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अध्यक्ष, प्रेस परिषद के नाम एक पत्र

बात निकलेगी तो...

 

अध्यक्ष, प्रेस परिषद के नाम एक पत्र

अनिल चमड़िया


प्रति,
अध्यक्ष, भारतीय प्रेस परिषद
नई दिल्ली

विषय-बम विस्फोट की खबरों की भी जांच की जरूरत

media-terrorism


भारतीय प्रेस परिषद ने खासतौर से साम्प्रदायिक तनाव को एक हद से ज्यादा बढ़ाने में जब मीडिया की भूमिका दिखाई देने लगी है तो जांच समितियां बनाई है. मसलन अक्टूबर, नंबर 1990 के दौरान समाचार पत्रों ने खबरों के जरिये साम्प्रदायिक वातावरण बनाने में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया तब प्रेस परिषद ने एक जांच कमेटी बनाई. प्रेस आयोग प्रथम और द्वितीय ने भी मीडिया की साम्प्रदायिक भूमिका को लेकर टिप्पणियां की है. लेकिन मीडिया का जिस तरह से विस्तार हुआ है और जिस तरह से मीडिया संस्थानों के अपने हितों को लेकर पूर्वग्रह बढ़े हैं, वैसी स्थिति में जांच व अध्ययन की प्रक्रिया को लगातार जारी रखने के ढांचे बनाए जाने चाहिए.

आखिर क्यों नहीं प्रेस परिषद या किसी भी संस्था ने यह जांच करने की जरूरत समझी कि मंडल (आयोग) एक और दो (विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर अर्जुन सिंह के आरक्षण के फैसले) के दौरान मीडिया की जातिवादी भूमिका क्यों रहीं? साम्प्रदायिकता जिस तरह से सामाजिक वातावरण को जहरीला बना रही है, उन्हें देखा जाना जरूरी है.

दंगे होते दिख नहीं रहे हैं लेकिन दंगों से भी ज्यादा खतरनाक दुष्प्रभाव समाज पर पड़ रहा है. देश में बम विस्फोट की कई घटनाएं हुई हैं, जिन्हें आतंकवादी घटना के रूप में देखा गया है. लगभग बाबरी मस्जिद के आरएसएस के समर्थकों के नेतृत्व में उन्मादी भीड़ द्वारा गिराए जाने के बाद बम विस्फोट की जितने घटनाएं हुईं, उनमें मुसलमानों के हाथ होने की खबरें अंधाधुंध तरीके से प्रस्तुत की जाती रही है.

अमरीका के 26/11 के बाद तो जैसे भारत में विस्फोट की घटनाओं में मुस्लिम आतंकवादियों को आरोपित करने की भूमंडली स्वीकृति सी मिल गई. भारत में मीडिया और पुलिस की एक साम्प्रदायिक पृष्ठभूमि देखने को मिलती है. बम विस्फोट की घटनाओं के प्रचार से जो माहौल बना, उसमें इनके बीच गठजोड़ का एक तर्क विकसित कर लिया गया.

देश में बम विस्फोट की घटनाओं के बाद मीडिया और पुलिस की भाषा में अंतर ही खत्म हो गया. मीडिया जो पुलिस सूत्रों और अपनी जांच में अंतर करती है, वह खत्म हो गया. पुलिस की जांच को ही मीडिया ने अपनी जांच मान ली और पुलिस ने मीडिया को अपनी किसी भी तरह कार्यवाही और कार्रवाई पर सहमति बनाने का माध्यम बना लिया. किसी भी विस्फोट की जांच मीडिया ने अपने स्तर से करने की कोई कोशिश नहीं की. बल्कि आतंकवाद विरोधी दस्ते जिस तरह से बम विस्फोट की घटनाओं और उनके आरोपियों को पेश करते रहे, उन्हें व्यापक स्वीकृति दिलाने की मुहिम में मीडिया अति सक्रिय रही.

साम्प्रदायिक दंगों के बाद शहर का सामाजिक भूगोल प्रभावित होता रहा है. मिली-जुली आबादी से मुसलमानों का पलायन और बेहद छोटी संख्या में हिन्दूओं का पलायन हुआ. मुहल्ले और एरिया मुस्लिम और हिन्दू की पहचान लेने लगे. बिहार के भागलपुर और गुजरात में भी ऐसे इलाकों को बड़े पैमाने पर बनते देखा गया है. लेकिन बम विस्फोट की घटनाओं के बाद समाज में दो तरफा असर हुआ. एक तो मुसलमानों में असुरक्षा का बोध गहरा होता चला गया और उनकी बड़ी तादाद सुरक्षित स्थानों की तरफ बढ़ने लगी. दिल्ली में हाल के वर्षों में कोई साम्प्रदायिक दंगे की घटना नहीं हुई लेकिन आबादी का जिस तरह एक दिशा में ध्रुवीकरण निरंतर जारी रहा, वो कई कई दंगों के बाद भी दिखाई नहीं दिया.

दूसरा असर ये हुआ कि मुसलमानों को बहुसंख्यकों के इलाके में मकान किराये पर मिलने भी बंद हो गए. आईबीएन-सीएनएन ने मुंबई, दिल्ली और दूसरे विकसित होते शहरों में मुसलमानों को किराये पर मकान नहीं दिए जाने की एक लंबी रिपोर्ट दिखाई थी.

समाज पर बम विस्फोट की घटनाओं का जो साम्प्रदायिक असर हुआ, उसका जरिया मीडिया ही रहा है. समाचार पत्र और टेलीविजन के चैनलों के जरिये ही समाज का बड़ा हिस्सा लगातार असुरक्षा के मनोविज्ञान का शिकार होता रहा. 1992 में दिल्ली वर्किंग ऑफ जर्नलिस्ट यूनियन ने एक पोस्टर प्रकाशित किया था, जिसमें मीडिया के लिए यह नारा था- खतरनाक नहीं होता है साम्प्रदायिकता का खबर बन जाना, खतरनाक होता है खबरों का साम्प्रदायिक होना.

बम विस्फोट की घटनाओं की साम्प्रदायिक रिपोर्टिंग ने समाज में जो खाई पैदा की, वह पिछले कई साम्प्रदायिक दंगों की रिपोर्टिंग के बाद भी दिखाई नहीं देती है. मीडिया ने जिस तरह से खबरें दीं, उनके बारे में क्या अब कोई पड़ताल नहीं की जानी चाहिए? किसी भी विस्फोट और पुलिस व आतंकवादी विरोधी दस्ते ने मुठभेड़ में मार गिराने के बाद जिस तरह से सुर्खिया मीडिया को दी, क्या उन्हें याद नहीं किया जाना चाहिए? खासतौर से मालेगांव के विस्फोट की दोबारा जांच के दौरान जो जानकारियां सामने आई हैं, उसके आलोक में मीडिया की खबरों की पड़ताल की जानी चाहिए. न केवल कई विस्फोटों में मुसलमान आतंकवादियों के बजाय हिन्दूत्ववादी आतंकवादियों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है, बल्कि कई विस्फोटों में पुलिस व आतंकवादी विरोधी दस्ते ने जिन्हें पकड़ा था, उन्हें अदालतों से मुक्ति भी मिली है.

विस्फोटों के अलावा पुलिस ने जिस तरह मुसलमान युवकों को गिरफ्तार किया, उससे लगता है कि पुलिस इस बात को लेकर निश्चिंत थी कि जन में उसका प्रतिरोध नहीं हो सकता है क्योंकि किसी भी मुद्दे पर सहमति और असहमति बनाने के जो माध्यम हैं, वो पूरी तरह से पुलिस की भाषा बोलने लगे हैं. समाचार माध्यमों में पुलिस की भूमिका पर सवाल खड़े करने की गुंजाइश कम होती चली गई बल्कि समाचार माध्यमों में मुसलमानों के बीच सफाई देने की विवशता खड़ी की गई.

आखिर क्या दवाब रहा मीडिया पर कि वहां समाज में बढ़ती दूरियों की उसने परवाह करने की भी जरूरत महसूस नहीं की. एक तथ्य तो ये मिलता है कि इस तरह की घटनाओं को आम आपराधिक घटना की तरह मीडिया ने लिया और इन घटनाओं को आपराधिक मामलों के रिपोर्टरों के जिम्मे छोड़ दिया. बम विस्फोट की घटनाओं की प्रकृति के आलोक में सामाजिक-राजनीतिक रूप से संवेदनशील रिपोर्टरों को नहीं लगाया गया.

व्यवसायी मीडिया अपने विस्तार के लिए क्राइम रिपोर्टिंग की जरूरत भी महसूस करता है. लेकिन वह इस रूप में अपने कामकाज के तरीके बदलने को तैयार नहीं दिखता है कि क्राइम रिपोर्टिंग का चरित्र बदला है. हमारे समाज में जिस क्राइम रिपोर्टिंग की शैली का इतना गहरा प्रभाव हो रहा हो, क्या उसे लेकर प्रेस परिषद या दूसरे संगठनों को विचार नहीं करना चाहिए? बम विस्फोटों की घटनाओं की रिपोर्टिंग किन परिस्थितियों में की गई, किस तरह के दवाब महसूस किए गए इन पहलूओं को लेकर एक कमेटी द्वारा जांच क्यों नहीं की जानी चाहिए. मुंबई में जिन घटनाओं में कसाब को कैद किया गया है, उन घटनाओं के दौरान की रिपोर्टिग को लेकर काफी बहस हुई. रिपोर्टिंग के इस पहलू पर भी बातें हुई कि सुरक्षा बलों की जान को खतरे में डालकर रिपोर्टिंग नहीं की जा सकती है. एक दिशा निर्देश तैयार किया गया. लेकिन जिस तरह की रिपोर्टिंग से साम्प्रदायिक दंगों से ज्यादा भयावह असर दिखाई दे रहे हैं, उस पर अध्धयन और बहस की कोई पहल क्यों नहीं होनी चाहिए? लोकतंत्र के लिए संकल्पित भारत में इस तरह के अध्धयन व जांच की स्वतंत्र पहल आपको करनी चाहिए.

अपीलकर्ता
अनिल चमड़िया

26.06.2011, 07.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

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anjana bakshi [anjanajnu5@gmail.com] delhi - 2011-07-01 17:27:48

 
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