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पवन करे सोर

बात बोलेगी

 

पवन करे सोर

कृष्ण राघव


आज का लेख मुंबई में रह रहे उन उत्तर भारतीयों को समर्पित है जो अपने-अपने संस्कृति के आंगन, मुंबई के कारोबारी फुटपाथ के लिए छोड़ आए हैं. इस वाक्य से यह न समझें कि हम मुंबई और देहात की तुलना करने बैठ गए हैं. दोनों अपनी-अपनी जगह हैं, संस्कृति भी रोजगार भी...आंगन भी फुटपाथ भी बल्कि रोजी-रोटी का मामला तो कुछ यूं है कि ये दोनों होठ हमेशा साथ-साथ जुड़े रहते हैं. रोटी का निवाला मुंह में जाता है तो ये भी अलग हो जाते हैं.

saawan

सो हम किसी तुलना के चक्कर में नहीं हैं. साहब, हम तो केवल सावन की उन यादों को हरा करना चाह रहे हैं, जो मुंबई का हर उत्तर भारतीय थोड़ा-बहुत अपने में संजोए हुए है. कुछ हमारी आवाजें उनके दर्द को भी अपने गायन में अमर कर गई हैं जैसे कि बेगम अख्तर उर्फ अख्तरी बाई फैजाबादी. आज भी जब रेडियो पर कभी कोयल-सी उनकी आवाज कूकती है तो वहां का सावन मुंबई में आकर साक्षात खड़ा हो जाता है. मिसाल के तौर पर-

"छा रही काली घटा, जिया मोरा लहराए है
सुन री कोयल बावरी, तू क्यों मल्हार गाए है
’’
000
"कोयलिया मत कर पुकार, करेजवा लागे कटार"
000
बनारस की हीरा देवी मिश्रा की एक ठुमरी है
"मोरे सैंया जी उतरेंगे पार, नदिया धीरे बहो ना!’’

ऐसी न जाने कितनी कजरी, बिरहा, रसिया, मल्हार और ठुमरियां तो सावन का एक स्थाई अंग हैं ही किंतु इनमें सबसे आगे हैं लोकगीत. सच कहें तो ये लोकगीत ही कहीं ठुमरी बन जाते हैं तो कहीं दादरा, कहीं बिरहा तो कहीं कजरी. आइए इनमें से कुछ की यादें ताजा करें. अवधी में एक ‘सावन’ है. जी हां ‘सावन’ लोकगीत है ही सावन के लिए. गोरी को एक ही दुख है इन महीने में. कहती है-
"गोरी—गोरी बहियां, सबुज रंग चुनरी
पिया छोड़ि चलेन हो परदेसवा
"

'चौमासा’, लोकगीत का, एक और अवधी प्रकार है. इनमें भी सावन का जिक्र कुछ यों आता है-
"सावन की हरियाली, सासू का लागै डर भारी
नाहीं मोरा है संघाती, इहां आई बा बहरिया
’’

अवधी के चौमासे की भांति कुमायनी में भी बारमासा होता है. इस बारहमासे में सावन भी शामिल होता है, कुछ इस तरह-
"सावन मासा गरजी गो यो मेघ,
बरसना लागा सागरे तोला.
’’

बारहमासा गढ़वाल में भी होता है और उसी में होती है सावन की गरज भी. बुंदेलखंड और ब्रज की परंपरा बोली और लोकगीत भी लगभग एक से ही हैं. बुंदेलखंड के एक 'साउन गीत' की बानगी देखिए-
"एक चना, दो देउलीं, माई साउन आए
कौन सी बिटियां सासरैं, माई साउन आए
(प्रश्न)
गौरा सीं बिटियां सासरैं, माई साउन आए "

ब्रज की 'मल्हार' तो बनी ही सावन के लिए है-
"सावन आयौ परम सुहावनो जी
ए जी कोई रखियन, हम्बै कोई रखियन
कौ त्यौहार, सावन आयौ पर सुहावनौ जी
’’

भोजपुरी में इसी महीने के लिए है 'कजली' अथवा 'कजरी' -
"बादर बरसै, बिजुरी चमकै, जियरा ललचै मोर
सइआं घरे न अइले, पानी बरसन लागे करि सोर"


आदिवासी भी सावन के असर से अछूते नहीं है. उनका भी एक 'पावस गीत'-
''उतरे असाढ़ चढ़ सवनो ये
पिहा मोर गइल परदेसे
संगी मोर गइल परदेसे
पगरी उतारि दीहल बुझावे
दूनउ मिलि गरे लपटैं
''

मुसलमानों में भी यों तो यही लोकगीत गाए जाते हैं (गांवों में) किंतु खड़ी बोली का भी एक रूप है, जिसके जनक हैं अमीर खुसरो. एक गीत उसी शैली में बड़ा मशहूर है और अवध से निकल कर उमराव जान फिल्म तक भी पहुंच गया था, ''झूला किन्ने डाला री अमरइयां.'' एक और गीत जिसे 'बंदिनी' फिल्म ने अमर कर दिया, ''अबके बरस भेजे भैया को बाबुल, सावन में लीजो बुलाय रे..''

उत्तर का सावन आप तक पहुंचाने की हमने एक तुच्छ कोशिश की है पाठको! आपको नहीं लगता इन गीतों में ''टेर'' बहुत है? बिरहा की ऐसी टेर, जो ऋतुराज सावन के आते ही कोयल की कूक के बहाने, बदरा की गरज और बिजुरिया की चमक के बहाने, सास-ननद और भौजाई के बहाने, निष्ठूर निर्मोही परदेसिया के बहाने फूट पड़ती है.

ये बलम परदेसी ही हमेशा क्यों गोरी को तंग करता रहा है? ये लोकगीत जो हमारी ग्रामीण ललनाएं इतनी सहजता से गाती चली जाती हैं, इनकी पीर साल दर साल, सावन के महीने में बढ़ती क्यों चली गई है. मुंबई में रहने वाले बहुत सारे उन उत्तर भारतीयों की बात तो मैं नहीं करता, जो सुविधा संपन्न है (वे तो अपवाद हैं ) किंतु दूध वाले, पान वाले, चना-चबेना वाले, मजूरी करने वाले, न जाने कितने सफाई और सुरक्षाकर्मी, चपरासी, चौकीदार और दरबान, टेलीफोन और बिजली के लाईनमैन, सब्जी-फल वाले, टैक्सी-आटो वाले, गरज ये कि मुंबई की धमनियों में रक्त बनकर बह रहे हैं, रोज सुबह-सुबह ताजे खून की तरह सारी मुंबई को तरोताजा जिंदगी देते हैं, उनके घरों का अहवाल उत्तर भारत में कोई बहुत अधिक बदला नहीं हैं.

नई-नवेलियां वहां आज भी अकेली ही रहती हैं. उनके सांवरिया बालम उन्हें छोड़-छोड़ कर आज भी मुंबई ही आते हैं कमाने के लिए. मलाई-बरफ, भेल-पूरी, चाट-पकौड़ी के खोमचों के सामने, इनके कलेजे पर तो मुंबई की सुंदरियां देख-देख कर ठंडक पड़ जाती है किंतु इनकी घरवालियों के कलेजे आज भी सास, ननद और भाभियों के तानों से छलनी होते रहते हैं. एक ब्रज का लोकगीत है-
'' गलिन—गलिन में बिकत नरंगियां-सास नरंगिया लाई जी
एक नारंगी कौ एक कतीरा वामै जहर मिलायौ जी
सो नारंगी हमैं सासुल दीन्हीं, हमने खुस हृवै खाई जी
''

ये लोकगीत, सावन में झूले पर बैठकर गाया जाता है. जाहिर है कि जहर भरी उस नारंगी को खाकर बहू जिंदा तो बची नहीं होगी, सो अगले सावन में अगली बहू आ जा जाएगी क्योंकि कमाउ पूत तो मुंबई में कमा रहा है.

''जहर भरी नारंगी'' का यह गीत आज भी गांवों में झूले पर, सावन में उसी उत्साह से गाया जाता है, जैसे बरसों-बरस पहले गाया जाता था. कुछ फरक नहीं पड़ा, दूध की जगह चाय आ गई, छाछ की जगह लस्सी, साइकिल की जगह मोटर साइकिल, बैलगाड़ी और हल की जगह ट्रैक्टर मगर ये लोकगीत वहीं के वहीं ठिठके खड़े हैं, उसी तरह ये हमारी ग्रामीण ललनाएं भी वहीं की वहीं ठिठकी पड़ी हैं. इन्हें सहारा देते हैं ये लोकगीत और ये सहारा देती हैं अपने उन अनगिनत पतियों को, जिनके लिए, उनकी अनुपस्थिति में ये आज भी करवा चौथ का व्रत रखती हैं, पीपल या वटवृक्ष के चारों ओर कच्चे सूत का धागा बांध कर जल चढ़ाती हैं, न जाने कैसे-कैसे उपवास, मनौती....क्यों कर जल चढ़ाती हैं! बदले में उनके पति क्या करते हैं? मैं उन पतियों की बात कर रहा हूं जो मुंबई में हैं, कुछ नहीं करते. वे सिवाय इसके कि सिर्फ मनीआर्डर भेजते हैं. ये मनीआर्डर भी वे अपनी पत्नी नहीं मां, पिता अथवा भाई के नाम ही भेजते हैं. कहीं उसके हाथ कुछ लग न जाये.

सारांश में हमारे सावन के लोकगीत, ठुमरी, दादरा, कजरी, मल्हार, रसिया और बिरहा इन सबके बोल अगर तब से अब तक वहीं के वहीं चले आ रहे हैं तो इसका कारण केवल यह है कि नारी की दशा अभी दुर्दशा के द्वार पर ही खड़ी है. तो हे भारतवासियों ! आप इस मुगालते में न रहें कि नारी की दशा सुधर रही है क्योंकि परदेस से कमाउ पूत कमा-कमाकर अपने घर भेज रहे हैं. दशा तो तब ही बदली जानिएगा, जब हमारे ऐसे लोकगीत के बोल बदल जाएंगे.

28.07.2011, 11.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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