पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

सवाल विकास की समझ का

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

क्यों बढ़ रहा भूख का आंकड़ा

हमारे कुलभूषण को छोड़ दो

भारत व अमेरिका में केमिकल लोचा

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
  पहला पन्ना >कनक तिवारी Print | Share This  

बड़े अच्छे लगते हैं!

बात निकलेगी तो...

 

बड़े अच्छे लगते हैं!

कनक तिवारी

मनमोहन सिंह


खुद को गांधीवादी कहना सात्विक अहंकार होगा. कोई नहीं है जो बापू के रास्ते पर चलने की वैश्वीकरण के युग में सोच भी सके. इसलिए विमर्श में गांधी को एक मुअक्किल, बौद्धिक विचारक या हथियार की तरह इस्तेमाल करने में बहुत अच्छे लगते हैं. इस महामानव ने यह भी सिखाया है कि अपनी बात पर कायम रहने के लिए हिंसा की भाषा का इस्तेमाल करना ज़रूरी नहीं है. उचित शर्त यही है कि अपने सिद्धांतों और मान्यताओं को किसी के आगे घुटने टेकने के लिए मजबूर नहीं किया जाए. गांधी ने लाठियां और लात घूसों के साथ साथ अंत में गोलियां भी खाईं. लेकिन अभद्र भाषा या मन की कटुता से उनका कोई संबंध नहीं रहा. देश के ताज़ा हालात में हर व्यक्ति गांधी के नाम की तोतारटंत में मशगूल है. नक्सलवादी बकौल उनके शैली में नहीं लक्ष्य में गांधीवादी आंदोलन कर रहे हैं. सलवा जुडूम समर्थक उसे गांधी शैली का उत्पाद मानते हैं. संजय दत्त की फिल्मों में गांधी का फलसफा मुम्बई के फिल्म जगत के हिंसा बाजार में परोसा जा रहा है. ऑपरेशन ग्रीन हंट भी उसके रचयिताओं के अनुसार गांधी के सत्याग्रह आंदोलन जैसा है. हाल में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी पर जबलपुर में हमला हुआ, अणीत जोगी ने अपने हमलावरों को माफ करते समय गांधी का सहारा लिया. ये सब बड़े अच्छे लगते हैं.

इन दिनों कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिससे भारत को गांधी का देश कहने में शर्म महसूस हो रही है. असल में इस महान जनयोद्धा को उसके वंशजों और आलोचकों ने मिली जुली कुश्ती की शैली में एक संत, राजनेता, लेखक, विचारक और समाज सुधारक जैसा चित्रित किया है. इस आदमी में अंगरेज़ हुक्मरानों की तोपों से लेकर अमरीकियों और जापानियों के एटम बम से टकराने की ताकत थी. यह आत्मा के ताप का मनुष्य था. इधर उसे हर व्यक्ति अपना रोल मॉडल बना रहा है. एक राजनीतिक पार्टी का अध्यक्ष और गैर सदस्य बनकर भी उसने आज़ादी की लड़ाई का उस पार्टी को हथियार बना दिया. उसमें केवल अपने पूर्वज की तस्वीरें ही बची हैं. इनमें से कई घटिया किस्म की गैर कलात्मक भी हैं. कांग्रेस पार्टी अमरीका से कदमताल बल्कि घुटनाताल कर रही है. प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह अपने दांत के डॉक्टर के अतिरिक्त केवल अमरीका से परमाणु संधि करार करने के वक्त अपना मुंह खोल पाए थे. उन्होंने मुक्तिबोध के शब्दों में दृढ़ हनु दिखाकर इतनी बड़ी राजनीतिक ज़िद की कि कम्युनिस्टों से कांग्रेस का संबंध ही टूट गया. देश में महंगाई, भ्रष्टाचार और पुलिसिया अत्याचार शबाब पर है, बल्कि समुद्री ज्वार की तरह है. इस माहौल में मनमोहन सिंह हैं कि व्यापारिक मुस्कान बिखेरते हुए हर चुनौती के सामने छुई मुई हो जाने को गांधीनुमा करतब मानते हैं. वे प्रधानमंत्री को जन लोकपाल अधिनियम के दायरे में लाना चाहते हैं लेकिन बेचारे क्या करें उनकी पार्टी और मंत्रिपषिद उनके साथ नहीं है. गांधी के साथ तो ऐसा कई बार हुआ. लेकिन वे एकला चलो कहते हुए सत्याग्रह और अनश्न के हथियार चला देते थे. मनमोहन सिंह खुद सत्तामोही क्यों हैं? पार्टी नहीं माने तो अन्ना हजारे के साथ बैठकर अनशन भी तो कर सकते हैं. प्रधानमंत्री हर वक्त बड़े अच्छे लगते हैं.

कपिल सिब्बल ने सरकार और राजनीति को मुअक्किल समझ लिया है. उनके लगातार प्रखर लेकिन विक्टोरियाई तर्क हैं कि अंगरेजों के विचारों की जुगाली से बना भारतीय संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जिसकी कोई भी इबारत पर पुनर्विचार नहीं हो सकता. कपिल सिब्बल और कांग्रेस पार्टी ने मिलकर रामास्वामी नाम के सुप्रीम कोर्ट के एक जज को महाभियोग की संसदीय कार्यवाही से बचा लिया था. भारत का संविधान हम भारत के लोगों ने खुद को दिया है. हम संविधान के जनक हैं. संविधान हमारा पुत्र. संविधान के वंशजों ने सांसद और विधायक सहित सभी तरह के सरकारी अधिकारी हो सकते हैं जो मनुष्य के रूप में संविधान के निर्माता हैं लेकिन पदभारी होने की हैसियत में संविधान की संतानें. राजनीतिक हालातों के चलते यदि दो तिहाई बहुमत के बिना संविधान में संशोधन नहीं हो सकता तो ऐसी स्थिति को भांपकर अन्ना हजारे को शालीन समझाइश भी तो दी जा सकती है कि सरकार संसद में संविधान संशोधन विधेयक भी लाने को तैयार है. लेकिन मौजूदा हालात में उसे कैसे पास किया जा सकेगा. सरकार के कुलीन मंत्री बड़े अच्छे लगते हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

raksha [] katni - 2011-07-08 10:38:47

 
  impresssive but short.keep this kind of issues up. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in