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नक्सली हिंसा और सरकार

बहस

 

नक्सली हिंसा और सरकार

दिवाकर मुक्तिबोध


अबूझमाड़ के घने जंगलों में फौज की तैनाती का जवाब नक्सलियों ने जिस तौर तरीके से देना शुरु किया है वह राज्य एवं केंद्र सरकार के लिए गहन चिंता का विषय होना चाहिए. मई और जून के बीच एक के बाद एक नक्सलियों ने पांच बड़ी वारदातें कीं और अद्धसैनिक बलों एवं पुलिस जवानों की टुकडिय़ों पर हमले करके 36 लोगों को मौत के घाट उतारा. और तो और नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले के दोरनापाल के निकट गांव डुब्बाटोला के लगभग सभी ग्रामीणों का 16 जून 2011 को अपहरण कर लिया और घंटों कड़ी पूछताछ के बाद उन्हें इस चेतावनी के साथ रिहा किया कि कोई भी पुलिस की मुखबिरी नहीं करेगा. इस घटना से जाहिर हैं कि नक्सली हिंसा और आतंक के जरिए दबाव को और तेज करने की कोशिश में है और इसमें वे कामयाब भी हैं.

छत्तीसगढ़


सिर्फ एक माह के भीतर तीन दर्जन जवानों की मौत का मातम राज्य सरकार वैसी ही मना रही है जैसा कि एक दशक से मनाती आ रही है. यानी नक्सली घटनाओं की भर्त्सना, निंदा, नक्सलियों को कायर करार देना, ईंट का जवाब पत्थर से देना, रणनीतिक बदलाव की बात कहना तथा शहीदों की शहादत को नमन करना. हर बड़ी घटना के बाद राजधानी में मंत्रियों, प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की समीक्षा बैठकें भी नक्सली मोर्चे पर प्रशासनिक औपचारिकता का हिस्सा है. बीच-बीच में जब नक्सलियों की बंदूकें आग उगलना बंद कर देती हैं और जवानों या ग्रामीणों का खून नहीं बहता, तब सरकारी कार्यक्रमों के दौरान नक्सलियों को गले लगाने, उन्हें भाई कहने तथा बातचीत के लिए आगे आने की अपील की जाती है. सन् 2000 के बाद जब से छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना, नक्सली वारदातों में क्रमश: तेजी आती गई है. गत दो वर्षों से नक्सली हिंसा उफान पर है.

छत्तीसगढ़ की जनता ने मान लिया है कि सरकार का रोना-गाना नाटकीयता के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि सत्तारुढ़ दल को वोटों की राजनीति करनी है और बस्तर इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है. सरकार लाख दावा करे कि बस्तर के घने जंगलों व मैदानी इलाकों में बसे गांवों के लोग मताधिकार के प्रति जागरुक हैं, धमकियों की परवाह नहीं करते और मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, सच से काफी दूर है. देश के 220 में से 83 जिलों पर नियंत्रण बनाए रखने वाले माओवादी यदि प्रतिवर्ष 1400 करोड़ रुपये की उगाही कर रहे हैं तो बेहतर समझा जा सकता है सर्वाधिक प्रभावित बस्तर वसूली के मामले में उन्हें कितना मालामाल करता होगा.

इसी संदर्भ में यह विचारणीय है कि बस्तर संभाग में भाजपा कैसे एकतरफा सीटें निकालती रही है. 2005 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बस्तर की 12 में से 11 सीटें जीती थीं, इसके पूर्व 2003 के चुनाव में जो नए राज्य का प्रथम चुनाव था और कांग्रेस ने अजीत जोगी के नेतृत्व में लड़ा था, भाजपा ने 9 सीटों पर कब्जा किया था. सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका अदा करने वाले बस्तर के इन आंकड़ों से क्या यह समझा जाए कि यह भाजपा के चुनाव प्रबंधन का कमाल है या फिर यह नक्सलियों से सांठगांठ एवं सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल का परिणाम? जाहिर है इसे प्रमाणित करना असंभव सा है लेकिन आगामी 2013 के विधानसभा चुनाव स्पष्ट संकेत देंगे. यदि इन नतीजों की पुनरावृत्ति हुई तो इस वनांचल में निष्पक्ष एवं स्वतंत्र चुनाव के दावे पर शक की लकीरें निश्चय ही कुछ और गहरी हो जाएंगी.

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित ग्यारह जिलों में पांच बेहद संवेदनशील हैं और यहां नक्सली आतंक का साया दिनों दिन गहराते जा रहा है. रायपुर, धमतरी और महासमुंद जैसे शहरी बहुल जिलों में उनकी गतिविधियां एवं वारदातें इस बात की गवाह हैं कि नक्सलियों के खिलाफ नवंबर 2009 से प्रारंभ केंद्र एवं राज्य सरकार के संयुक्त अभियान ‘आपरेशन ग्रीन हंट’ का कोई विशेष असर नहीं पड़ा है बल्कि वारदातें और संगीन हुई है और उनकी संख्या भी बढ़ी है.

‘आपरेशन ग्रीन हंट’ की कमान संभालने वाले अधिकारी एवं राज्य सरकार के नुमाइंदें भले ही इसे नक्सलियों की बौखलाहट करार दें लेकिन सच तो यह है कि बौखलाहट एवं भय माओवादियों में नहीं बल्कि राज्य की पुलिस में है. इसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि नक्सल प्रभावित इलाकों में राज्य सरकार की तबादला नीति ध्वस्त है. सरकार ने यह नीतिगत निर्णय लिया था कि उन पुलिस अधिकारियों एवं सहायकों को बस्तर अवश्य भेजा जाएगा, जो अपने अब तक के कार्यकाल में इस इलाके में पदस्थ नहीं किए गए या फिर किसी न किसी बहाने से तबादला रुकवाते रहे हैं.

इस नियम के कागजों में दर्ज होते ही राजनीति शुरु हो गई. पुलिस मुख्यालय ने अगस्त 2010 से जनवरी 2011 के बीच उप निरीक्षक स्तर के करीब 30 अधिकारियों की पदस्थापना बस्तर में की थी किंतु अधिकांश लोक सेवक तबादले रुकवाने में कामयाब हो गए. यह अलग बात है कि गृहमंत्री ननकीराम कंवर एवं पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के बीच महीनों से चले आ रहे शीतयुद्ध का फायदा इन अफसरों ने तबादला रुकवाकर उठाया. इसलिए सच यही है कि अधिकांश पुलिस अधिकारी बस्तर में पोस्टिंग से घबराते हैं, लिहाजा अनेक थाने खाली पड़े हुए हैं.

राज्य में पांच बड़ी वारदातों के बाद केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने 14 जून 2011 को छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा के मुख्यमंत्रियों के साथ नई दिल्ली में बैठक की. इस बैठक में पांच सूत्रीय नक्सली आपरेशन के ब्लूप्रिंट को मंजूरी दी गई. केंद्र ने सुझाव दिया है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के प्रत्येक थानों में कम से कम 80 जवान पदस्थ किए जाएं ताकि थानों पर नक्सली हमले की स्थिति में उनका मुकाबला किया जा सके. यह सुझाव निश्चित ही व्यावहारिक है किंतु क्या सरकार इसके लिए तैयार है?
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

के. रवींद्र [] रायपुर - 2011-06-26 12:09:27

 
  एक अच्छा आलेख , बधाई 
   
 

के. रवींद्र [] रायपुर - 2011-06-26 12:09:15

 
  एक अच्छा आलेख , बधाई 
   
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