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पत्रकारों के वेतन के खिलाफ

बहस

 

पत्रकारों के वेतन के खिलाफ

रघु ठाकुर


पत्रकारों की वेतन सुविधाओं के संबंध में भारत सरकार द्वारा गठित ‘मजीठिया वेज बोर्ड’ की अनुशंसाओं को रोकने के लिये एक पत्रकार घराने की ओर से भारत के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई है. आश्चर्यजनक रूप से भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसके क्रियान्वयन को दो सप्ताह के लिये रोक दिया और भारत सरकार से पूछा है कि क्या ऐसा बोर्ड बनाने का संवैधानिक अघिकार सरकार के पास है?

पत्रकार

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय की यह आम लत हो गई है कि वे हर याचिका में मुद्दे के संबंध में सरकार से ही संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों के बारे में पूछते हैं, और सरकार से शपथपत्र दाखिल करने के लिये कहते हैं. इस प्रक्रिया में अक्सर बहुत समय बरबाद होता है और मामले बिलम्बित हो जाते हैं. क्या यह उचित नहीं होगा कि देश का सर्वोच्च न्यायालय यह निर्णय करे कि जो कथन या सूचना सर्वोच्च न्यायालय में दी जायेगी, वह शपथ पत्र के समान ही मानी जायेगी तथा गलत पाये जाने पर झूठे शपथपत्र देने के अपराध के समान ही दण्डित किया जायेगा. इसके साथ ही साथ सर्वोच्च न्यायालय को स्वतः निर्णय क्यों नहीं करना चाहिए ?

न्यायालय सरकारी वकील के यानी महान्यायवादी या शासकीय अधिवक्ता के तर्क सुने, पक्षकार के तर्क सुने और निर्णय दे. जब सरकार ने ही यह वेज बोर्ड गठित किया है तब उसी सरकार से पूछना कि वह अपना अधिकार बताए, आश्चर्यजनक है. न्यायालय को जो निर्णय देना है, दे परन्तु इस प्रकार की बिलंबन प्रक्रिया समाप्त की जानी चाहिए. कभी-कभी आश्चर्यजनक रूप से न्यायालय किसी कार्यवाही के लिये इतना उतावला हो जाता है कि जांच एजेंसी की खात्मा रिर्पोट पेश होने के बाद भी उन्हें आदेश दे देता है कि भले ही आपके पास आधार हो या न हो परन्तु मुकदमा पेश किया जाये, दर्ज किया जाये. अच्छा हो कि सर्वोच्च न्यायालय कभी इसका भी सर्वेक्षण कराये कि उसके द्वारा स्वैच्छिक आदेश से दर्ज किये गये कितने प्रतिशत मुकदमे में अपराध पाया गया या सजा हुई.

मजीठिया वेज बोर्ड की रिर्पोट के आने के बाद से देश की कॉरपोरेट लॉबी इस रपट को रद्दी की टोकरी में फिंकवानें के लिये हर स्तर पर प्रयास कर रही है. जहां तक केन्द्र सरकार का सवाल है, वह तो देश की कॉरपोरेट सरकार ही है. उससे कुछ उम्मीद करना लगभग बेमानी ही है.

अभी 13 जुलाई को दिल्ली के कॉन्सटीट्यूशन क्लब के स्पीकर हाल में ‘उदयन शर्मा फॉउण्डेशन’ की ओर से भ्रष्टाचार और पत्रकारिता के दायित्व विषय पर गोष्ठी का आयोजन हुआ था. जिसमें केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्रीमती अम्बिका सोनी भी आयी थीं. उनका भाषण समाप्त होने के बाद एक नौजवान पत्रकार ने खड़े होकर सवाल पूछा कि मजीठिया वेज बोर्ड को आप लागू क्यों नहीं कर रहीं. इसका जो उत्तर केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री ने दिया, वह आश्चर्यजनक रूप से परेशान करने वाला है. उन्होंने कहा कि जब 20-30 साल बाद आप भी वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में आयेंगे तब इसका उत्तर हम आपसे पूछेंगे. उनके इस कथन का आशय बहुत साफ है, सरकार वेज बोर्ड की रपट लागू नहीं करेगी.

जो वरिष्ठ पत्रकार मीडिया में बड़े पदों पर पहुंचे हैं, जिनका वेतन पैकेज लाखों रूपये वाला है, वे उनके साथ हैं तथा पत्रकारों के लिये यह एक चुनौती की तरह है. जो बड़े अखबारों का पत्रकार और बड़ी तनख्वाह वाला पत्रकार बनता जायेगा, वह स्थानीय पत्रकारों, कस्बाई पत्रकारों के दुख की चर्चा बंद कर देगा. अब इसका उत्तर तो बड़े मीडिया के बड़े पत्रकारों को देना है परन्तु यह एक तथ्य है. उस दिन हाल में उपस्थित किसी भी वरिष्ठ पत्रकार ने उस नौजवान पत्रकार का सर्मथन नहीं किया बल्कि सूचना एवं प्रसारण मंत्री के कथन पर मूक सहमति की मुहर लगा दी.

बड़े मीडिया के बड़े पत्रकारों ने अपनी इस मूक सहमति से लगभग यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी सुख सुविधा के लिये कॉरपोरेट घरानों के बंधुआ दास बन चुके हैं तथा अपनी बिरादरी के कमजोर व छोटे पत्रकारों के अधिकारों के लिये कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanjeev pandey [reporter.sanjeev@gmail.com] bilaspur - 2011-08-06 19:35:18

 
  आपने उस पीड़ित वर्ग के बारे में लिख दिया है, जिसका सरोकार पूरे सभ्य समाज से है. लेकिन इस वर्ग की हक़ीकत से किसी को कोई मतलब नहीं है. उम्मीद कम ही है कि कोई और आपके इस लेख पर विचार भी व्यक्त करेगा. हम आपके साथ हैं. 
   
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