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दिल्ली मेरी भी तो है...

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दिल्ली मेरी भी तो है...

रेणु अगाल


दिल्ली पुलिस कमिश्नर बीके गुप्ता की छवि अपराध से लड़ने वाले एक सक्षम अधिकारी की है पर दिल्ली कितनी दिल वालो की है और कितनी मनचलों की, इसका पूरा एहसास शायद उन्हें अपना पद संभालते समय नहीं था.

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अभी चंद दिनों पहले ही उन्होंने दिल्ली में घटते अपराध के आंकड़े दिए थे और अपनी व पुलिस की पीठ थपथपाई थी. पर हाल में उद्योग संगठन फिक्की की महिलाओं के संगठन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अगर रात के दो बजे लड़कियां या महिलाएं, दिल्ली की सड़क पर अकेली निकलती हैं तो उनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है.

उनका कहना था कि दिल्लीवासियों को ही उनकी ऐसी हिदायत नहीं है, लंदन में रह रही उनकी बेटी को भी वे रात नौ बजे के बाद अकेले बाहर निकलने की हिदायत देते हैं.

पर कमिश्नर साहब, आप का काम दिन हो या रात दिल्ली के हर नागरिक- स्त्री हो या पुरुष, सभी की सुरक्षा देना है. आप की पुलिस ही कहती है- “आपके लिए आपके साथ सदैव...” फिर महिलाओं को ये हिदायत क्यों ?

आज दिल्ली में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं, ऐसी नौकरियों में हैं, जहां देर रात तक काम करना पड़ता है. बराबरी के इस दौर में वे बराबरी की कमाई करना चाहती हैं, बराबरी से जीवन का आनंद लेना चाहती हैं तो बराबरी की सुरक्षा भी चाहती हैं. फिर आप हाथ कैसे खड़े कर सकते हैं? क्या आप ये कहना चाहते है कि दिल्ली पुलिस नहीं मानती कि महिलाएं भी इस शहर में, उतने ही ‘कांफिडेंस’ से आ जा सकती है जैसे पुरुष ?

अब गुप्ता जी या तो रोज़ होने वाली छेड़खानी, बलात्कार और दुराचार की घटनाओं से आप निपट नहीं पा रहे या फिर दिल्ली की एक दूसरी कड़वी सच्चाई से आप हार मान गए हैं. यह सच्चाई है, यहां के पुरुषों की मानसिकता. और इसकी गवाह रोज़ दिल्ली में रहने वाली हर लड़की होती है. इसकी विवेचना के लिए आप को समाजशास्त्र या आंकड़ों की ज़रुरत नहीं है. बस, आप को घर के बाहर निकलना भर है.

आप को कुछ सालों पहले की एक घटना सुनाती हूं. मैं और मेरी एक महिला सहयोगी महिलाओं पर बढ़ते अपराध पर रिपोर्टिंग कर रहे थे और दिल्ली पुलिस के क्राइम अगेंस्ट विमेन सेल जा रहे थे. अपने दफ्तर के बाहर, सड़क किनारे हम अपनी गाड़ी के इंतज़ार में खड़े थे कि सामने से दिल्ली पुलिस की सफेद जिप्सी निकली. उसको चलाने वाले ने लड़कियों को खड़ा देखा तो झट आंख मार दी. ये हाल अगर दिल्ली पुलिस का है तो फिर क्या कहना ! यही सोच कर हम काम पर निकले.

आप माने या न मानें, कुल मिलाकर दिल्ली की यही सही तस्वीर है. सड़क पर मनचले फिकरे कसते हैं, बसों में चिपट कर खड़े होते हैं, उन्हें बस के ब्रेक लगने का मानो इंतज़ार रहता है. फिर इन्हीं में से ही कुछ दिल्ली पुलिस की वर्दी भी तो धारते हैं.

दिल्ली या उत्तर भारत के एक बड़े इलाके की समस्या ये है कि वो महिलाओं को कैसे देखता है. ये वो इलाका है, जहां दहेज के लिए महिलाओं के जलाये जाने की घटनाएं आम हैं. कन्या भ्रूण हत्या की ख़बरें रोज आती हैं. यहां परिवार की आन के नाम पर खाप पंचायतें हत्याओं को जायज़ ठहरा देती हैं. यानी समस्या मानसिकता की है. और ज़रुरत इस मानसिकता को बदलने की है. दिल्ली पुलिस इसमें कुछ हद तक सफल हो सकती है, अगर वो गुनहगारों को पकड़े, कड़ी सज़ा दे और महिलाओं के दिल से डर दूर कर सके.

पर हो ये रहा है कि कमिश्नर साहब कहते हैं कि आप घर में रहे, तभी सुरक्षित होंगे. वैसे, कुछ साल मैं भी लंदन में रह चुकी हूँ और मैंने देर रात सार्वजनिक यातायात में सफर भी किया है. पर मुझे कभी डर नहीं लगा क्योंकि शायद वहां असुरक्षा का अहसास हर पल नहीं होता. हर आदमी खतरनाक नहीं लगता क्योंकि समाज की नज़र में महिला-पुरुष की बराबरी तो एक तथ्य है ही, महिलाओं की सुरक्षा का अधिकार भी बराबर का है. शायद दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के पहले उसकी सोच को संवेदनशील बनाने की ज़रुरत है. और इसमें पुलिस ही नहीं हम सभी की भी भूमिका है. आप भी हर समय सजग रहें ताकि आपके परिवार की महिलाएं भी रह सकें सुरक्षित. अगली बार जब आप किसी लड़की को मुसीबत में देखें तो मुंह न फेरें, आगे बढ़े... देखिए, दिल्ली वाकई दिल वालों की हो जाएगी!

 

11.07.2011, 00.01 (GMT+05:30) पर प्रकाशित