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इस मूर्खता को ना कहें

बाईलाइन

 

इस मूर्खता को ना कहें

एम जे अकबर


एक भव्य तसवीर सहज हलचल पैदा करती है. ‘शोले’ सरकारी फ़ंड की मदद से बनने वाली कला फ़िल्म से हमेशा ज़्यादा सुर्खियां बटोरने में कामयाब रहेगी, लेकिन एक सामान्य बजट की फ़िल्म की जटिलताओं और दावपेंच से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है.

दुनिया की सबसे चर्चित पेंटिंग मोनालिसा भी एक छोटे से कैनवास पर साकार हुई थी. राजनीति को कला से बेहतर उसे रचने वाले कलाकार या शिल्पकार से जोड़कर देख सकते हैं.

लोकतांत्रिक राजनीति की दो धुरी हैं. सत्ता का दायरा और आम आदमी तक पहुंच. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक आम आदमी में बहुत उत्साह नहीं जगा पाते. वे अपनी आवाज को ऊंचा नहीं करते, जबकि लोकप्रियता नाटकीयता की मांग करती है. लेकिन वे अपने शांत और सौम्य अंदाज में भी लगातार इस मिथक पर चोट करते रहते हैं कि वे सत्ता की राजनीति में नौसिखिये हैं. यूपीए के इस दूसरे कार्यकाल में सत्ता का गणित कांग्रेस और उनके सहयोगियों के बीच खिंचीं गंठबंधन की लकीर पर ही नहीं चलता.

कांग्रेस ने अपने सहयोगियों को करीब-करीब हाशिये पर डाल दिया है. अब यहां मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की शक्ल में ताकत दो ध्रुवों में सिमटी है. इन दोनों के आपसी तालमेल में ही सत्ता का गणित शक्ल लेता है. ये दोनों तालमेल से काम करते हैं, वरना यह ढांचा चरमरा सकता है. लेकिन यहीं दोनों ओर से एक तनाव का प्रभाव बराबर बना रहता है. खास तौर से उस वक्त, जब वह अलग-अलग रास्तों से एक ही फ़ैसले पर पहुंचने में जुटे होते हैं. या फ़िर उन तरीकों का नाप-तौल, जिसके जरिये वे अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करते हैं. इस पहलू को बखूबी ध्यान रखते हुए कि उनके समीकरणों के खिंचाव से भरा यह तार टूट न जाये.

प्रधानमंत्री कार्यालय में प्रमुख सचिव के तौर पर पुलक चटर्जी की नियुक्ति एक बेहतरीन उदाहरण है. चटर्जी दोनों के साथ काम कर सकते हैं, लेकिन मूल रूप से उनकी निष्ठा सोनिया गांधी के प्रति है. उन्हें टीके नायर की जगह यह जिम्मेदारी सौंपी गयी है.

आत्मविश्वास और सौम्यता से अपने काम को अंजाम देने में महारत जैसी कई वजहें थीं, जिसके प्रधानमंत्री बेहद कायल थे. इसी के चलते 2004 में उन्हें यह पद भार सौंपा गया, लेकिन इसमें भी सबसे अहम वजह थी नायर का प्रधानमंत्री के प्रति पूर्ण समर्पण. ऐसे में डॉ. सिंह किस तरीके से इस बदलाव को निपटेंगे. उन्होंने चटर्जी को नियुक्त किया है और नायर को पदोन्नति दी है.

रैंक सत्ता का मूल है. एक राज्य मंत्री के बराबर हैसियत रखने वाले नायर अब चटर्जी से ऊपरी पायदान पर हैं और प्रोटोकॉल के तहत भी वे प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई इस राजनीतिक नियुक्ति की बराबरी पर रहेंगे. डॉ सिंह ने एक तरह से क्रोऐशया को गंवाकर यूगोस्लाविया पर कब्जा किया है.

इस सत्ता संघर्ष में पुराने यूरोप की उपमा बेहद सटीक बैठती है. दरअसल, आपकी बड़ी-से-बड़ी योग्यता का इम्तिहान युद्ध के दौरान इतना नहीं होता जितना युद्ध के बाद होने वाले क्षेत्रीय मोलभाव में. यूपीए का दूसरा कार्यकाल अब अपने निर्णायक दौर में दाखिल हो रहा है. 2012 यह तय करेगा कि यूपीए बढ़ता रहेगा या भरभराकर ढहने लगेगा. यह इस बात पर टिका है कि उसका एजेंडा राजनीति के गवर्नेस से तय होगा या गवर्नेस की राजनीति से.

डॉ सिंह निश्चित तौर पर पहले रास्ते को चुनेंगे. सोनिया गांधी दूसरे रास्ते को. न्यूक्लि यर डील के दौरान डॉ सिंह ने यह दिखाया था कि वे औपचारिक विपक्ष के सामने घुटने नहीं टेकते. इस बार अब वह यही संदेश अनौपचारिक विपक्ष को दे रहे हैं.

किसी भी सिस्टम के डीनए सूत्र तक आप उसके छोटे-छोटे हिस्से से भी उसी तरह पहुंच सकते हैं, जैसे उसकी बड़े-से-बड़े खाके से. 19 साल के सब्जी विक्रेता फ़खरूद्दीन की कहानी हमें न्याय व्यवस्था को वैसे ही समझने को बाध्य करती है, जिस तरह 2जी घोटाले में आरोपियों को जमानत देने से मना करना.

सीबीआई उन्हें सलाखों के पीछे डालने के लिए यह तर्क देती है कि ये आरोपी सबूतों के साथ छेड़-छाड़ कर सकते हैं. सभी सबूत अदालत के सामने रखे जा चुके हैं, लेकिन उन्हें जमानत से इनकार कर दिया गया है. क्यों? इसका कोई जवाब अदालत के पास नहीं है. कह सकते हैं, जज से जवाब नहीं मांगा जा सकता.

दिल्ली पुलिस ने पिछले साल अगस्त में ओखला मंडी से फ़खरूद्दीन को हिरासत में लिया. पुलिस ने यह कार्रवाई उस शिकायतकर्ता के आरोप पर की कि फ़खरूद्दीन ने उसकी जेब से 200 रुपये और एटीएम कार्ड चोरी किया है. फ़खरूद्दीन ने खुद को बेकसूर बताया. दिल्ली पुलिस ने उस पर चोरी का आरोप लगाया. नतीजतन उसे तिहाड़ जेल में डाल दिया और मजिस्ट्रेट ने उसे जमानत देने से इनकार कर दिया.

9 महीने बाद उसे जमानत पर छोड़ने का हुक्म दिया बशर्ते वह दस हजार रुपये का मुचलका दे सके. वह ऐसा नहीं कर सका और जज ने उसे वापस जेल भेज दिया. आख़िर कैसे दो सौ रुपये चुराने को बेचैन एक किशोर दस हजार रुपये का मुचलका भर सकता था. दो सौ रुपये चुराने के लिए अधिकतम सजा तीन महीने की है. आख़िर क्यों पुलिस ने मजिस्ट्रेट के साथ मिलकर उसे एक साल जेल में रखा.

हमारी अदालतों में रोजाना ऐसे सैकड़ों सवाल बिना जवाब के रह जाते हैं. फ़खरूद्दीन ने इस अन्याय का अपने तरीके से बेहतरीन जवाब दिया. उसने अपना कसूर मान लिया और इसके बाद वह आजाद था. क्योंकि वह अपने ‘जुर्म’ के बदले में चार गुना सजा पा चुका था. उसका असली अपराध है गरीबी. लोकतंत्र मांग करता है कि हम अपने नियमों के साथ अपने जिंदगी जियें, लेकिन यह ये भी मांग करता है जरूरत पड़ने पर हम इस तरह की मूर्खताओं को बदल दें.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.

31.07.2011, 00.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

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vipin bihari shandilya [vicharmimansa27@gmail.com] balaghat-madhyapradesh 2011-8-5 - 2011-08-05 15:30:58

 
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