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यदि येदि रह गए तो...

बहस

 

यदि येदि रह गए तो...

रेणु अगाल


राजनीति में आधी लड़ाई परसेप्शन की होती है. लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं, वो बहुत अहम होता है. आज की तारीख में अगर कोई एक नेता है, जिसके भ्रष्ट होने के बारे में शायद जनता में किसी को शक नहीं तो वो है कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा.

yeddyurappa

 लोकतंत्र में लोक राय की अनदेखी कर रही भारतीय जनता पार्टी आखिर ऐसा क्यों कर रही है? क्या कारण है कि चौतरफा दबाव के बावजूद पहली बार दक्षिण भारत में सत्तासीन हुई पार्टी अपने मुख्यमंत्री को नहीं हटा पा रही? इस सवाल में ही इस गुत्थी का जवाब छुपा है.

येदियुरप्पा के भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे होने के बावजूद उनका तर्क है कि भाजपा स्थानीय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर पाई है यानि जनता उनके साथ है. तो उनका तर्क या भभकी ये है कि अगर उन्हें पद से हटाया गया तो पार्टी टूट सकती है और राज्य में फिर सत्तासीन होने का सपना भी पार्टी को छोड़ना पड़ सकता है.

तो अपनी पार्टी को येदियुरप्पा शायद ये घुट्टी पिलाकर इतने आश्वस्त हो गए कि अब भी कह रहे हैं कि वे बेकसूर हैं. हां, लेकिन एक फर्क आया है कि अब पार्टी में खुलकर उनके समर्थन में कोई बड़ा नेता नहीं बोल रहा. अब उनकी कोशिश है कि वो न रहें तो उनका कोई अपना, कुर्सी गरम रखे ताकि मामले के ठंडा होने के बाद वे फिर मुख्यमंत्री का पद ग्रहण कर सके. पर अब माहौल बदल गया है.

कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े जन लोकपाल समिति के सदस्य हैं. भ्रष्टाचार पर कमर कसने के आह्वान के साथ वे अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में देश भर में जनमत जुटाने में लगे हैं. और सरकार के लोकपाल विधेयक की खामियों को उजागर कर रहे है. विपक्षी भारतीय जनता पार्टी भी राजनीति में परसेप्शन के महत्व को समझते हुए हज़ारे और साथियों के साथ नज़र आ रही है. कम से कम जनता के सामने तो. ये अलग बात है कि मानसून सत्र में पार्टी इस विधेयक पर क्या राय बनाती है, उस पर सबकी नज़र है. (वो परसेप्शन पर आधारित होगी या विशुद्ध राजनीतिक नफे नुकसान पर आधारित– इसका पता चल ही जाएगा.)

हेगड़े और उनके साथियों की मांग मज़बूत लोकपाल की है ताकि ऐसे मामलों में कड़े क़ानूनी कदम उठाएं जा सकें.

अब बात येदियुरप्पा की- उन पर अवैध खनन और भूमि आवंटन में धांधली के सीधे-सीधे आरोप लगे हैं. ऐसा मीडिया में लीक रिपोर्ट के हवाले से कहा जा रहा है. संतोष हेगड़े ने तो कर्नाटक सरकार के उन पर दबाव डालने, उनके फोन टेप करने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं. और तो और, उक्त लीक रिपोर्ट में मुख्यमंत्री ही नहीं, रेड्डी बंधुओं और अन्य मंत्रियों पर भी आरोप लगे हैं. अगर आप एक बार फिर परसेप्शन की बात करें तो जनता की अदालत में ये लोग साफ-साफ दोषी नज़र आ रहे है. चाहे कानूनन कोई आरोप सिद्ध हुआ हो या नहीं.

भाजपा का ये कहना है कि रिपोर्ट आधिकारिक नहीं है आदि आदि, पर अब यह तर्क पच नहीं रहा. इस मामले में पार्टी का रव्वैया पहले ही हास्यास्पद रहा है. पार्टी को शायद इस बात पर विचार करने के बजाये कि येदियुरप्पा को जाना चाहिए या नहीं, इस पर विचार करना चाहिए कि वो इस बड़े बवाल के बाद पार्टी को किसके हाथ सौंपेगी. किसकी छवि साफ है, कौन माइनिंग माफिया से निपट सकता है और कौन पार्टी को टूटने से बचा सकता है. ज़ाहिर है, यह सब कुछ आसान काम नहीं होगा. जातीय समीकरणों के अलावा सभी खेमों को नियंत्रण में रखना कोई आसान काम नहीं.

ऐसी स्थिति में पार्टी अगर अब भी येदियुरप्पा की छुट्टी करने में कतराती है या उनके दबाव में आती है तो जो सवाल दबे शब्दों में उठ रहे हैं वे मुखर हो सकते हैं कि आखिर ऐसा क्या है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व येदियुरप्पा के ख़िलाफ़ कोई कद़म नहीं उठा पा रहा ? क्या पार्टी फंड में मोटी रकम इन बेल्लारी की खदानों के अवैध इस्तेमाल से आती है ? क्या चंडुखाने की उन चर्चाओं में दम है कि येदियुरप्पा ने कैसे बड़े नेताओं के बड़े खर्चे उठाए हैं ?

खदानों के बड़े खेल का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि कर्नाटक के लोकायुक्त की लीक हुई रिपोर्ट ने वहां के सभी राजनीतिक दलों की मिलीभगत को उजागर किया है. पर देश के सबसे बड़े विपक्षी दल को सोचना चाहिए कि भ्रष्टाचार पर हल्ला बोलने से पहले वो अपने शीशे के घर को तो संभाल ले, नहीं तो जनता जब वोट रुपी पत्थर मारेगी तो विंध्य के उस पार एक मज़बूत आशियाने का उसका सपना चूर चूर हो जाएगा. आगामी मानसून सत्र में सत्तापक्ष को घेरने के उसके मंसूबो पर भी पानी फिर जाएगा. शायद सरकारी पक्ष, विपक्षी दल के भ्रष्टाचार के इस दलदल में कर्नाटक का नाटक जारी रखते हुये उसके और अधिक फंसने का इंतज़ार कर रही है- क्योंकि परसेप्शन तो यही है कि भाजपा अब भी कोई ठोस कदम उठाने से बचने की कोशिश कर सकती है.


23.07.2011, 17.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित