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बस्तर में संघ का अभियान

बहस

 

बस्तर में संघ का अभियान

दिवाकर मुक्तिबोध


नक्सल समस्या से सर्वाधिक प्रभावित छत्तीसगढ़ में घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है. हिंसा का दौर तो खैर जारी ही है, सेना की अबूझमाड़ में उपस्थिति से बुरी तरह बौखलाए माओवादियों ने 4 जुलाई से 11 जुलाई तक दंडकारण्य बंद का एलान किया है. बस्तर पिछले 6 महीनों में इसी तरह अनेक बंद देख चुका है, जिनका कुल मकसद सरकार को चुनौती देना, आतंक बरपाना तथा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना रहा है. एक सप्ताह का नया बंद सेना के विरोध में है.

नारायणपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर अंतागढ़ तथा अन्य क्षेत्रों में जो नक्सली पर्चे मिले, उसमें सेना से अपील की गई है कि वह जनता से युद्ध न करें और वापस लौट जाएं. दंडाकारण्य स्पेशल जोन कमेटी की ओर से जारी इन पर्चों में यह भी कहा गया है कि प्रशिक्षण के नाम पर सेना को बस्तर में पदस्थ करना एक साजिश है. पर्चों से यह अनुमान लगाया जा सकता है माओवादी डरे हुए तो जरुर हैं लेकिन बौखलाहट में वे बंद की अवधि में सुरक्षा बलों पर हमले तेज कर सकते हैं. यह भी संभव है कि सेना की उपस्थिति वाले अबूझमाड़ के आसपास के आदिवासी गांवों में हिंसा का खूनी खेल खेलकर वे सेना को अपनी युद्धक तैयारियों का अहसास कराएं. नक्सलियों के खिलाफ राज्य व केंद्र सरकार का संयुक्त अभियान, जो महीनों से जारी है और हर बड़ी घटना के बाद उसके तेज होने का दावा किया जाता है; कितना दबाव बना पाएगा कहना मुश्किल हैं. किंतु हालात निश्चय ही बेकाबू नजर होते आ रहे हैं.

इन सबके बीच कुछ उत्साहवर्धक बातें भी जरुर हुई हैं. मसलन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने 24 जून को रायपुर में छत्तीसगढ़ विधानसभा के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए नक्सलियों से अपील की कि वे हथियार छोड़ दें और बातचीत के लिए आगे आएं.

किसी राष्ट्रपति की ओर से पहली अपील है और इस बात का संकेत भी कि नक्सली समस्या से वे किस कदर चिंतित हैं. यद्यपि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं गृहमंत्री पी. चिदंबरम तथा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह एकाधिक बार इस तरह की अपील कर चुके हैं किंतु नतीजा सिफर रहा है. लेकिन जब संवैधानिक सत्ता के सर्वोच्च पद पर बैठा कोई व्यक्ति ऐसी कोई अपील करे तो उसके अलग मायने हैं और उसे गंभीरता से लेने की जरुरत है.

यह भी स्पष्ट है कि यदि कोई राष्ट्राध्यक्ष विधानमंडलों की बैठक में किसी समस्या पर अपने विचार व्यक्त करता है तो वह सरकार के लिए भी दिशा-निर्देश होता है. राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने नक्सलियों से हिंसा छोडऩे एवं बातचीत के लिए आगे आने की अपील की है तो यह अपील नक्सलियों के लिए भी है और राज्य सरकार के लिए भी कि वह इस दिशा में निर्णायक पहल करे. राष्ट्रपति की अपील को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है लेकिन ऐसा नहीं लगता कि राज्य सरकार ने बातचीत के लिए वातावरण बनाने की कोई कोशिश की हो.

क्या इसका यह अर्थ है कि अपील चूंकि नक्सलियों से है, इसलिए पहल भी उन्हें ही करनी चाहिए? क्या सरकार का अपना कोई दायित्व नहीं है? राष्ट्रपति का मान रखने के लिए, क्या वह ऐसे व्यक्तियों अथवा संस्थाओं को नामजद नहीं कर सकती जो मध्यस्थ के रुप में कार्य कर सकें? क्या कभी सरकार ने शहरों में निवासरत अथवा इतर राज्यों के शहरी माओवादी समर्थकों को टटोलने की कोशिश की है, जो इस दिशा में उसकी मदद कर सकें?

यकीनन राज्य की पुलिस के पास उन माओवादी समर्थकों की सूची है, जो शहरों में रहते हैं तथा जिनका अप्रत्यक्ष संबंध नक्सलियों से है. लेकिन क्या ऐसे लोग जो नक्सली हिंसा को बिल्कुल जायज नहीं मानते किंतु उनकी सहानुभूति नक्सलियों के साथ है, सरकार की मदद के लिए राजी नहीं होंगे? कभी राज्य सरकार ने यह सोचा कि बिनायक सेन या जेल में बंद नारायण सान्याल जैसे नक्सली कमांडर बेहतर ढंग से मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं? क्या इन लोगों को मनाने कोई पहल की गई?
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