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यह किसका विकास है ?

मुद्दा

 

यह किसका विकास है ?

देविंदर शर्मा


आर्थिक विकास के साथ भूख की रफ्तार ने भी जोर पकड़ी है. ऐसे समय में जबकि आर्थिक विकास की दर औसत आठ से नौ प्रतिशत है तो भूख भी उसी दर से बढ़ रही है. इसी रफ्तार से गरीबी भी. नेशनल सेम्पल सर्वे आर्गनाइजेशन (एनएसएसओ) की 2006-07 की रिपोर्ट खरा सच उजागर करती है. आर्थिक विकास और भूख का रिश्ता जबर्दस्त तरीके से सकारात्मक है-जितनी ज्यादा विकास दर उतनी ज्यादा गरीबी.

धान


यह तथ्य उस व्यापक विचार को चुनौती देता है कि आर्थिक विकास गरीबों को उनकी गरीबी और भूख से छुटकारा दिलाता है. इसी तरह, एनएसएसओ की 66वें दौर की रिपोर्ट रोजगार में वृद्धि की संभावनाओं को खारिज करती है. इसके मुताबिक 2004-05 से 2009-10 के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में 0.34 ऋणात्मक घटाव आया है, जबकि शहरों में यह 1.36 फीसदी तक बढ़ा है.

मुश्किल में डाल देने वाली ऐसी दो रिपोर्टों को, जिन पर समूचा देश स्तब्ध रह जाता और जो वैश्विक आर्थिक समुदाय के लिए एक सबक साबित होतीं, उन्हें बड़ी आसानी से दबा दिया गया. ऐसे में जबकि सारा जोर आर्थिक विकास पर लगाया जा रहा है, अपनी आबादी को दो जून का भोजन देने में राज्य की विफलता और गैरबराबरी की चौड़ी हो रही खाई की ओर ध्यान बरबस चला जाता है. इसलिए कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, जिसकी बुनियाद पर हमारे पूर्वज देश को टिकाना चाहते थे, उसका मतलब केवल कारपोरेट के कल्याण तक सिमट गया है. आर्थिक राडार से गरीब और भूखे वैसे ही गायब होते जा रहे हैं. ऐसे में पोषण पर एक आयोग बनाने की खानापूर्ति के अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आर्थिक विकास की मुड़ती दर को सीधी करने की जद्दोजहद में ही लगे हुए हैं.

शायद ही कोई दिन नागा गुजरता है जब वह, अपने पूर्ववर्त्ती प्रधानमंत्रियों की भांति, उद्योगपतियों से गुफ्तगू नहीं करते. अगर मनमोहन समेत पूर्ववर्त्ती सरकारें इसी संजीदगी से उद्योग और व्यवसाय को गति देने के काम में लगी होतीं, भूख और कुपोषण से लड़ी होतीं तो भारत वैश्विक भूख की तालिका में उप सहारा के अफ्रीकी देशों की जमात से भी नीचे 66 वें स्थान पर बैठा नजर नहीं आता. तब उपलब्धियों या विकास पर मगन होने के कुछ सार्थक कारण भी होते.

हालांकि वैश्विक भूखे देशों की तालिका अंतरराष्ट्रीय फुड पॉलिसी रिसर्च इंस्ट्टियूशन (आईएफपीआरआई) बनाता है, जिसके मुताबिक भारत में भूखे लोगों की तादाद 20 करोड़ है. विदेशी एजेंसी होने के नाते उसके आकलन में चूक की गुंजाइश हो सकती है. लेकिन असंगठित क्षेत्र की उद्यमिता के लिए नेशनल कमीशन की गणना को क्या कहेंगे, जिसके मुताबिक देश की 83.7 करोड़ आबादी रोजाना 20 रुपये से भी कम पर गुजारा करती है. तय है कि 20 रुपये में दोनों जून किसी का पेट नहीं भरता होगा.

भुखमरी का देश
दूसरे शब्दों में देश की 77 फीसदी आबादी भुखमरी के कगार पर है और वह किसी-किसी तरह गुजारा कर रही है. चिंतनीय स्थिति को और बदतर करने वाला पहलू यह है कि 1991 में आर्थिक उदारीकरण लागू करने के वक्त से ही एनएसएसओ चेतावनी दे रहा है कि खाद्यान्नों के उपभोग में गिरावट चली आ रही है और उसका अधिक पोषण देने वाली खाद्य सामग्री, मसलन- अंडे, सब्जियां, फल और दूध की बढ़ती खपत से कोई साम्य नहीं है. इसका मतलब है कि भूख बढ़ती और फैलती जा रही है.

अभी तक यही समझा जा रहा था कि खानपान के प्रति बदलते रुझानों के चलते ही लोग-बाग खाद्यान्नों के बजाय अधिक कैलोरी वाले फल, सब्जी और दूध को पसंद करने लगे हैं. अब तो इस अवधारणा में भी कोई सच्चाई नहीं रही. कम हो या ज्यादा, लेकिन गांवों और शहरों में खाद्यान्नों की खपत में गिरावट लगातार बनी हुई है. निश्चित रूप से गांवों में इसकी गति ज्यादा तेज है. 1993-94 में समूचे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 13.4 किलोग्राम खाद्यान्न का उपभोग घटकर 2006-07 में 11.7 किग्रा. हो गया. यह गिरावट 2004-2007 के तीन वर्षो में सबसे तेज रही जब खाद्यान्न का उपभोग 12.1 किग्रा से घटकर 11.7 किग्रा हो गया. शहरी केंद्रों में तो यह प्रति व्यक्ति प्रतिमाह के खाद्यान्न की खपत 1993- 94 में 10.6 किग्रा से घटकर2006-07 में 9.6 किग्रा तक ही रह गई.

एक व्यापक शाकाहार समुदाय में खाद्यान्न पोषण का अकेला अहम स्रोत होता है और इसलिए ही भारतीय संदर्भ में इसका महत्त्व स्वयं स्थापित है. यह जानी-मानी सच्चाई है कि भारत अभाव और नैराश्य के दलदल में धंसता जा रहा है.
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