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हमें आज़ादी चाहिये

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हमें आज़ादी चाहिये

एम जे अकबर


हम 15 अगस्त 1947 को मूल कथानक की केंद्रीय धुरी को ही गंवा बैठे. हमने सोचा कि एडविना और लॉर्ड माउंटबेटन के महल पर तिरंगा लहराने भर से ही आज़ादी की वह जंग हमने फ़तह कर ली है, जिसका 1919 में महात्मा गांधी ने आगाज किया था. दरअसल, यह तो सिर्फ़ आज़ादी की दूसरी लड़ाई की शुरुआत थी. अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ी गयी पहली लड़ाई से कहीं ज्यादा मुश्किल. आज़ादी की यह दूसरी लड़ाई अपने ही साथियों के खिलाफ़ लड़नी थी.

आजादी

आज जब मैं अपने आस-पास बिखरी उन समस्याओं को देखता हूं, जिनसे हमें अभी भी मुक्ति‍ चाहिए, तो अतीत और वर्तमान एक साथ अपने महत्व का दावा करते हुए आमने-सामने आ खड़े होते हैं. इस फ़ेहरिस्त में सबसे ऊपर होती है-भूख. इस भूख तक पहुंचने के लिए हमें माओवादियों के गढ़ में तब्दील हो चुके ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में जाने की जरूरत नहीं है. इन इलाकों में माओवादियों ने किसी आदर्शवाद के सहारे लोगों को एकजुट नहीं किया है. उन्होंने इन्हें मानवाधिकारों के नाम पर जोड़ा है.

एक दुर्बल शरीर और पीड़ित आत्मा के लिए पेट भर भोजन के अधिकार से ज्यादा बड़ी चीज और क्या हो सकती है. माओवादियों की बन्दूक से निकली गोली की आवाज अभी भी सिर्फ़ गुर्राहट तक ही सिमटी है. यह भूख अभी क्रोध में तब्दील नहीं हुई है.

गरीब या गरीबी कोई ऐसी असलियत नहीं है, जिससे हमारा वास्ता ना पड़ता हो. वे भारत के सबसे ज्यादा बिगड़े और आत्मसंतुष्टि से भरे शहर दिल्ली की सड़कों पर सोते हुए मिल सकते हैं. एक छोटे-मोटे शहर की कीमत के बराबर के गगनचुंबी अपार्टमेन्ट के ठीक सामने खुले मैदान में मिल सकते हैं. गलियां आज भी उन असाधारण बच्चों की एक पूरी पीढ़ी के लिए एकमात्र बसेरा हैं, जो उस वक्त भी अपने होठों पर मुस्कुराहट लिए होते हैं, जब भीख के लिए उनका हाथ आगे नहीं बढ़ा होता है. एक बेघर बच्चे का भविष्य क्या होता है ? क्या जेल ही उसका आशियाना है?

तिहाड़ तक पहुंचने वाले 90 फ़ीसदी किशोरों के पास संपत्ति के नाम पर एक दूसरी कमीज तक नहीं होती. आज़ादी के साढ़े छह दशक के बाद भी भारत उन्हें आशियाने के नाम पर सिर्फ़ जेल की चारदीवारी ही मुहैया करा पाया है.

मैं अनावश्यक रूप से कठोर या कर्कश होने का आभास नहीं देना चाहता. 1947 में हमें एक ऐसा भारत मिला, जहां उसके पूर्वी हिस्से में आये अकाल में महज तीन साल में 40 लाख लोग मारे गये थे. इस अकाल का केंद्र बंगाल था. अंग्रेजों की गलत नीतियों के चलते आये इस अकाल की यादों को हमने पीछे छोड़ दिया है. लेकिन यह देश की उस आधी अरब आबादी को दिलासा नहीं दे सकता जो आज भी किसी तरह अपनी जिंदगी की गाड़ी को खींचने में दिन-रात एक कर देते हैं. जिंदगी के बीसवें साल की दहलीज तक पहुंचते-पहुंचते जिनकी उम्मीदें दम तोड़ देती हैं. पूरे भारत को अगले एक दशक तक इसी भूख और बदहाली के खिलाफ़ आज़ादी की जंग लड़नी होगी.

1947 में अंग्रेजों के जाने के बाद पैदा हुई भाग्यशाली पीढ़ी के पास यही आखरी मौका है. यही उसका आखरी कर्तव्य है. इतिहास में ठहरी इस आधी रात की पीढ़ी आज अपनी जिंदगी के शिखर पर है. उसकी सोच शीशे की तरह साफ़ है. वे भ्रष्ट भारतीयों से आज़ादी चाहते हैं.

यह मानना मूर्खतापूर्ण होगा कि सिर्फ़ दूसरा आदमी भ्रष्ट है. अगर भ्रष्टाचार सिर्फ़ ताकतवर मंत्रियों तक सीमित है, तो जेल में दोषी लोगों के लिए पर्याप्त जगह है. भ्रष्टाचार घातक है, क्योंकि इसका सिरा सिस्टम में सबसे नीचे तक जाता है. पासपोर्ट कार्यालय में मौजूद क्लर्क से लेकर जिला अधिकारी के दफ्तर में मौजूद बाबू और कांस्टेबल तक, हर कोई अपनी जेब में कुछ न कुछ डाल रहा है. मुक्ति‍ पाने की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है.

भारतीयों को पक्षपात, पाखण्ड, चापलूसी, मूर्खता से मुक्ति‍ चाहिए. इसमें चापलूसी सबसे खतरनाक है. यह अपने नेता के अहं को तुष्ट करने के लिए सच को तोड़-मोड़ कर पेश करती है. हर पार्टी इस बीमारी के लिए दोषी है.

15 अगस्त को जब यूनियन जैक की जगह तिरंगा लहराया, तब इस ख्वाब को साकार करने वाले महात्मा गांधी आज़ादी के जश्न को मनाने का नैतिक साहस नहीं जुटा पाये. वे दिल्ली में जारी जश्न का हिस्सा नहीं थे. वे कोलकाता में भारतीयों को भारतीयों से ही बचाने की कोशिश में जुटे थे. बेलगछिया में जब बीबीसी ने उनसे इंटरव्यू किया, तो वे इस आज़ादी की प्रशंसा में शब्द भी नहीं खोज पाये. इंसानियत के विध्वंस के खिलाफ़ वे एक अकेली लड़ाई लड़ रहे थे.

1947 के मुकाबले 1919 और 1920 में गांधी जी कहीं ज्यादा सुकून में थे. वे जानते थे कि एक बार लोगों में जागृति आ गयी, तो फ़िर आज़ादी से कोई नहीं रोक सकता. वे वक्त से 25 साल आगे देख सकते थे.

शायद 1947 में गांधी जी पचास साल आगे के भारत को पढ़ सकते थे. गांधी जी आधुनिक भारत की उपलब्धियों पर जरूर खुश होते, लेकिन जब तक मातृभूमि पर भूख और भ्रष्टाचार मौजूद रहता, वे हमें शांति से सोने नहीं देते.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
14.08.2011, 00.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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