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सपने का होना

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सपने का होना

एम जे अकबर


लंदन के जिस छोटे हिस्से से मेरी अकस्मात मुलाकात हुई, वह क्रिकेट देख रहा है और रूपर्ट मर्डोक के बारे में बात कर रहा है. भाषा का रंग इंग्लैंड के आसमान से मेल खाता है, जो काला या सफेद होने के बजाय धूसर है. मीडिया न तो शैतान की तरह कालिमामय है और न ही क्रिकेट पवित्रता के प्रतीक श्वेत रंग की तरह है.

cricket

क्रिकेट का स्वप्न रचने वाले मेरे जैसे व्यक्ति के लिए लॉर्डस में भारत और इंग्लैंड के बीच हो रहे सौवें टेस्ट के पहले दिन कमेटी रूम में स्पेक्टेटर सीट स्वर्ग की तरह है. (क्रिकेट का यह स्वप्न रचने वाला वह शख्स है, जो यकीन करता है कि उसे भारत का कप्तान होना चाहिए, क्योंकि उसने एक महत्वपूर्ण स्कूली मैच में 32 रन बनाए थे.)

महान सितारों के दरमियान बीते सुहाने दिनों को लेकर चल रही हल्की सरसराहट थम गई और उस दिन होने वाले खेल की संभावनाओं पर महीन निरीक्षण की निगाहें जम गईं. शुरू होने का समय पूर्वाह्न 11 बजे था और कॉफी मैरी के साथ मैं लॉर्डस के सांस्कृतिक इतिहास में अपनी छोटी-सी भूमिका जोड़ने वाला था.

भुला देने लायक पहले सत्र के बाद दोपहर का भोजन तीसरी मंजिल पर हुआ. मेरी दाहिनी ओर थे यादों में बसे सबसे शानदार ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज-कप्तान स्टीव वॉ. मेरी बाईं ओर थे महान दक्षिण अफ्रीकी ओपनर बैरी रिचर्डसन, जिन्होंने बैटिंग नहीं की, विस्फोट किए और जिन्हें अपने ही देश के रंगभेद रूपी दानव की धोखाधड़ी के कारण वैश्विक लोकपियता से वंचित होना पड़ा, जिसके वे सच्चे हकदार थे. मेज के पार जॉन एडरिक थे, यादगार अंग्रेज ओपनर, जो नहीं जानते थे कि बैट को चमकाया कैसे जाता है और बाहर कैसे हुआ जाता है.

मुझे लगता है, वे यह जानकर मामूली से परेशान थे कि मैंने उत्साही स्कूली छात्र के रूप में प्रार्थना की थी कि वे बीमार हो जाएं और न खेल पाएं. मैंने उनसे पूछा कि क्या उन्हें बेशकीमती नाडकर्णी द्वारा एक कतार में फेंके गए 19 मेडन ओवरों की याद है, और एडरिक मुस्करा दिए.

उनके पास अपनी एक कहानी थी. एक बार उन्होंने नाडकर्णी को एक मेडन ओवर फेंका था. और क्या हम कहेंगे कि एडरिक की बॉलिंग के बारे में सोचना वैसा ही चौंका देने वाला है, जैसे धोनी को अतिसाहसिक निश्चय के साथ गेंद लिए दौड़ते देखना? अंतर यह है कि धोनी गेंदबाज के तौर पर खुद को गंभीरता से लेते हैं.

एडरिक ने बड़ी विनम्रता से ध्यान दिलाया कि उन्हें मेडन ओवर मिल गया, क्योंकि बेचारे नाडकर्णी को जरा भी पता नहीं होता था कि अगली गेंद कहां से टप्पा खाकर आने वाली है. यह मेरे पक्के सिद्धांत के लिए एक और प्रमाण है- ब्रिटिशों ने दुनिया को जीता, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे कि खुद के साथ कब गंभीर होना है और कब मजाकिया.

विश्व एकादश के हिस्से के रूप में बैरी भारत आने ही वाले थे. यह एकादश बिहार में अकाल पीड़ितों की सहायता हेतु होने वाले मैच के लिए बनाई गई थी. यह मैच 1967 में होना था. रंगभेद ने दक्षिण अफ्रीका को बर्बाद किया और अकाल भारत की स्मृति का क्रूर हिस्सा है. यह मैच कभी नहीं खेला गया, क्योंकि इंदिरा गांधी ने बैरी को वीसा देने से इंकार कर दिया.

स्टीव वॉ और वेस्टइंडीज के लंबू कर्टनी वॉल्श के साथ लॉर्डस की बाल्कनी के तीसरे माले से भारत को खेलते हुए देखना कल्पना की किताब से निकला लम्हा लगता है. स्टीव वॉ ने जरा भी भावुक हुए बगैर बताया कि वे किस तरीके से बैटिंग करते थे. उनके लिए तथ्य मायने रखते हैं, इसलिए वे तथ्यों का हिस्सा हैं. उन्होंने हाथी को पकड़ा और कमरे में उछाल दिया, ताकि हम यह तय करें कि इसका अस्तित्व है या नहीं. उन्होंने महज सुझाव दिया कि क्रिकेटरों को अब एक झूठ पकड़ने वाले टेस्ट से गुजरना चाहिए.

मैच फिक्सिंग, या ज्यादा सटीक कहें तो क्रिकेट-लांडरिंग, एक यथार्थ भूतिया कहानी बन चुका है. हर कोई इसकी मौजूदगी का एहसास कर सकता है, लेकिन कोई भी भूत के पैर नहीं बांध सकता. पाकिस्तानी टीम में इसकी तस्वीर भी खींची गई, लेकिन उसका नेगेटिव बहानों में खो गया.

औपनिवेशकों, भूतपूर्व शासकों और पूर्व प्रजाओं, जो अब क्रिकेट के नए राजा हैं, ने खुद को समझा लिया है कि पाकिस्तान की बीमारी खेल के पॉलिटिक निकाय में से दागी जा सकती है. अब हाथी भारत से आता है, जो इसे खासतौर पर उपयुक्त उपमा बनाता है.

कोई भी इस बारे में सुनिश्चित नहीं है कि इक्का-दुक्का खिलाड़ियों ने बुकियों के साथ निजी डील नहीं की है. कम से कम एक बड़े खिलाड़ी की तस्वीर एक चैंपियन बुकी के साथ खींची गई है और व्यक्तिगत वार्तालापों में इसके ज्यादा सूत्र मिलते हैं. भारत में क्रिकेट के अवैध सट्टे के बाजार का आकार स्तब्ध कर देने वाला है और यह पूरी तरह अंडरवर्ल्ड द्वारा नियंत्रित है.

लेकिन हम लॉर्डस में काले बादलों पर चिंतित होने नहीं, सुहानी धूप में ताजादम होने के लिए थे. हम ऐसी यादें ले जाने आए हैं, जो मृत्युर्पयत बनी रहेंगी और हमारा हिस्सा हो जाएंगी. मैं शनिवार की सुबह यह लिख रहा हूं और सर्वथा स्वार्थी होते हुए, मैं शायद ही कुछ विकेट गिरने तक धीरज धर सकूं, ताकि सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ लॉर्डस के सुदीर्घ और मोहक इतिहास में महानतम साझेदारी कर सकें.

मैं सचिन द्वारा सौवें सैकड़े की राह में लगाए गए स्ट्रोक्स का मधुरिम उन्माद चाहता हूं, और बेहतरीन राहुल के लिए उम्मीद करता हूं कि वे उस जमीन पर अपना पहला शतक बनाएंगे, जहां वे 95 तक पहुंचे थे. खेल दो घंटे में शुरू होना है. ये सपने सच भी हो सकते हैं और नहीं भी. लेकिन कभी कोई सपना न होने से तो कोई सपना होना ही पर्याप्त है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

24.07.2011, 00.34 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

vipin bihari shandilya [vicharmimansa@gmail.com] balaghat-madhyapradesh 2011-7-24 - 2011-07-24 04:27:30

 
  सपने आज सच होंगे, थोड़ा इंतजार करें. 
   
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