दें, पता नहीं कब क्या हो जाये ! किंतु पिछले हफ्ते यह रहस्य सुलझ गया.

मैं जब टहलने निकल रहा था तो क्रमश: सीटी की आवाज, पास और पास आती गई. आज एक और रहस्य भी खुला कि सीटी की आवाज के साथ ही कोई व्यक्ति तेजी से कुछ बोलता भी जा रहा था. फिर देखा कि सामने से एक भरे बदन वाला अधेड़ व्यक्ति मोटी—मोटी मूंछे ,आंखे, बदन पर टी—शर्ट और हाफ पैंट, सिर पर हैट, पांव में लंबी सफेद जुराबें और भारी भरकम जूते, तेज कदमों से 2—3 सीटियां बजाता फिर कुछ स्वयं बोलता भी जाता. ये वाक्य अलग—अलग थे मसलन, ‘’ ए मोटी, पानी भर ले, नल आ गया,’’ “उठ रे रिक्शा धो डाल, काम पे नईं जाना क्या ?”

तब तक मिष्टी (हमारा कुत्ता) उसके पास तक पहुंच गया. उससे भी कहने लगा, ‘’ चल मोती, घूम ले, इला दर्शन ( हमारी बिल्डिंग का नाम ) का है न! वहां बहुत से सांप रहते हैं, सावधान!” अब मैंने उसे करीब से देखा, वह पागल था. एक ऐसा विक्षिप्त व्यक्ति जिसने भोर होते ही अपनी ड्यूटी अपने आप तय कर ली है. वह सीटियां बजा-बजा कर न सिर्फ सबको जगाता, बल्कि उनको उनके काम में भी लगाता. दीवानगी में ही सही वह काम तो ठीक ही कर रहा है. हम लोग पता नहीं क्या-क्या अंदाज लगा रहे थे!

इस दीवाने को देखकर दो दिन पहले की घटना तुरंत आंखों के सामने आ गई. समय यही था, सुबह पांच बजे. बिल्डिंग का फाटक खोलकर गली में आया तो लगा जैसे पीछे से कोई बुला रहा है. मुड़कर देखा तो एक तिपहिए में एक पतला-दुबला-सा लड़का बैठा था ( हमारी गली में रात को कई तिपहिए सड़क पर ही खड़े रहते हैं ). उसने सिर पर एक क्रोशिए से बुनी सफेद टोपी पहन रखी थी. साथ में बुशर्ट और पैंट. बोलने में अटक रहा था और तुतला भी रहा था, - ‘’ अंकल, मुझे दो रात से नींद नहीं आई...,’’ बोलते—बोलते वह तिपहिए से बाहर निकल आया, ‘’ नींद नहीं आती अंकल...मेरे पास काम नहीं है अंकल...मुझे कोई काम दो न...!’’

उसकी फटी-फटी आंखों में ऐसा कुछ था, जिसने मुझे जता दिया कि वह सामान्य नहीं है. कुछ देर बाद जब मैं लौटा तो मैंने देखा कि वह वहीं बैठा था. मेरे आते ही वह उठ गया – ‘’ अंकल आउं क्या?,’’ वह मेरी ओर बढ़ने लगा, ‘’ मुझे काम मिल गया न ! ...चलिए मैं आपके साथ ही चलता हूं.’’ झपट कर मैं फाटक के अंदर आ गया. वह कुछ देर बाहर खड़ा रहा, फिर लौट गया. मैंने देखा वह तिपहिए की उसी सीट पर जाकर बैठ गया था और बड़ी ही करूण आंखों से, सूनी-सूनी आंखों से, मेरी ओर देख रहा था...

और कल दोपहर एक और घटना घटी. मुझे किसी काम से दलाल स्ट्रीट जाना था. ‘ स्टॉक एक्सचेंज’ के ठीक सामने. वहीं एक महिला ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया. अवश्य वह महिला पारसी रही होगी. उसका किशमिश जैसा सूखा बदन जैसे घोषणा-सी कर रहा था कि एक दिन वह अवश्य ही अंगूर जैसी भरपूर युवती रही होगी. वह लगभग 40-50 बरस की थी. गर्दन तक कटे गंगा-जमुनी, उलझे—उलझे, रूखे—सूखे बाल, बैंगनी पेटीकोट पर हरी साड़ी, सलीके से सिला किंतु मटमैला ब्लाउज, बिल्कुल साड़ी और पेटीकोट की ही तरह.

सुंदर चेहरा, बोलती आंखें, कंधे पर झूलता एक फटा-पुराना, बड़ा-सा बैग, हाथ में एक बॉलपेन और उसका निरंतर बड़बड़ाना, - ‘’ओरियेंटल इंश्योरेंश...अच्छी बात है....कितने शेयर...नीचे आ गया...नीचे आ गया... स्टॉक गया...हा हा हा...’’ जहां भी वह ठहरती सब रूक जाते. कुछ मुस्कुराते, कुछ विस्मय करते, कुछ को शायद आदत पड़ जाने के कारण ध्यान देने की जरूरत ही नहीं थी. मैंने एक भेल पूरी वाले को चुना. पूछा, ‘’ भई कौन है यह ? ‘’ , ‘’ बस ऐसे ही घूमती रही है. बड़बड़ाती रहती है.’’

भेल वाला जवान था. उसके पास ही खड़े बूढ़े चने-मूंगफली वाले ने मेरी बात सुन ली. बोला, - ‘’अरे नहीं बाबू, हरहमेस से ऐसे नहीं घूमती थी ये! कहते हैं, इसका यहां आफिस था, काफी माल था, पैसे वाली थी...बड़े-बड़े कार वाले भी कभी-कभी इसके पास आकर रूकते हैं. इससे बातें करते हैं.’’ ‘’कौन कार वाले,’’ मैंने पूछा, बोला- ‘’अरे यही जो इस्टाक इक्सचैंज में आते हैं ? कभी-कभी, आज भी इसके पास सौ-सौ के नोट होते हैं, जिन्हें दिखाती-फिरती है, सब लोग इसे मैडम कहते हैं.’’

तब तक बड़बड़ाती महिला भीड़ में न जाने किधर सरक गई. बाद में दूर कहीं दिखी, हाथ नचा-नचा कर लोगों को कुछ बता रही थी. कुछ ही दिनों में ध्यान ऐसे लोगों की ओर गया तो बचपन की एक स्मृति और ताजा हो गई.

जब हम छठी—सातवीं में पढ़ते थे तो स्कूल जाते समय एक बहुत सुंदर नवयुवक सड़क के बीचों-बीच खड़िया अथवा चॉक से गणित के बड़े-बड़े सवाल हल करते पाया जाता. बाद में पता चला कि ब्राह्मणों का लड़का था. गणित में विलक्षण. कहते थे कि सूर्य की पूजा करता था. पता नहीं किस सिद्धि के लिए घंटों सूर्य की ओर देखता रहा और एक दिन दिमाग चल गया. तब से सड़कें ही उसका ब्लैक बोर्ड थीं.

सब उस पर हंसते, मजाक उड़ाते, बदले में वह मुस्कुराता किंतु एक दम बालकों की-सी, खालिस भोली मुस्कान...कालांतर में वह कहां गया, कौन जाने!

ऐसे चरित्रों और घटनाओं से आप भी जरूर दो-चार हुए होंगे. सोचना चाहेंगे तो जाने कितने लोग याद आ जाएंगे. सड़कों पर चीथड़े लपेटे आदमी, औरत बल्कि हमारे कस्बे का ‘’राजा’’ ( सब उसे इसी नाम से पुकारते थे ) तो तन पर कुछ पहनता ही नहीं था. नंग-धड़ंग किसी भी दुकान के आगे जाकर खड़ा हो जाता. जब मरा तो बनियों ने मिलकर उसका विमान निकाला. उसकी अर्थी पर से पैसों की बौछार की, बड़ी-बड़ी दावतें दीं किंतु जीते जी ?...जीते जी किसी ने कभी नहीं चाहा कि वह ठीक हो जाए, उसकी देखभाल के लिए कुछ किया जाए क्योंकि बाजार में बैठे बनिए समझते थे कि वह पागल उनके लिए शुभ शगुन था और जिस दुकान पर वह जिस दिन न पहुंचता, उस दिन उसकी बिक्री अपेक्षाकृत बहुत ही कम होती. अत: उसका उसी दशा में पागल रहना, निर्वस्त्र विचरण करना एवं हर दुकान पर फेरी लगाते रहना ही अधिक आवश्यक था.

हमें समाज के हर उपेक्षित वर्ग का ध्यान आता है. आवारा बच्चे, अनाथ बच्चे, बूढ़े, निराश्रित महिलाएं, अपंग इत्यादि…इत्यादि...सूची लंबी है, किंतु मैं सोचता हूं कि ये लोग किस श्रेणी में आते हैं ? क्या ये असहाय, बेसहारा और अपंग नहीं हैं? समाज इनके बारे में क्यों नहीं सोचता ? इन लोगों के लिए क्या कोई ऐसा ठिकाना नहीं हो सकता जहां इन्हें प्यार से अपना लिया जाये और इन पर पूरा ध्यान दिया जाये. इनमें से न जाने कितने तो थोड़ा-सा ध्यान देने से ही संभवत: ठीक भी हो जाएंगे. हमारा देश तो मसीहाओं का देश है. संतगण विविध रूपों में आते रहते हैं.

मदर टेरेसा का कोई नया अवतार, काश, हो और ऐसे अभागों के सिर पर भी वह अपना हाथ रखे! ये अपने जीवन में न जाने कैसे-कैसे हादसों का शिकार होकर विक्षिप्त हो गए हैं, भटक रहे हैं नगर—नगर, गली—गली, सबके उपहास के पात्र, बच्चों के लिए क्रूर मनोरंजन का साधन बनते हुए औरों के लिए मात्र उपेक्षित ही. कोई एक कंधा जो इन्हें भी अपना सिर रखकर रो लेने दे, कोई एक आश्वासन जो इनमें भी आशा की किरण भर सके...न..न..इन पर तरस खाने से कुछ नहीं होगा, भीख देने से भी नहीं, यदि समुचित ध्यान दिया जाये तो कदाचित ये भी एक बार फिर से समाज का उपयोगी अंग बन सकते हैं.

19.06.2011, 01.06 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Rituparna Mudra Rakshasa [] Ghaziabad - 2011-06-19 18:22:52

 
  बहुत ही मार्मिक और संवेदना से परिपूर्ण लेख. आपको बहुत-बहुत बधाई. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in