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उत्तराधिकारी राहुल

बाईलाइन

 

उत्तराधिकारी राहुल

एम जे अकबर


ऑल इंडिया रेडियो को दिल खोलकर बधाई दी जानी चाहिए. कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने सोनिया गांधी की अनुपस्थिति में पार्टी का कार्यभार संभालने के लिए प्राधिकृत किये गये जिन चार लोगों के नाम की घोषणा की, उनमें एके एंटनी का नाम सबसे ऊपर था. राहुल गांधी का जिक्र शायद दूसरे या तीसरे नंबर पर था. लेकिन ऑल इंडिया रेडियो को जैसे इस विज्ञप्ति के पीछे की हकीकत का पता था. उसने अपने बुलेटिनों में राहुल को पहली प्राथमिकता दी. ऐसा करके उसने कुछ गलत भी नहीं किया.

राहुल गांधी


कभी न डिगने वाली वफ़ादारी जैसी खासियतों के बावजूद एंटनी मनमोहन सिंह के नामांकित उत्तराधिकारी नहीं हैं. उत्तराधिकारी राहुल गांधी हैं. अगर किसी प्रकार की अनिश्चितता है, तो समय को लेकर न कि संभावना को लेकर. यह सोच कि राहुल गांधी फ़िलहाल अपने इस उत्तराधिकार का वरण करने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं, कई कयासों को जन्म दे रहा है.

राहुल के धुर प्रशंसकों का मानना है कि राहुल को लेकर किसी भी किस्म का संदेह अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनावों में पार्टी के अच्छे प्रदर्शन से खत्म हो जायेगा. हालांकि यहां यह सवाल भी पूछा जा सकता है कि ओखर इस अच्छे प्रदर्शन की परिभाषा क्या होगी.

इस सूची से इस संदेश को स्पष्ट पढ़ा जा सकता है-मनमोहन से राहुल तक गद्दी के हस्तांतरण में अंतरिम व्यवस्था के तहत एंटनी को प्राथमिकता दी जायेगी, न कि प्रणब मुखर्जी या पी चिदंबरम को. इन दोनों की महत्वाकांक्षाओं पर सूची ने ठंडा पानी डाल दिया है. इस सूची से अगले साल राष्ट्रपति भवन के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार का हल्का सा अंदाजा भी लगा सकते हैं. 2011 छवियों के धुंधलाने का वर्ष रहा है. शीला दीक्षित राष्ट्रपति पद के लिए उपयुक्त पसंद हो सकती थीं, लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स पर कैग की रिपोर्ट ने उन्हें लील लिया है. अब तो प्रधानमंत्री कार्यालय के चारों ओर भी पानी जमा होने लगा है.

इन सबके बीच केरल की सफ़ेद धोती की तरह उनकी छवि आज भी उतनी ही धवल है. पदोन्नति के मामले में उनको लेकर प्रणब मुखर्जी की तरह विश्वास का संकट भी नहीं है. लगातार गर्त में जा रही कांग्रेस के लिए वर्ष 2012 बेहद अहम है. कांग्रेस की खुशनसीबी है कि फ़िलहाल उसके किसी सहयोगी को सरकार को अस्थिर करने में कोई फ़ायदा नहीं दिख रहा. अगर आज चुनाव होते तो कांग्रेस को बुरी तरह मुंह की खानी पड़ती. हालात को सुधारने के लिए नेतृत्व और दिशा के मामले में स्पष्टता सबसे जरूरी है. सोनिया गांधी का अचानक बीमार पड़ जाना राहुल गांधी के लिए आगे की जिम्मेदारियों को संभालने के लिहाज से राजनीतिक मौका साबित हो सकता है. कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष से लेकर मनमोहन सिंह की कुर्सी को संभालने की राह इससे खुलती है.

प्रधानमंत्री भी उन्हें लगातार न्योता देते रहे हैं. ऐसा होता है तो राहुल गांधी को अपने आप को साबित करने के लिए और देश को उनकी क्षमता को पहचानने के लिए दो साल का वक्त मिल जायेगा. किसी समूह का निर्माण किसी समस्या के समाधान के लिए नहीं किया जाता. यह तो हल खोजे जाने तक की एक अंतरिम व्यवस्था ही होती है. कांग्रेस अगर एक समिति के हाथों चलायी जाती है, तो यह उसके लिए सबसे खराब बात होगी. एक समूह बहुत जल्द पार्टी और जनता की नजरों में एक गैंग के रूप में तब्दील हो सकता है.

सोनिया गांधी यह भली-भांति जानती हैं कि उनके वापस लौटने तक पार्टी की परेशानियां और बढ़ गयी होंगी. सुप्रीम कोर्ट ने पार्टी के लिए मुसीबतों के उस बक्से को खोल-सा दिया है जिसे दावं-पेचों के सहारे बंद कर दिया गया था. कोर्ट ने पुलिस को 2008 के परमाणु सौदे पर वोट के दौरान सरकार को बचाने वाले कैश फ़ॉर वोट घोटाले में कार्रवाई करने का आदेश दिया है.

यह कार्रवाई क्या रूप लेगी, यह कोई नहीं जानता. इस मामले में अभी भी इतनी आग है कि सरकार का कोई भी कद्दावर शख्स उसकी भेंट चढ़ सकता है. कांग्रेस फ़ायर ब्रिगेड में अब इतनी ताकत नहीं बची कि वह इस आग को बुझा सके. अगर ज्यादा संख्या में लोग इस आग की भेंट चढ़ते हैं तो कांग्रेस को एक नये चेहरे की जरूरत होगी. अगर राहुल तब तक तैयार नहीं होते हैं, तब एंटनी को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है.

बहरहाल राहुल गांधी पर ही अपना दांव लगाना ज्यादा बुद्धिमानी वाला निर्णय होगा. इस उठापटक के बीच से अच्छी खबर यह है कि कैग जैसी लोकतांत्रिक संस्था और उसके प्रशंसनीय नेता विनोद राय ने राजनीतिक वर्ग को उसकी ऐड़यों पर खड़े होने पर मजबूर कर दिया है. जो लोग भारत के भ्रष्टाचार पर दांत निपोरते हैं, उन्हें भारत के लोकतंत्र के सम्मान के लिए भी वक्त निकालना चाहिए.
 

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
07.08.2011, 00.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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